निमंत्रण — पंडित मोटेराम शास्त्री का पेटूपन

पंडित मोटेराम शास्त्री बनारस के एक बहुत ही मशहूर और 'खाते-पीते' (भारी-भरकम) ब्राह्मण थे। उनका शरीर किसी बड़े मटके जैसा था और उनका पेट इतना बड़ा था कि दूर से देखने पर लगता जैसे कोई गुब्बारा चला आ रहा हो।
शास्त्री जी को दुनिया में अगर किसी चीज़ से सबसे ज़्यादा प्यार था, तो वह था— 'मुफ्त का खाना' और 'मिठाइयाँ'!
एक दिन बनारस के एक बहुत बड़े और अमीर 'सेठ जी' के घर पर कोई शुभ काम था। सेठ जी ने शहर के सबसे प्रमुख ब्राह्मणों को दावत (भोज) और दक्षिणा (पैसे) के लिए आमंत्रित किया।
जब पंडित मोटेराम शास्त्री जी के पास सेठ जी का निमंत्रण आया, तो उनकी बाछें खिल गईं।
शास्त्री जी ने अपनी पत्नी से कहा, "अरी भाग्यवान! आज सेठ जी के यहाँ निमंत्रण है। सुना है कि दावत में शुद्ध देसी घी की पूड़ियाँ, कद्दू की सब्ज़ी, रायता, और छक कर 'रसगुल्ले और गुलाब जामुन' खिलाए जाएँगे। आज तो मज़ा आ जाएगा!"
पत्नी ने पूछा, "तो क्या दोपहर का खाना घर पर खाएंगे?"
शास्त्री जी ने आँखें तरेरते हुए कहा, "पागल हो गई है क्या? जब रात को सेठ जी के यहाँ ऐसा मालपुआ उड़ने वाला है, तो मैं दोपहर को घर की सूखी रोटी खाकर अपने पेट की कीमती जगह क्यों बर्बाद करूँ? मैं तो आज पूरे दिन उपवास करूँगा, ताकि रात को पेट पूरी तरह खाली रहे और मैं ज़्यादा से ज़्यादा माल अंदर कर सकूँ!"
शास्त्री जी ने दोपहर को कुछ नहीं खाया। शाम होते-होते उनके पेट में चूहे कूदने लगे, लेकिन वे सेठ जी के रसगुल्लों का खयाल करके सब्र करते रहे।
रात के आठ बजे शास्त्री जी सज-धज कर, अपनी बड़ी सी तोंद पर हाथ फेरते हुए सेठ जी की हवेली पर पहुँच गए।
हवेली के आँगन में बड़ी-बड़ी पत्तलें (पत्ते की प्लेटें) बिछी हुई थीं। शहर के कई दूसरे मोटे-मोटे ब्राह्मण भी वहाँ बैठे थे। पंडित मोटेराम शास्त्री भी एक बड़ी सी पत्तल के सामने आसन लगाकर बैठ गए।
खाना परोसना शुरू हुआ।
हलवाई गरमा-गरम फूली हुई पूड़ियाँ, महकती हुई सब्ज़ी और रायता लेकर आए। शास्त्री जी ने अपनी आस्तीनें ऊपर चढ़ाईं और जैसे ही पूड़ियाँ पत्तल पर गिरीं, उन्होंने दोनों हाथों से काम शुरू कर दिया।
शास्त्री जी की खाने की रफ़्तार देखने लायक थी। वे पूड़ी को तोड़ते नहीं थे, बस उसे गोल मोड़ते, रायते में डुबोते और सीधा मुँह के अंदर! एक-दो... दस... बीस... पचास पूड़ियाँ उनके पेट के उस विशाल कुएँ में ऐसे समा गईं जैसे कभी थीं ही नहीं।
सेठ जी पास खड़े होकर हाथ जोड़े कह रहे थे, "महाराज! और लीजिए, संकोच मत कीजिएगा।" शास्त्री जी मुँह में खाना ठूँसे हुए सिर्फ इतना बोल पा रहे थे, "हूँ... हूँ... और लाओ!"
पूड़ियों का दौर खत्म होने के बाद, असली चीज़ मैदान में आई— 'रसगुल्ले और गुलाब जामुन'!
रसगुल्लों की बाल्टियाँ देखकर शास्त्री जी की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। उन्होंने अपनी धोती का नाड़ा थोड़ा और ढीला कर लिया।
"डालो भाई! पत्तल भर दो!" शास्त्री जी ने आदेश दिया।
अब शास्त्री जी ने रसगुल्लों से कुश्ती शुरू की। एक-एक करके रसगुल्ले उनके गले के नीचे उतरने लगे। पचास, साठ, सत्तर... शास्त्री जी का पेट अब फूल कर एक ढोल की तरह तन चुका था। उनका साँस लेना भी भारी हो रहा था।
पास बैठे एक दूसरे ब्राह्मण 'पंडित चिंतामणि' ने ताना मारते हुए कहा, "शास्त्री जी! बस भी कीजिए, पेट फट जाएगा। कल के लिए भी कुछ छोड़ेंगे या नहीं?"
शास्त्री जी ने बुरा मानते हुए कहा, "अरे चिंतामणि! ब्राह्मण का पेट और समुद्र की गहराई कोई नहीं नाप सकता। तुम अपनी पत्तल देखो!"
अंततः, शास्त्री जी ने इतने रसगुल्ले खा लिए कि खाना उनके 'गले तक' आ गया। अब अगर वे थोड़ा सा भी झुकते, तो खाना बाहर आने का डर था। वे अपनी जगह पर बिल्कुल 'बुत' की तरह सीधे तन कर बैठ गए।
दावत खत्म हुई। सेठ जी ने सभी ब्राह्मणों को एक-एक 'सोने का सिक्का' और पाँच रुपये दक्षिणा में दिए।
सेठ जी ने शास्त्री जी के सामने भी एक सोने का सिक्का और रुपये रखे। "लीजिए महाराज! आपकी दक्षिणा।"
अब शास्त्री जी के सामने सबसे बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो गया! दक्षिणा ज़मीन पर रखी थी और उसे उठाने के लिए शास्त्री जी को 'नीचे झुकना' पड़ता।
लेकिन शास्त्री जी का पेट इतना ज़्यादा तन चुका था और खाना गले तक इतना ऊपर आ चुका था कि वे एक इंच भी नीचे नहीं झुक सकते थे! अगर वे ज़रा सा भी झुकते, तो उनके सारे रसगुल्ले वहीं पत्तल पर वापस आ जाते।
शास्त्री जी सीधे बैठे-बैठे अपनी आँखों से उस सोने के सिक्के को देख रहे थे और मन ही मन तड़प रहे थे।
उन्होंने अपनी आँखें घुमाकर सेठ जी से कहा, "सेठ जी! ज़रा यह दक्षिणा उठाकर मेरे हाथ में रख दीजिए।"
सेठ जी ने हँसते हुए कहा, "अरे महाराज! ब्राह्मण देवता को दक्षिणा तो खुद ज़मीन से उठानी चाहिए, यही तो नियम है।"
शास्त्री जी की आँखों में पानी आ गया। उन्होंने बहुत कोशिश की, अपनी साँस रोकी, लेकिन पेट था कि झुकने का नाम ही नहीं ले रहा था।
अंत में, जब सब लोग उठकर जाने लगे, तो शास्त्री जी ने एक बहुत ही 'बेहतरीन और हास्यास्पद तरकीब' निकाली।
शास्त्री जी ने अपने पैरों के अँगूठों से उस सोने के सिक्के और नोटों को ज़मीन पर रगड़-रगड़ कर एक जगह इकट्ठा किया। फिर उन्होंने अपनी धोती के पल्ले को अपने पैरों के पास गिराया और बड़ी मुश्किल से, एक अजीब सी पोज़िशन में खड़े होकर, पैरों के अँगूठों की मदद से उस सिक्के को उठाकर अपनी धोती में फँसा लिया!
शास्त्री जी जब सेठ जी की हवेली से बाहर निकले, तो वे चल नहीं पा रहे थे। वे एक गर्भवती हथिनी की तरह धीरे-धीरे, पेट पर हाथ रखे, हाँफते हुए अपने घर की तरफ लुढ़कते हुए जा रहे थे।
रास्ते में जो भी उन्हें देखता, वह अपनी हँसी नहीं रोक पाता। घर पहुँचकर जब वे खटिया पर गिरे, तो अगले दो दिन तक वे अपनी जगह से उठ नहीं पाए! लेकिन शास्त्री जी को इस बात की पूरी संतुष्टि थी कि उन्होंने सेठ जी के दावत का पूरा-पूरा 'पैसा वसूल' कर लिया था।
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