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👑 अकबर-बीरबल

किस्सा 7: कुएं का पानी — लालच का फंदा और बीरबल का अचूक न्याय

लोक परंपरा — अकबर-बीरबल5 मिनट का पठन
किस्सा 7: कुएं का पानी — लालच का फंदा और बीरबल का अचूक न्याय

आगरा शहर के बाहरी हिस्से में रामू नाम का एक बेहद सीधा-सादा और गरीब किसान रहता था। रामू के पास थोड़ी सी ज़मीन थी, लेकिन सिंचाई के लिए पानी का कोई साधन नहीं था। उसकी ज़मीन के ठीक बगल में शहर के एक बहुत ही लालची और धूर्त व्यापारी 'सेठ ताराचंद' का एक कुआं था।

रामू ने अपनी जीवन भर की जमापूंजी (लगभग 500 चांदी के सिक्के) इकट्ठी की और सेठ ताराचंद के पास जाकर उसका वह कुआं खरीद लिया। सेठ ने खुशी-खुशी पैसे लिए और कुएं के कागज़ात रामू के नाम कर दिए। रामू बहुत खुश था कि अब उसकी फसलें पानी के बिना नहीं सूखेंगी।

धूर्त व्यापारी का छल: अगली सुबह, जब रामू अपनी बाल्टी और रस्सी लेकर कुएं से पानी निकालने पहुँचा, तो सेठ ताराचंद अपने कुछ लठैतों (पहलवानों) के साथ वहां आ धमका।

सेठ ने रामू को रोकते हुए कहा, "अरे ओ रामू! यह क्या कर रहा है? तू इस कुएं से पानी नहीं निकाल सकता।" रामू ने हैरानी से कहा, "पर सेठ जी, कल ही तो मैंने 500 सिक्के देकर यह कुआं आपसे खरीदा है। अब यह कुआं मेरा है।"

सेठ ताराचंद ने एक कुटिल मुस्कान के साथ कहा, "बिल्कुल! तूने मुझसे 'कुआं' खरीदा है, और मैंने तुझे केवल 'कुआं' ही बेचा है। मैंने उस कुएं के भीतर का 'पानी' तुझे नहीं बेचा! पानी आज भी मेरा है। यदि तुझे पानी चाहिए, तो या तो हर बाल्टी का अलग से पैसा दे, या फिर मेरा कुआं छोड़कर चला जा!"

रामू यह बेतुका और धोखेबाज़ तर्क सुनकर सन्न रह गया। वह अनपढ़ था और सेठ के इस शाब्दिक जाल में फंस चुका था। रोता-गिड़गिड़ाता रामू सीधा आगरा के किले में शहंशाह अकबर के 'दीवान-ए-आम' में न्याय मांगने पहुँच गया।

दीवान-ए-आम में न्याय की गुहार: रामू ने रोते हुए शहंशाह के सामने पूरी बात बताई। अकबर यह सुनकर अत्यंत क्रोधित हुए कि उनके राज में एक गरीब किसान को इस तरह ठगा जा रहा है। उन्होंने तुरंत सिपाहियों को भेजकर सेठ ताराचंद को दरबार में पेश होने का हुक्म दिया।

सेठ ताराचंद दरबार में आया। वह बिल्कुल नहीं डरा हुआ था, क्योंकि उसे लगता था कि कानून की नज़रों में उसका तर्क बिल्कुल सही है।

अकबर ने कड़कती आवाज़ में पूछा, "सेठ! जब तूने इस किसान को अपना कुआं बेच दिया है, तो अब इसे पानी निकालने से क्यों रोक रहा है?"

सेठ ने बड़ी चतुराई से हाथ जोड़कर कहा, "जहाँपनाह! मैं कानून का पक्का हूँ। कागज़ात में साफ लिखा है कि मैंने अपनी ज़मीन और 'कुआं' बेचा है, पानी का कोई ज़िक्र नहीं है। इसलिए कुआं रामू का है, पर उसके भीतर का पानी मेरा है। मैं अपनी चीज़ इसे मुफ्त में कैसे दे दूँ?"

अकबर भी सेठ के इस तर्क को सुनकर एक पल के लिए चकरा गए। बात तो कानूनी रूप से उलझी हुई थी। अकबर ने मुस्कुराते हुए अपने सबसे चतुर वज़ीर की ओर देखा—"बीरबल! क्या तुम्हारे पास इस लालची सेठ के तर्क का कोई जवाब है?"

बीरबल का अचूक पलटवार: बीरबल अपनी जगह से उठे। उन्होंने सेठ ताराचंद को ऊपर से नीचे तक देखा और अत्यंत शांत स्वर में कहा: "सेठ ताराचंद! तुम बिल्कुल सही कह रहे हो। कानून और सौदे के कागज़ात के हिसाब से तुम अपनी जगह 100 प्रतिशत सही हो। कुआं रामू का है और पानी तुम्हारा है।"

यह सुनकर रामू के पैरों तले ज़मीन खिसक गई और सेठ ताराचंद खुशी से फूलकर कुप्पा हो गया। उसे लगा कि आज तो उसने बीरबल को भी हरा दिया।

परंतु बीरबल की बात अभी खत्म नहीं हुई थी। बीरबल ने अचानक अपना स्वर कठोर किया और सेठ की आंखों में आंखें डालकर कहा:

"परंतु सेठ! जब कुआं रामू का है और पानी तुम्हारा है, तो तुमने अपना पानी रामू के कुएं में क्यों रखा हुआ है? तुम रामू की संपत्ति (कुएं) का बिना इजाज़त इस्तेमाल कर रहे हो! इसलिए, मुग़ल सल्तनत के न्याय के अनुसार, तुम्हारे पास दो ही रास्ते हैं—

या तो आज शाम तक अपना सारा पानी रामू के कुएं से बाहर निकाल लो... या फिर, जब तक तुम्हारा पानी रामू के कुएं में रखा है, तब तक तुम्हें रामू को प्रतिदिन 50 चांदी के सिक्के 'किराये' के रूप में देने होंगे! अब बताओ सेठ, तुम दोनों में से क्या चुनोगे?"

लालच का फंदा और सेठ की हार: बीरबल का यह तार्किक और अचूक वार सुनते ही सेठ ताराचंद के होश उड़ गए। कुएं से सारा पानी निकालना असंभव था, और रोज़ 50 सिक्के किराया देने का मतलब था कि कुछ ही दिनों में वह दिवालिया हो जाता। सेठ अपने ही बिछाए जाल में बुरी तरह फंस चुका था।

सेठ की सारी हेकड़ी निकल गई। वह कांपता हुआ रामू के पैरों में गिर पड़ा और शहंशाह से क्षमा मांगने लगा।

अकबर बीरबल की इस हाज़िरजवाबी पर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। शहंशाह ने आदेश दिया, "इस धूर्त सेठ को 500 कोड़ों की सज़ा दी जाए और कुएं के साथ-साथ इसका पूरा पानी हमेशा के लिए रामू का घोषित किया जाए!"

किसान रामू खुशी-खुशी बीरबल को दुआएं देता हुआ अपने घर लौट गया और आगरा में एक बार फिर बीरबल के न्याय का डंका बज गया।

(लालच हमेशा इंसान की मति भ्रष्ट कर देता है और चतुर व्यक्ति उसी लालच को हथियार बना लेता है।

🎉 कहानी समाप्त

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