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बूढ़ा बाघ और लालची राहगीर — लालच का दलदल और मौत का फंदा

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बूढ़ा बाघ और लालची राहगीर — लालच का दलदल और मौत का फंदा

दक्षिण के एक बहुत ही घने जंगल में एक बहुत बूढ़ा बाघ रहता था। बुढ़ापे के कारण उसके दांत और नाखून घिस चुके थे, और उसमें अब इतनी ताक़त नहीं बची थी कि वह हिरण या अन्य जानवरों के पीछे दौड़कर उनका शिकार कर सके।

भूख से मरने की नौबत आ गई थी। अपनी जान बचाने के लिए उस चतुर बाघ ने एक बहुत ही खतरनाक और शातिर योजना बनाई।

बाघ के पास कहीं से एक बहुत ही कीमती 'सोने का कंगन' आ गया था। बाघ जंगल के किनारे एक बहुत बड़े 'दलदल' के पास जाकर खड़ा हो गया। उस दलदल के दूसरी तरफ से एक कच्चा रास्ता गुज़रता था जहाँ से राहगीर आते-जाते थे।

बाघ ने अपने पंजे में वह सोने का कंगन पकड़ा और जैसे ही उसने रास्ते पर एक राहगीर को आते देखा, वह ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ लगाने लगा: "अरे ओ भाई राहगीर! सुनो! मेरे पास यह एक बहुत कीमती सोने का कंगन है। मैं इसे दान करना चाहता हूँ। आओ और यह सोने का कंगन मुझसे ले लो।"

राहगीर ने आवाज़ सुनी। उसने देखा कि एक खूंखार बाघ उसे बुला रहा है। राहगीर के मन में एक तरफ 'सोने का कंगन' पाने का भयंकर लालच जाग उठा, लेकिन दूसरी तरफ उसे बाघ से डर भी लग रहा था।

राहगीर ने दूर से ही चिल्लाकर कहा: "सोने का कंगन तो बहुत अच्छा है, लेकिन तुम तो एक बाघ हो! जानवरों को मारना तुम्हारा स्वभाव है। मैं तुम पर कैसे विश्वास कर लूँ कि मैं पास आऊँगा तो तुम मुझे नहीं खाओगे?"

बाघ की चिकनी-चुपड़ी बातें: बाघ ने बहुत ही दयनीय और शांत आवाज़ में कहा: "भाई! तुम्हारी बात बिल्कुल सही है। जवानी के दिनों में मैं बहुत दुष्ट था। मेरे उन पापों के कारण ही मेरी पत्नी और बच्चे मर गए, और आज मैं बेसहारा हूँ।"

बाघ ने आगे कहा: "परंतु कुछ दिन पहले मुझे एक 'महान संत' मिले। उन्होंने मुझे उपदेश दिया कि मुझे अपने पापों का प्रायश्चित करना चाहिए। उनकी बात मानकर अब मैंने मांस खाना छोड़ दिया है। मैं रोज़ स्नान करता हूँ और दान-पुण्य करता हूँ। देखो, मेरे नाखून और दांत भी टूट चुके हैं। भला मैं तुम्हें कैसे मार सकता हूँ? मैं तो बस यह सोने का कंगन किसी योग्य इंसान को दान करना चाहता हूँ।"

राहगीर पूरी तरह से बाघ की चिकनी-चुपड़ी बातों और धर्म-कर्म के दिखावे में फँस गया। उसके मन का सारा डर 'लालच' के आगे खत्म हो गया।

बाघ ने उसे निर्देश दिया: "भाई, दान की वस्तु को पवित्र होकर लेना चाहिए। तुम सामने वाले 'सरोवर' (जो असल में एक दलदल था) में जाकर स्नान कर लो और फिर आकर यह कंगन ले लो।"

लालच में अंधा राहगीर बिना सोचे-समझे उस सरोवर की तरफ बढ़ा। जैसे ही उसने पानी में पैर रखा, वह धड़ाम से उस गहरे 'दलदल' में गिर गया! कीचड़ इतना गहरा और चिपचिपा था कि वह जितना बाहर निकलने की कोशिश करता, उतना ही अंदर धँसता जाता।

राहगीर को दलदल में फँसा देखकर बाघ ने बहुत ही प्यार से कहा: "अरे रे! तुम तो गहरे दलदल में फँस गए। घबराओ मत, मैं धीरे-धीरे तुम्हारे पास आता हूँ और तुम्हें बाहर निकालता हूँ।"

बाघ बहुत आराम से, धीरे-धीरे दलदल के किनारे-किनारे चलकर उस बेबस राहगीर के पास पहुँचा। राहगीर कीचड़ में इस तरह फँस चुका था कि वह हिल भी नहीं सकता था। बाघ ने राहगीर की गर्दन पकड़ी और उसे आसानी से अपना भोजन बना लिया। सोने का कंगन वहीं पड़ा रह गया, किसी और लालची का इंतज़ार करने के लिए।

🎉 कहानी समाप्त

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