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अंधेर नगरी चौपट राजा

भारतेंदु हरिश्चंद्र10 मिनट का पठन
अंधेर नगरी चौपट राजा

एक समय की बात है, एक बहुत ही ज्ञानी और सिद्ध 'महंत जी' (साधु) अपने दो चेलों के साथ तीर्थयात्रा पर निकले हुए थे। उनके चेलों के नाम थे— 'नारायण दास' और 'गोवर्धन दास'।

चलते-चलते वे तीनों एक बहुत ही सुंदर और बड़े नगर के बाहर पहुँचे। नगर की बनावट और बाज़ार देखकर महंत जी बहुत खुश हुए। उन्होंने अपने चेलों से कहा, "बच्चो! नगर तो बहुत सुंदर और बड़ा मालूम होता है। जाओ, बाज़ार में जाकर भिक्षा मांग कर लाओ। अगर अच्छी भिक्षा मिल गई, तो आज ठाकुर जी को बढ़िया भोग लगाएँगे।"

नारायण दास पूरब की तरफ गया और गोवर्धन दास पश्चिम की तरफ के बाज़ार में गया।

गोवर्धन दास जब बाज़ार में पहुँचा, तो वहाँ की रौनक देखकर हैरान रह गया। हलवाइयों की दुकानों पर गरमा-गरम जलेबियाँ, लड्डू, पेड़े और रसगुल्ले सजे हुए थे। सब्ज़ी वाले हरी-हरी सब्ज़ियाँ बेच रहे थे।

गोवर्धन दास ने एक हलवाई से पूछा, "भाई! यह पेड़ा कैसे दिया?" हलवाई ने कहा, "टके सेर! (एक टके का एक किलो)" गोवर्धन दास हैरान हुआ। उसने पूछा, "और यह जलेबी?" हलवाई बोला, "टके सेर!" "और यह लड्डू? और यह रसगुल्ला?" हलवाई ने मुस्कुराकर कहा, "अरे महाराज! आप इस नगर में नए आए हैं क्या? इस नगर का नाम है 'अंधेर नगरी', और यहाँ के राजा का नाम है 'चौपट राजा'! यहाँ हर चीज़ 'टके सेर' मिलती है। चाहे सब्ज़ी लो, चाहे मेवा लो, चाहे मिठाई लो... सब 'टके सेर'!"

(टके सेर खाजा, टके सेर भाजी!)

गोवर्धन दास खुशी से पागल हो गया। उसने भिक्षा में मिले हुए सात पैसों से पूरे 'सात सेर' (7 किलो) बढ़िया मिठाइयाँ खरीदीं और खुशी-खुशी अपने गुरु जी (महंत) के पास लौट आया।

नारायण दास भी वापस आ चुका था। गोवर्धन दास ने आते ही कहा, "गुरु जी! आज तो आनंद आ गया। इस नगर में तो सब कुछ टके सेर मिलता है। मैंने सात पैसे में इतनी सारी मिठाइयाँ खरीदी हैं।"

महंत जी बहुत ही ज्ञानी और दूरदर्शी इंसान थे। उन्होंने तुरंत पूछा, "बेटा, इस नगर का नाम क्या है और यहाँ का राजा कैसा है?"

गोवर्धन दास ने मुँह में लड्डू ठूँसते हुए कहा, "गुरु जी, इस नगर का नाम है 'अंधेर नगरी' और राजा का नाम है 'चौपट राजा'।"

यह सुनते ही महंत जी के चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं। उन्होंने बहुत ही गंभीरता से कहा: "गोवर्धन! जिस नगर में 'सोने' और 'मिट्टी' का भाव एक हो, जिस नगर में 'सब्ज़ी' और 'मिठाई' एक ही भाव बिकती हो, वहाँ के लोग न्याय और अन्याय, अच्छे और बुरे में कोई फर्क नहीं समझते। ऐसे नगर में रहना बहुत बड़े खतरे से खाली नहीं है। जहाँ गुण और दोष की कोई पहचान न हो, वहाँ किसी भी पल कोई भी मुसीबत आ सकती है। हम अभी इसी वक्त इस नगर को छोड़कर जाएँगे।"

नारायण दास समझदार था, वह गुरु जी के साथ जाने को तैयार हो गया। लेकिन गोवर्धन दास मिठाई के लालच में अंधा हो चुका था।

गोवर्धन दास ने कहा, "गुरु जी! मैं तो यह नगर छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा। दूसरी जगह तो दिन भर भिक्षा माँगने पर भी पेट नहीं भरता। यहाँ तो एक पैसे में इतना बढ़िया माल खाने को मिलता है। मैं तो यहीं रहूँगा!"

महंत जी ने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं माना। अंत में महंत जी ने कहा, "ठीक है बेटा, जैसी तेरी मर्ज़ी। लेकिन याद रखना, अगर कभी कोई बड़ी मुसीबत आए, तो अपने इस बूढ़े गुरु को याद कर लेना।" यह कहकर महंत जी और नारायण दास वहाँ से चले गए।

गोवर्धन दास अंधेर नगरी में रहकर रोज़ 'टके सेर' मिठाई खाता और खा-खा कर बिल्कुल 'मोटे ताज़े साँड' की तरह फूल गया।

कुछ महीनों बाद, उसी अंधेर नगरी में एक अजीब घटना घटी। एक दिन बहुत तेज़ बारिश हुई। बारिश के कारण शहर के एक 'कल्लू बनिए' के घर की दीवार गिर गई। दुर्भाग्य से, दीवार के नीचे दबकर एक आदमी की 'बकरी' मर गई।

बकरी का मालिक रोता-पीटता सीधा चौपट राजा के दरबार में पहुँचा। "महाराज! न्याय कीजिए! कल्लू बनिए की दीवार गिरने से मेरी बकरी मर गई है।"

राजा तो चौपट था ही। उसने तुरंत आदेश दिया, "कल्लू बनिए को पकड़ कर लाओ और उसे फाँसी पर चढ़ा दो!"

सिपाही कल्लू बनिए को पकड़ लाए। कल्लू बनिए ने हाथ जोड़कर कहा, "महाराज! इसमें मेरा क्या दोष? मैंने दीवार थोड़ी बनाई थी। दीवार तो 'कारीगर' (मज़दूर) ने बनाई थी। उसने ही दीवार कमज़ोर बनाई होगी।"

राजा ने कहा, "हाँ! बात तो सही है। बनिए को छोड़ दो और कारीगर को पकड़ कर फाँसी दे दो!"

कारीगर को लाया गया। कारीगर ने रोते हुए कहा, "महाराज! मेरी कोई गलती नहीं है। 'चूने वाले' ने चूना ही इतना खराब और पानी वाला बनाया था कि दीवार कमज़ोर हो गई।"

राजा ने कहा, "कारीगर को छोड़ो, चूने वाले को फाँसी दो!"

चूने वाले को पेश किया गया। वह काँपते हुए बोला, "महाराज! 'भिश्ती' (पानी पिलाने वाले) ने चूने में बहुत ज़्यादा पानी डाल दिया था, इसलिए चूना खराब हो गया।"

राजा ने हुक्म दिया, "चूने वाले को भगाओ, भिश्ती को फाँसी पर लटकाओ!"

भिश्ती को दरबार में लाया गया। भिश्ती ने कहा, "महाराज! मेरी क्या खता? 'कसाई' ने मुझे पानी भरने के लिए जो चमड़े की मशक (थैला) दी थी, वह बहुत बड़ी बना दी थी। इसलिए उसमें पानी ज़्यादा आ गया और चूने में गिर गया।"

राजा ने कसाई को बुलवाया। कसाई बोला, "महाराज! 'गड़रिए' (भेड़ चराने वाले) ने मुझे एक बहुत बड़ी भेड़ बेच दी थी, जिसकी खाल से मैंने मशक बनाई।"

गड़रिया दरबार में लाया गया। गड़रिए ने कहा, "महाराज! मैं भेड़ें चरा रहा था, तभी नगर का 'कोतवाल' अपनी सवारी लेकर वहाँ से गुज़रा। उसकी सवारी की धूमधाम देखकर मेरा ध्यान भटक गया और मैंने गलती से एक बड़ी भेड़ कसाई को बेच दी!"

राजा ने अपनी गद्दी पर हाथ मारते हुए कहा, "बस! असली मुजरिम मिल गया। यह कोतवाल ही है जिसकी वजह से दीवार गिरी। कोतवाल को पकड़ो और फाँसी पर चढ़ा दो!"

कोतवाल को पकड़ लिया गया और उसे फाँसी देने के लिए शहर के बीचों-बीच फाँसी के तख्ते पर लाया गया।

लेकिन यहाँ एक और नई मुसीबत खड़ी हो गई। नगर का कोतवाल बहुत ही 'दुबला-पतला और मरियल' सा था। फाँसी का फंदा बहुत बड़ा बनाया गया था। जब कोतवाल के गले में फंदा डाला गया, तो वह ढीला रह गया।

जल्लाद ने जाकर राजा को बताया, "महाराज! कोतवाल की गर्दन बहुत पतली है और फाँसी का फंदा बड़ा है। उसे फाँसी नहीं दी जा सकती।"

चौपट राजा ने अपनी मूर्खता की हद पार करते हुए आदेश दिया, "अरे तो इसमें सोचने की क्या बात है! अगर फंदा बड़ा है, तो किसी 'मोटे आदमी' को पकड़ कर लाओ जिसकी गर्दन फंदे में फिट आ जाए! बकरी के मरने के जुर्म में किसी न किसी को तो फाँसी लगनी ही चाहिए, न्याय तो होना ही चाहिए!"

राजा के सिपाही मोटे आदमी की तलाश में निकल पड़े। बाज़ार में उन्हें 'गोवर्धन दास' दिखाई दिया, जो टके सेर की मिठाइयाँ खा-खा कर बहुत मोटा हो चुका था।

सिपाहियों ने गोवर्धन दास को पकड़ लिया। "चलो बाबा जी! तुम्हें फाँसी लगनी है।"

गोवर्धन दास के तो होश ही उड़ गए। उसने रोते हुए पूछा, "अरे भाइयो! मैंने क्या किया है? मैंने तो किसी का एक पैसा भी नहीं चुराया।" सिपाहियों ने कहा, "तुमने कुछ नहीं किया, बस तुम्हारी गर्दन मोटी है और फाँसी का फंदा बड़ा है। इसलिए चौपट राजा के न्याय के अनुसार तुम्हें फाँसी दी जाएगी!"

गोवर्धन दास रोने लगा। उसे अपने गुरु जी की चेतावनी याद आ गई। उसने सिपाहियों से मिन्नतें कीं, "भाइयो! फाँसी देने से पहले मुझे एक बार मेरे गुरु जी के दर्शन करवा दो।" सिपाहियों ने उसकी अंतिम इच्छा मान ली।

महंत जी को खबर मिली, तो वे तुरंत अपने चेले को बचाने आ गए। उन्होंने रोते हुए गोवर्धन दास को देखा और उसके कान में कुछ 'फुसफुसाया'।

इसके बाद दोनों गुरु-चेला आपस में ज़ोर-ज़ोर से लड़ने लगे। गोवर्धन दास चिल्लाया, "नहीं! फाँसी पर मैं चढूँगा!" महंत जी चिल्लाए, "नहीं बच्चा! तू अभी जवान है। मैं तेरा गुरु हूँ, इसलिए फाँसी पर मैं चढूँगा!" गोवर्धन दास ने कहा, "गुरु जी! मुझे फाँसी लगने दो!"

गुरु-चेले की यह लड़ाई देखकर सिपाही, जल्लाद और खुद चौपट राजा हैरान रह गए। दुनिया में कोई मरने के लिए ऐसे लड़ता है क्या?

राजा ने आगे बढ़कर पूछा, "बाबा जी! यह क्या तमाशा है? आप लोग मरने के लिए क्यों लड़ रहे हैं?"

महंत जी ने बहुत ही रहस्यमयी तरीके से मुस्कुराते हुए कहा, "महाराज! आप नहीं समझेंगे। दरअसल, आज का दिन और यह मुहूर्त (शुभ समय) इतना पवित्र और महान है कि इस समय जो भी इंसान फाँसी पर चढ़ेगा, वह सीधे 'स्वर्ग' में जाएगा और उसे सीधा भगवान के दर्शन होंगे!"

स्वर्ग की बात सुनते ही चौपट राजा की आँखें लालच से चमक उठीं। उसने सोचा कि स्वर्ग जाने का ऐसा शानदार मौका मैं किसी और को क्यों दूँ?

राजा ने तुरंत अपनी तलवार म्यान से निकाली और चिल्लाते हुए कहा, "चुप रहो सब! जब स्वर्ग जाने का इतना अच्छा मुहूर्त है, तो किसी और को फाँसी नहीं होगी। इस राज्य का राजा मैं हूँ, इसलिए स्वर्ग पर पहला हक मेरा है! फाँसी पर मैं चढूँगा!"

और चौपट राजा खुद फाँसी के तख्ते पर चढ़ गया और जल्लाद ने उसके गले में फंदा डाल दिया।

इस तरह, एक ज्ञानी गुरु ने अपनी सूझ-बूझ से अपने बेवकूफ़ चेले की जान भी बचा ली और अंधेर नगरी को हमेशा के लिए उस चौपट और मूर्ख राजा से मुक्ति भी दिला दी!

🎉 कहानी समाप्त

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