हरे घोड़े की खोज — बादशाह की ज़िद और बीरबल की असंभव शर्त

यह बसंत ऋतु का समय था। आगरा के शाही बाग (गार्डन) अपनी पूरी सुंदरता पर थे। चारों ओर हरियाली छाई हुई थी और रंग-बिरंगे फूल खिले थे। शहंशाह अकबर अपने सबसे प्रिय मंत्री बीरबल के साथ बाग में टहल रहे थे।
अकबर प्रकृति की इस हरियाली को देखकर बहुत प्रसन्न थे। अचानक उनके मन में एक अजीब और शरारती ख्याल आया। वे हमेशा बीरबल की बुद्धिमत्ता की परीक्षा लेने के नए-नए बहाने खोजते रहते थे।
अकबर ने अचानक रुककर कहा, "बीरबल! इस बाग की हरियाली देखकर मेरा मन अत्यंत प्रसन्न हो गया है। मेरी इच्छा है कि मैं इस हरियाली के बीच एक हरे रंग के घोड़े पर बैठकर सवारी करूँ।"
बीरबल ने हैरानी से अकबर की ओर देखा। पूरी दुनिया जानती है कि घोड़े काले, सफेद, भूरे या चितकबरे हो सकते हैं, परंतु हरे रंग का घोड़ा तो ईश्वर ने भी नहीं बनाया।
अकबर ने अपनी ज़िद को शाही आदेश में बदलते हुए कहा: "बीरबल, मैं तुम्हें ठीक सात दिन का वक़्त देता हूँ। मुझे सात दिन के भीतर एक हरा घोड़ा चाहिए। यदि तुम मुझे हरा घोड़ा लाकर नहीं दे सके, तो मुझे कभी अपनी शक्ल मत दिखाना और दरबार में कदम मत रखना!"
बीरबल का अज्ञातवास और आराम: बीरबल मुस्कुराए। वे शहंशाह की फितरत को बहुत अच्छी तरह समझते थे। वे जानते थे कि शहंशाह को भी पता है कि हरा घोड़ा दुनिया में नहीं होता; वे तो बस बीरबल को फंसाना चाहते हैं।
बीरबल ने सिर झुकाकर शहंशाह का आदेश मान लिया। अगले सात दिनों तक बीरबल ने घोड़े की कोई खोज नहीं की। वे अपने घर पर रहे, अपने परिवार के साथ स्वादिष्ट भोजन किया, मीठी नींद सोए और अपनी 7 दिन की 'पेड लीव' का भरपूर आनंद लिया।
आठवें दिन का दरबार: सात दिन बीत गए। आठवें दिन सुबह बीरबल दीवान-ए-खास (शाही दरबार) में हाज़िर हुए।
अकबर मन ही मन बहुत खुश थे कि आज तो बीरबल खाली हाथ आया है, आज इसकी हार पक्की है। मुल्ला दो प्याज़ा और अन्य दरबारी भी बीरबल की हार देखने के लिए उत्सुक थे।
अकबर ने तंज कसते हुए पूछा, "आओ बीरबल! कहो, क्या तुमने मेरे लिए हरे रंग का घोड़ा खोज लिया है? या फिर हमेशा के लिए दरबार छोड़ने का इरादा है?"
बीरबल ने अत्यंत उत्साह और आत्मविश्वास के साथ झुककर सलाम किया और कहा, "जहाँपनाह! आपकी दुआ से मैंने हरे रंग का घोड़ा खोज निकाला है! वह एक बहुत ही नायाब और चमत्कारी घोड़ा है।"
यह सुनकर अकबर हैरान रह गए। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। उन्होंने पूछा, "क्या सचमुच? तो वह हरा घोड़ा है कहाँ? उसे तुरंत दरबार में पेश किया जाए!"
बीरबल का अचूक तार्किक वार: बीरबल ने अपनी आवाज़ को थोड़ा गंभीर करते हुए कहा: "हुज़ूर! घोड़ा तो मैं ले आता, परंतु उस घोड़े के मालिक ने वह घोड़ा मुझे देने से साफ मना कर दिया। मालिक का कहना है कि वह हरा घोड़ा वह केवल और केवल हिंदुस्तान के शहंशाह को ही सौंपेगा।"
अकबर ने उत्सुकता से कहा, "कोई बात नहीं! मैं खुद जाकर उस घोड़े को ले आऊँगा। बताओ वह कहाँ है?"
बीरबल ने अपनी असली चाल चलते हुए कहा: "जहाँपनाह! घोड़े के मालिक की दो अत्यंत कड़ी शर्तें हैं। पहली शर्त यह है कि घोड़े को लाने के लिए आपको स्वयं ही जाना होगा, जो आपने मान ली है।"
अकबर: "और दूसरी शर्त क्या है?"
बीरबल ने हल्की सी मुस्कान के साथ शहंशाह की आंखों में देखते हुए कहा: "हुज़ूर! दूसरी शर्त यह है कि चूंकि वह हरा घोड़ा पूरी दुनिया में सबसे नायाब है, इसलिए उस घोड़े को लाने का दिन भी नायाब ही होना चाहिए। मालिक ने कहा है कि शहंशाह उस घोड़े को सप्ताह के सात दिनों (सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार या रविवार) को छोड़कर... किसी भी अन्य दिन आकर ले जा सकते हैं!"
अहंकार का टूटना और बादशाह का अट्टहास: पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। बीरबल ने एक असंभव मांग (हरा घोड़ा) को काटने के लिए एक दूसरी असंभव शर्त (आठवां दिन) खड़ी कर दी थी।
अकबर एक पल के लिए सुन्न रह गए, और फिर अगले ही पल पूरे दीवान-ए-खास में उनका गगनभेदी अट्टहास गूंज उठा। वे ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। अकबर समझ गए कि बीरबल को शब्दों के जाल में फंसाना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है।
अकबर ने हंसते हुए बीरबल को अपने पास बुलाया और कहा, "वाह बीरबल वाह! जब हरा घोड़ा ही नहीं होता, तो सप्ताह के सात दिनों के अलावा कोई आठवां दिन कैसे हो सकता है? तुमने एक बार फिर साबित कर दिया कि तुम्हारी बुद्धि की धार मेरी तलवार की धार से भी तेज़ है।"
शहंशाह ने अपनी खुशी ज़ाहिर करते हुए बीरबल को मोतियों का हार इनाम में दिया और मुल्ला दो प्याज़ा समेत सभी जलने वाले दरबारी एक बार फिर अपना सा मुंह लेकर रह गए।
(असंभव का उत्तर असंभव से ही दिया जा सकता है, यही बीरबल की इस कहानी का सबसे बड़ा सबक है।
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