सियार और युद्ध का ढोल — अनजाने डर का सामना और हकीकत

एक जंगल में गोमाय नाम का एक सियार रहता था। एक दिन वह बहुत भूखा था और भोजन की तलाश में भटकते-भटकते जंगल के बहुत गहरे हिस्से में पहुँच गया।
भटकते हुए वह एक ऐसे खुले मैदान में आ गया, जहाँ कुछ दिन पहले दो राजाओं के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ था। मैदान में पुराने टूटे हुए हथियार और रथ पड़े थे। उसी मैदान में एक पेड़ के पास एक बहुत बड़ा 'युद्ध का ढोल' पड़ा हुआ था।
अचानक तेज़ हवा चलने लगी। पेड़ की कुछ सूखी और भारी टहनियां हवा के झोंके से नीचे लटकने लगीं और उस ढोल पर ज़ोर-ज़ोर से टकराने लगीं।
ढम! ढम! ढमाढम!
ढोल में से बहुत ही भयानक और तेज़ आवाज़ आने लगी।
सियार का डर: गोमाय सियार ने अपनी ज़िंदगी में कभी ढोल नहीं देखा था और न ही इतनी तेज़ आवाज़ सुनी थी। वह डर के मारे कांपने लगा। उसने सोचा, "बाप रे! यह आवाज़ करने वाला कोई बहुत बड़ा और खूंखार राक्षस है! अगर इसने मुझे देख लिया, तो यह मुझे ज़िंदा चबा जाएगा। मुझे तुरंत यहाँ से भाग जाना चाहिए!"
सियार दुम दबाकर उलटे पांव भागने ही वाला था कि अचानक उसके दिमाग में एक विचार आया।
उसने सोचा, "अगर मैं बिना देखे ही डर कर भाग गया, तो मुझे हमेशा इस बात का पछतावा रहेगा। मैं इतना भी कायर नहीं हूँ। मुझे छिपकर देखना चाहिए कि यह भयानक आवाज़ करने वाला जानवर आखिर है कौन!"
डर के आगे जीत: सियार बहुत ही सावधानी से, झाड़ियों के पीछे छिपता हुआ उस आवाज़ की दिशा में आगे बढ़ा। जब वह पेड़ के करीब पहुँचा, तो उसने देखा कि आवाज़ किसी खूंखार जानवर से नहीं, बल्कि चमड़े से मढ़े हुए एक निर्जीव गोल ढांचे (ढोल) से आ रही है। और वह आवाज़ पेड़ की टहनियों के टकराने से हो रही है।
सियार की जान में जान आई। उसका सारा डर पल भर में गायब हो गया।
जब सियार उस ढोल के पास गया, तो उसे उसी ढोल के पीछे युद्ध में मारे गए घोड़ों और हाथियों का कुछ मांस पड़ा हुआ मिल गया। सियार ने आराम से पेट भर कर अपना भोजन किया और खुशी-खुशी अपने घर लौट गया।
नीति / सीख: अज्ञात चीज़ों या अजीब आवाज़ों से बिना वजह डर कर भागना कायरता है। किसी भी डर का सामना करके उसकी 'सच्चाई' जानने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि कई बार जिस चीज़ से हम डर रहे होते हैं, वह अंदर से बिल्कुल खोखली (ढोल की तरह) निकलती है।
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