मातृभाषा का रहस्य — एक घमंडी विद्वान की चुनौती और बीरबल की मनोवैज्ञानिक परीक्षा

मुग़ल दरबार अपनी शान-ओ-शौकत और वहां मौजूद 'नवरत्नों' की बुद्धिमत्ता के लिए पूरी दुनिया में मशहूर था। एक दिन, आगरा के दीवान-ए-खास में दक्षिण भारत से एक अत्यंत प्रसिद्ध और ज्ञानी महापंडित आए। उनका वेश बहुत ही साधारण था, परंतु उनके चेहरे पर असीम ज्ञान का अहंकार साफ झलक रहा था।
शहंशाह अकबर ने उनका शाही सत्कार किया। दरबार की कार्यवाही शुरू होते ही उस महापंडित ने मुग़ल दरबार के सामने एक अजीब और कठिन चुनौती रख दी।
पंडित ने अत्यंत गर्व के साथ कहा, "जहाँपनाह! मैंने सुना है कि आपके दरबार में एक से बढ़कर एक विद्वान मौजूद हैं। मैं दुनिया की दर्जनों भाषाएं बिल्कुल उसी लहज़े और शुद्धता के साथ बोल सकता हूँ, जिस तरह वहां के मूल निवासी बोलते हैं। मेरी चुनौती यह है कि आपके नवरत्नों को मेरी 'मातृभाषा' पहचानी होगी। यदि वे सफल हुए, तो मैं आपका दास बन जाऊँगा, और यदि वे असफल रहे, तो आपको मानना होगा कि मेरे ज्ञान के सामने आपके नवरत्न कुछ भी नहीं हैं!"
दरबारियों की विफलता और अकबर की चिंता: चुनौती स्वीकार कर ली गई। पंडित ने दरबार के बीच खड़े होकर एक के बाद एक कई भाषाएं बोलना शुरू किया। उसने ठेठ लहज़े में फारसी (Persian) में कविताएं पढ़ीं, फिर एकदम शुद्ध अरबी बोली। उसके बाद उसने संस्कृत के कठिन श्लोक सुनाए, और फिर तुर्की, पश्तो, और ब्रज भाषा में धाराप्रवाह बातें कीं।
कमाल की बात यह थी कि जब वह जो भाषा बोलता, ऐसा लगता मानो वही उसकी मातृभाषा हो। उसके उच्चारण में रत्ती भर भी कोई कमी नहीं थी।
मुल्ला दो प्याज़ा, अबुल फज़ल, फैज़ी और राजा टोडरमल जैसे बड़े-बड़े विद्वानों ने अपनी-अपनी किस्मत आज़माई। किसी ने कहा उसकी मातृभाषा फारसी है, तो किसी ने संस्कृत बताया। परंतु पंडित हर बार हंसकर सिर हिला देता— "नहीं, आपका जवाब गलत है।"
शहंशाह अकबर के माथे पर पसीना आ गया। मुग़ल दरबार की इज्ज़त दांव पर लगी थी। एक विदेशी विद्वान ने उनके पूरे दरबार को मूर्ख साबित कर दिया था। अंततः अकबर ने अपनी आखिरी उम्मीद की ओर देखा—"बीरबल! क्या तुम मुग़ल सल्तनत की प्रतिष्ठा बचा सकते हो?"
बीरबल ने अपनी जगह से उठकर पंडित को झुककर सलाम किया और अकबर से कहा, "जहाँपनाह! मुझे बस कल सुबह तक की मोहलत इनायत करें। कल दरबार शुरू होते ही मैं पंडित जी की असली मातृभाषा बता दूँगा।" पंडित मुस्कुराया और उसने बीरबल की बात मान ली।
बीरबल की रात की जासूसी: रात का समय था। पंडित जी शाही मेहमानखाने के एक अत्यंत आलीशान कक्ष में गहरी और मीठी नींद सो रहे थे।
तभी बीरबल दबे पांव, एक कंबल ओढ़कर चुपके से पंडित के कमरे में दाखिल हुए। बीरबल के हाथ में सूखी घास का एक लंबा तिनका था। बीरबल पंडित के बिस्तर के पास गए और उस घास के तिनके से पंडित के कान में हल्की सी गुदगुदी की।
नींद में खलल पड़ने से पंडित ने अपना सिर हिलाया और करवट बदल ली। बीरबल ने फिर से वही तिनका पंडित की नाक और कान पर फेरा। इस बार नींद टूट जाने की झल्लाहट और अचानक हुए इस शारीरिक व्यवधान से पंडित अत्यंत क्रोधित होकर एकदम बिस्तर से उठ बैठा।
जैसे ही पंडित उठा, वह गहरी नींद के खुमार और गुस्से में ज़ोर से चिल्लाया— "ఎవరు అక్కడ? నన్ను ఎందుకు ఇబ్బంది పెడుతున్నారు?" (तेलुगु: एवरु अक्कड़ा? नन्नु एंदुकु इब्बन्दि पेडुतुन्नारु? — कौन है वहां? मुझे परेशान क्यों कर रहे हो?)
और इसके साथ ही उसने अपनी उसी क्षेत्रीय भाषा (तेलुगु) में कुछ गालियां भी बक दीं। बीरबल ने जो सुनना था, वह सुन लिया। वे चुपचाप अंधेरे का फायदा उठाकर वहां से खिसक गए।
दीवान-ए-खास की सुबह और रहस्य का पर्दाफाश: अगली सुबह पूरा दरबार खचाखच भरा था। पंडित अपनी उसी अकड़ के साथ सीना ताने खड़ा था। उसने बीरबल से पूछा, "तो बीरबल! क्या तुम मेरी मातृभाषा का पता लगा पाए?"
बीरबल ने शांत स्वर में, बिना किसी झिझक के कहा: "जहाँपनाह! इस ज्ञानी पंडित की मातृभाषा 'तेलुगु' है!"
यह सुनते ही पंडित का चेहरा पीला पड़ गया। उसका सारा अहंकार टूट कर बिखर गया। उसने अपना सिर झुका लिया और हार मानते हुए कहा, "शहंशाह की जय हो! बीरबल का जवाब बिल्कुल सही है।"
अकबर की हैरानी और बीरबल का मनोवैज्ञानिक सिद्धांत: अकबर खुशी से उछल पड़े, परंतु वे हैरान भी थे। उन्होंने पूछा, "बीरबल, जो पंडित फारसी और अरबी भी इतनी सफाई से बोलता है कि पता ही न चले, तुमने उसकी मातृभाषा कैसे पकड़ ली?"
बीरबल ने मुस्कुराते हुए बीती रात का पूरा किस्सा दरबार में सुनाया और अंत में मानव मनोविज्ञान का एक बहुत गहरा सत्य बताया: "हुज़ूर! इंसान चाहे कितनी भी भाषाएं सीख ले और चाहे कितना भी बड़ा विद्वान बन जाए, परंतु जब वह अचानक किसी संकट, अत्यधिक क्रोध, भय या गहरी नींद में होता है, तो उसके मुँह से निकलने वाले सबसे पहले शब्द उसकी मातृभाषा में ही होते हैं। संकट के समय इंसान का दिमाग सीखी हुई भाषाओं को भूलकर, अपनी उस ज़बान पर लौट आता है जो उसने अपनी माँ की गोद में सीखी होती है।"
बीरबल का यह गहरा तार्किक जवाब सुनकर शहंशाह अकबर और पूरा दरबार तालियों की गूंज से भर उठा। विदेशी पंडित ने आगे बढ़कर बीरबल को गले लगाया और मुग़ल दरबार के इस नवरत्न की बुद्धिमत्ता के सामने नतमस्तक होकर वापस अपने देश लौट गया।
(बीरबल ने एक बार फिर साबित कर दिया कि किताबी ज्ञान से बड़ा व्यावहारिक ज्ञान होता है। जब आप तैयार हों, तो हम अगले अत्यंत रोचक किस्से किस्सा 5: स्वर्ग की यात्रा की ओर बढ़ें, जहाँ दरबारियों ने बीरबल को जान से मारने का एक खौफनाक षड्यंत्र रचा था!)
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