आगरा के कौवे — एक असंभव प्रश्न और बीरबल की अद्भुत हाज़िरजवाबी

यह बात उन दिनों की है जब मुग़ल साम्राज्य अपनी पूरी शान-ओ-शौकत पर था और आगरा शहर दुनिया के सबसे खुशहाल शहरों में गिना जाता था। एक सुहावनी शाम, शहंशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर अपने शाही बाग (गार्डन) में टहल रहे थे। उनके साथ मुल्ला दो प्याज़ा, राजा टोडरमल, तानसेन और उनके सबसे प्रिय मंत्री बीरबल सहित कई नवरत्न मौजूद थे।
आसमान में ढलते हुए सूरज की लालिमा छाई हुई थी और पक्षियों के झुंड अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे। बाग के ऊंचे पेड़ों पर सैकड़ों कौवे बैठकर कांव-कांव का शोर मचा रहे थे।
शहंशाह अकबर स्वभाव से बड़े ही जिज्ञासु थे और उन्हें अपने दरबारियों की बुद्धिमत्ता की परीक्षा लेने में बड़ा आनंद आता था। शोर मचाते हुए कौवों को देखकर अकबर के चेहरे पर एक शरारती मुस्कान आ गई।
अकबर ने अचानक अपने कदम रोके और अपने दरबारियों की ओर मुड़कर एक बेहद अजीब सवाल पूछा: "मेरे अज़ीज़ वज़ीरों! एक शहंशाह होने के नाते मुझे अपनी रियासत के हर इंसान की खबर रहती है। मेरी सेना में कितने घोड़े और हाथी हैं, यह भी मुझे पता है। परंतु आज मेरे मन में एक सवाल उठा है—क्या आप में से कोई बता सकता है कि हमारी इस पूरी राजधानी आगरा में कुल कितने कौवे हैं?"
दरबारियों की परेशानी और घबराहट: यह सवाल सुनकर सभी दरबारियों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। भला शहर के कौवों को कौन गिन सकता है? वे तो कभी एक डाल पर बैठते हैं, तो कभी उड़कर मीलों दूर चले जाते हैं।
मुल्ला दो प्याज़ा, जो हमेशा खुद को सबसे अधिक बुद्धिमान साबित करने की होड़ में रहते थे, उन्होंने घबराते हुए कहा, "जहाँपनाह! यह तो प्रकृति का खेल है। परिंदों को कैसे गिना जा सकता है? इसके लिए तो कम से कम एक साल का वक्त और दस हज़ार सैनिकों की ज़रूरत पड़ेगी जो शहर के चप्पे-चप्पे में जाकर कौवे गिनें।"
राजा टोडरमल (वित्त मंत्री) ने कहा, "हुज़ूर, इस काम में तो शाही खजाने से बहुत धन खर्च हो जाएगा और गिनती फिर भी सटीक नहीं होगी।"
बाकी दरबारी भी सिर झुकाए खड़े रहे। किसी को कोई उत्तर नहीं सूझ रहा था। अकबर को लगा कि आज उन्होंने एक ऐसा सवाल पूछ लिया है जिसका जवाब किसी के पास नहीं है।
बीरबल की हाज़िरजवाबी: तभी दरबार के सन्नाटे को चीरते हुए एक शांत और आत्मविश्वासी आवाज़ गूंजी। "जहाँपनाह! मुझे सैनिकों या शाही खजाने की कोई आवश्यकता नहीं है। मुझे हमारे आगरा शहर के कौवों की बिल्कुल सटीक गिनती मालूम है।" यह आवाज़ बीरबल की थी।
अकबर ने हैरानी से अपनी भौंहें सिकोड़ीं और पूछा, "क्या सचमुच? तो बताओ बीरबल, आगरा में कुल कितने कौवे हैं?"
बीरबल ने बिना एक पल की देरी किए, पूरे आत्मविश्वास के साथ एक अत्यंत सटीक आंकड़ा दे दिया: "हुज़ूर! हमारी राजधानी आगरा में इस समय ठीक 21,523 (इक्कीस हज़ार पांच सौ तेईस) कौवे हैं। न एक कम, न एक ज़्यादा!"
अकबर का मनोवैज्ञानिक जाल: दरबारी यह सुनकर अवाक रह गए। मुल्ला दो प्याज़ा मन ही मन खुश होने लगे कि आज बीरबल ने झूठ बोला है और शहंशाह के हाथों आज इसकी गर्दन नप जाएगी।
अकबर ने बीरबल को फंसाने के इरादे से अपनी आंखें तरेरते हुए कहा, "बीरबल! ज़रा सोच-समझकर जवाब दो। कल सुबह मैं अपने सिपाहियों से पूरे शहर के कौवों की गिनती करवाऊँगा। यदि गिनती तुम्हारे बताए गए आंकड़े (21,523) से ज़्यादा निकली, तो मैं क्या समझूँ?"
बीरबल ज़रा भी नहीं घबराए। उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई। उन्होंने हाथ जोड़कर, अत्यंत चतुराई से उत्तर दिया: "जहाँपनाह! यदि कल सिपाहियों की गिनती में कौवे 21,523 से ज़्यादा निकलें, तो समझ लीजिएगा कि पड़ोस के शहरों (जैसे दिल्ली या फतेहपुर सीकरी) से कुछ कौवे अपने रिश्तेदारों से मिलने आगरा छुट्टियां बिताने आए हुए हैं।"
यह सुनकर अकबर की हंसी छूटने ही वाली थी कि उन्होंने खुद को रोका और एक अंतिम तीर छोड़ा: "और बीरबल... यदि कल गिनती में कौवे 21,523 से कम निकले, तब तुम क्या बहाना बनाओगे?"
बीरबल ने तुरंत झुककर सलाम किया और जवाब दिया: "तब तो बात और भी साफ है हुज़ूर! यदि कौवे कम निकलें, तो इसका सीधा सा अर्थ यही है कि हमारे आगरा शहर के कुछ कौवे छुट्टियों में अपने रिश्तेदारों से मिलने दूसरे शहरों में गए हुए हैं!"
शहंशाह का अट्टहास और ईर्ष्यालु दरबारियों की हार: बीरबल का यह अचूक और हाज़िरजवाबी से भरा जवाब सुनकर शहंशाह अकबर अपनी हंसी नहीं रोक पाए। वे ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। अकबर समझ गए थे कि कुछ सवालों के जवाब गणित या विज्ञान में नहीं, बल्कि 'बुद्धिमत्ता और हाज़िरजवाबी' में छिपे होते हैं।
अकबर ने अपनी गले की कीमती मोतियों की माला उतारी और बीरबल को पहनाते हुए कहा, "लाजवाब बीरबल! तुम्हारी अक्ल का कोई सानी (मुकाबला) नहीं है। तुमने साबित कर दिया कि एक बुद्धिमान व्यक्ति हर मुश्किल सवाल का जवाब अपने दिमाग की उपस्थिति से दे सकता है।"
मुल्ला दो प्याज़ा और अन्य दरबारी जो बीरबल को नीचा देखने की उम्मीद लगाए बैठे थे, वे अपना सा मुंह लेकर रह गए। आगरा के बागों में आज भी बीरबल की चतुराई का यह किस्सा हवाओं में गूंजता है।
(यह कहानी हमें सिखाती है कि जब सवाल ही बेतुका हो, तो उसका जवाब भी उसी के अंदाज़ में और आत्मविश्वास के साथ देना चाहिए।
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