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अंधा गिद्ध और बिलाव — झूठे अजनबियों पर विश्वास का भयंकर परिणाम

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अंधा गिद्ध और बिलाव — झूठे अजनबियों पर विश्वास का भयंकर परिणाम

एक घने जंगल में एक बहुत पुराना और विशाल गूलर का पेड़ था। उस पेड़ की टहनियों और कोटरों (Hollows) में बहुत सारे पक्षियों ने अपने घोंसले बना रखे थे। उसी पेड़ के एक बहुत बड़े कोटर में एक 'जरगव' नाम का गिद्ध (Vulture) रहता था।

जरगव बहुत बूढ़ा हो चुका था। बुढ़ापे के कारण उसके पंख झड़ गए थे और उसकी आँखों की रोशनी पूरी तरह जा चुकी थी (वह अंधा हो गया था)। चूँकि वह खुद उड़कर शिकार नहीं कर सकता था, इसलिए पेड़ पर रहने वाले दयालु पक्षी अपने भोजन में से थोड़ा-थोड़ा हिस्सा निकालकर उस अंधे गिद्ध को दे देते थे। इसी से उसका गुज़ारा चलता था। बदले में, जब सारे पक्षी दाना चुगने बाहर जाते थे, तो वह अंधा गिद्ध उनके घोंसलों और बच्चों की रखवाली करता था।

धूर्त बिलाव का आगमन: एक दिन 'दीर्घकर्ण' नाम का एक बहुत ही चालाक और खूंखार बिलाव उस पेड़ के पास आया। उसे पता चला था कि इस पेड़ पर बहुत सारे छोटे-छोटे पक्षी और उनके बच्चे रहते हैं।

जब बिलाव पेड़ पर चढ़ने लगा, तो पक्षियों के बच्चों ने उसे देखकर डर के मारे ज़ोर-ज़ोर से शोर मचाना शुरू कर दिया। बच्चों का शोर सुनकर अंधे गिद्ध ने ज़ोर से चिल्लाकर पूछा: "कौन है वहाँ? जो भी है, तुरंत रुक जाओ!"

बिलाव ने जब एक बड़े गिद्ध को देखा तो वह घबरा गया। उसने सोचा, "अब तो मेरी जान गई, यह गिद्ध मुझे मार डालेगा।" लेकिन फिर उसने गिद्ध की आँखों की तरफ देखा और समझ गया कि गिद्ध अंधा है। बिलाव ने अपनी चालाकी का इस्तेमाल करने का फैसला किया।

बिलाव का पाखंड और मीठी बातें: बिलाव बहुत ही विनम्र और मीठी आवाज़ में गिद्ध के पास गया और बोला: "हे महात्मन्! मैं आपको प्रणाम करता हूँ।"

गिद्ध ने कड़क आवाज़ में पूछा: "तुम कौन हो?"

बिलाव ने कहा: "महाराज, मैं एक बिलाव हूँ।"

गिद्ध ने तुरंत चेतावनी दी: "बिलाव? तुम्हारा काम तो पक्षियों को मारना है। यहाँ से तुरंत भाग जाओ, वरना मैं तुम्हें अपनी चोंच और पंजों से चीर दूँगा।"

बिलाव ने घबराने का नाटक करते हुए कहा: "हे ज्ञानी गिद्ध! कृपया मेरी पूरी बात सुन लें। अगर मैं पापी हूँ, तो आप मुझे सज़ा दे सकते हैं। लेकिन केवल मेरी 'जाति' के आधार पर मुझे पापी मान लेना न्याय नहीं है। मैंने दुनिया की मोह-माया छोड़ दी है। मैंने मांस खाना बिल्कुल छोड़ दिया है और अब मैं कठोर तपस्या कर रहा हूँ। मैंने पक्षियों से सुना था कि आप धर्म और ज्ञान के बहुत बड़े ज्ञाता हैं, इसलिए मैं यहाँ आपसे 'धर्म का ज्ञान' लेने आया था।"

बिलाव ने आगे कहा: "एक सच्चा संत तो दुश्मनों का भी स्वागत करता है। क्या आप एक ज्ञान चाहने वाले को घर से भगा देंगे?"

गिद्ध उस धूर्त बिलाव की चिकनी-चुपड़ी बातों और धर्म-कर्म के ज्ञान में पूरी तरह फँस गया। गिद्ध को लगा कि यह बिलाव सचमुच बदल चुका है और एक संत बन गया है। गिद्ध ने उसे पेड़ के कोटर में रहने की अनुमति दे दी।

बस फिर क्या था! बिलाव की योजना सफल हो गई। वह रोज़ चुपके से पेड़ की डालियों पर जाता, पक्षियों के एक-दो बच्चों को पकड़ता और उन्हें अंधे गिद्ध के कोटर (जहाँ गिद्ध रहता था) में लाकर मजे से खा जाता। खाने के बाद वह बच्चों की 'हड्डियां' वहीं गिद्ध के कोटर में ही छोड़ देता था।

कई दिनों तक जब पक्षियों के बच्चे गायब होने लगे, तो लौटकर आने वाले माता-पिता बहुत परेशान हुए। उन्होंने अपने बच्चों की तलाश शुरू की।

जब बिलाव को लगा कि अब पक्षी पेड़ की तलाशी ले रहे हैं, तो वह चुपचाप वहाँ से भाग गया।

पक्षियों ने जब पेड़ का चप्पा-चप्पा छाना, तो उन्हें उस अंधे गिद्ध के कोटर में अपने बच्चों की अनगिनत 'हड्डियां' पड़ी हुई मिलीं!

पक्षियों ने बिना कुछ सोचे-समझे यह निष्कर्ष निकाल लिया कि उनके बच्चों को इस बूढ़े और अंधे गिद्ध ने ही खाया है। क्रोध में अंधे होकर सभी पक्षियों ने एक साथ मिलकर उस बेकसूर अंधे गिद्ध पर हमला कर दिया और उसे चोंच मार-मार कर वहीं मार डाला।

🎉 कहानी समाप्त

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