खटमल और जूं की कहानी — बिना सोचे-समझे दी गई शरण और मौत

विजयनगर के राजा के शयनकक्ष में एक बहुत ही आलीशान और मखमली बिस्तर था। उस बिस्तर की सिलवटों में 'मंदविसर्पिणी' नाम की एक सफेद जूं रहती थी।
वह जूं बहुत ही समझदार और शांत थी। वह रोज़ रात को जब राजा गहरी नींद में सो जाता, तो चुपके से बाहर निकलती और राजा का थोड़ा सा खून पीकर वापस छिप जाती। राजा को उसके काटने का कभी पता ही नहीं चलता था। वह बहुत मजे से अपनी ज़िंदगी गुज़ार रही थी।
एक दिन राजा के बिस्तर पर 'अग्निमुख' नाम का एक खटमल कहीं से उड़कर आ गया। खटमल को देखकर जूं ने कहा: "अरे भाई! तुम यहाँ से चले जाओ। यह राजा का बिस्तर है। यहाँ सिर्फ मेरा अधिकार है।"
खटमल बहुत लालची था। उसने जूं की खुशामद करते हुए कहा: "दीदी! मैंने आज तक सिर्फ गरीब और साधारण लोगों का रूखा-सूखा खून पिया है। राजा का खून बहुत मीठा और पौष्टिक होगा। कृपया मुझे बस एक रात के लिए यहाँ मेहमान बनकर रहने दो।"
जूं की शर्त: जूं को उस पर दया आ गई। उसने कहा: "ठीक है, तुम रह सकते हो। परंतु तुम्हें मेरी तरह शांति से रहना होगा। राजा का शरीर बहुत कोमल होता है। तुम उसे तभी काटना जब वह गहरी नींद में हो, और बिल्कुल धीरे से काटना।"
खटमल ने शर्त मान ली और दोनों इंतज़ार करने लगे।
खटमल की जल्दबाज़ी और निर्दोष की मौत: रात हुई। राजा अपने शयनकक्ष में आया और बिस्तर पर लेटा। राजा को अभी नींद आई भी नहीं थी, वह बस लेटा ही था।
खटमल से लालच के मारे इंतज़ार नहीं हुआ। जैसे ही राजा बिस्तर पर लेटा, खटमल ने राजा की कोमल पीठ पर ज़ोर से एक गहरा और दर्दनाक डंक मार दिया!
डंक लगते ही राजा दर्द से चीख पड़ा और झटके से उठ बैठा। उसने अपने सेवकों को चिल्लाकर बुलाया: "मेरे बिस्तर में ज़रूर कोई खटमल या कीड़ा है! जिसने मुझे बुरी तरह काटा है। तुरंत पूरे बिस्तर की तलाशी लो!"
सेवक दौड़े आए। उन्होंने बिस्तर की चादरें हटानी शुरू कीं।
इधर, शातिर खटमल तो डंक मारते ही फुर्ती से बिस्तर के एक बहुत गहरे कोने (लकड़ी की दरार) में जाकर छिप गया था। परंतु बेचारी जूं बहुत सुस्त थी, वह जल्दी से भाग नहीं पाई।
जब सेवकों ने बिस्तर छाना, तो उन्हें दरार में छिपा हुआ तेज़ खटमल तो नहीं मिला, परंतु चादर के बीचों-बीच धीरे-धीरे रेंगती हुई वह बेचारी 'जूं' मिल गई।
सेवकों ने तुरंत उस जूं को पकड़ा और उसे मसल कर मार डाला।
नीति / सीख: किसी भी अनजान, लालची या स्वभाव से दुष्ट व्यक्ति को अपने घर में बिना सोचे-समझे पनाह नहीं देनी चाहिए। दुष्टों की संगति और उनकी गलतियों का खामियाज़ा हमेशा सज्जन और निर्दोष लोगों को ही भुगतना पड़ता है।
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