बीरबल की खिचड़ी

यह उस समय की बात है जब आगरा में कड़ाके की सर्दियां पड़ रही थीं और यमुना नदी का पानी किनारों पर जमने लगा था। एक शाम, शहंशाह अकबर ने महल के छज्जे से यमुना को देखकर बीरबल से पूछा, "क्या कोई इंसान इस जमे हुए पानी में पूरी रात खड़ा रह सकता है?" बीरबल ने शांत स्वर में कहा, "जहाँपनाह! गरीब के लिए भूख की आग सर्दी से बड़ी होती है। वह कुछ भी कर सकता है।" अकबर को यह बात हजम नहीं हुई। शहंशाह का अहंकार जागा और उन्होंने मुनादी करवा दी: "जो व्यक्ति आज रात जमे हुए पानी में छाती तक डूबकर पूरी रात बिताएगा, उसे 1000 सोने की मोहरें इनाम में मिलेंगी!"
एक गरीब का संघर्ष: शहर की एक तंग गली में रहने वाले अत्यंत गरीब ब्राह्मण 'हरिदास' की पत्नी बीमार और बेटी भूखी थी। उसने सोचा, "ठंड से मरना है या भूख से, यदि बच गया तो आने वाली पुश्तें गरीबी से आज़ाद हो जाएंगी।" यही सोचकर, वह कांपता हुआ यमुना के बर्फीले पानी में उतर गया।
यातना की रात: पानी में उतरते ही लगा मानो हज़ारों सुइयां चुभ गई हों। दांत किटकिटाने लगे। आधी रात तक आते-आते उसे लगा कि अब प्राण निकल जाएंगे। तभी, उसकी नज़र आगरा फोर्ट की एक ऊंची मीनार में जलते एक छोटे से दीपक पर पड़ी। हरिदास ने उस दीपक को जीवन का प्रतीक मानकर अपना सारा ध्यान उसी पर केंद्रित कर दिया और अपने अपार मानसिक बल से वह जानलेवा रात पार कर ली।
दीवान-ए-खास का अन्याय: अगली सुबह उसे कांपती हालत में दीवान-ए-खास लाया गया। अकबर हैरान थे। उन्होंने पूछा, "तुम ज़िंदा कैसे रहे?" हरिदास ने भोलापन से कहा, "हुज़ूर! मैंने तो बस आपके महल की मीनार में जलते एक दीपक को रात भर देखा और मन में आस जगाए रखी।" यह सुन मुल्ला दो प्याज़ा जैसे ईर्ष्यालु दरबारी बोले, "जहाँपनाह! इसने बेईमानी की है। इसे उसी दीपक की गर्मी से पूरी रात गरमाहट मिली है।" अकबर ने अपनी हार न मानते हुए कठोर स्वर में कहा, "मुल्ला सही कहते हैं। तुम्हें मेरे दीये से गर्मी मिली है। शर्त पूरी नहीं हुई, कोई इनाम नहीं मिलेगा। इसे धक्के मारकर बाहर निकाल दो!" बीरबल यह घोर अन्याय देखकर क्रोधित हुए, पर दरबार की मर्यादा के कारण चुप रहे।
बीरबल की हड़ताल और खिचड़ी का रहस्य: अगले दिन से बीरबल दरबार नहीं आए। पूछने पर सिपाही ने बताया, "बीरबल जी खिचड़ी पका रहे हैं।" लगातार तीन दिन तक यही जवाब मिला। अंततः अकबर का धैर्य टूटा और वे स्वयं मुल्ला दो प्याज़ा के साथ बीरबल की हवेली जा पहुँचे।
बाग में पहुँचकर अकबर हैरान रह गए। बीरबल ने ज़मीन पर एक छोटी सी आग जलाई थी और उससे लगभग 15 फीट ऊपर हवा में एक हांडी लटकाई थी। वे ज़मीन पर बैठे मजे से आग को हवा दे रहे थे।
अकबर ज़ोर से हंसे, "बीरबल! क्या तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है? आग ज़मीन पर और हांडी 15 फीट ऊपर आसमान में! यह खिचड़ी तो कयामत तक नहीं पकेगी!"
बीरबल ने तुरंत खड़े होकर अत्यंत तीक्ष्ण और व्यंग्यात्मक स्वर में कहा: "माफ़ी चाहूँगा जहाँपनाह! यदि आपके महल की मीनार में जलने वाले एक छोटे से दीये की गर्मी, एक मील दूर यमुना के ठंडे पानी में खड़े उस गरीब तक पहुँच सकती है... तो मेरी यह आग तो हांडी से केवल 15 फीट ही दूर है! यह खिचड़ी अवश्य पकेगी!"
अहंकार का टूटना: बीरबल के इस अचूक तार्किक वार ने अकबर को भीतर तक हिला दिया। उनका अहंकार टूट गया और उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ।
अकबर ने बीरबल को गले लगाकर कहा, "तुमने मेरी आंखें खोल दीं।" उसी दिन हरिदास को पूरे सम्मान के साथ बुलाया गया और अकबर ने क्षमा मांगते हुए उसे 1000 नहीं, बल्कि 2000 सोने की मोहरें इनाम में दीं।
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