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वैष्णव की फिसलन

हरिशंकर परसाई7 मिनट का पठन
वैष्णव की फिसलन

शहर के सबसे बड़े करोड़पति 'सेठ जी' एक पक्के और निष्ठावान 'वैष्णव' (भगवान विष्णु के भक्त) थे। उनके धर्म और नियम इतने पक्के थे कि वे सुबह दो घंटे पूजा करते, माथे पर बड़ा सा चंदन का तिलक लगाते, गले में तुलसी की माला पहनते और दिन में कई बार 'राम-राम' का जाप करते थे।

सेठ जी का धर्म 'शुद्ध शाकाहार' पर टिका था। वे मांस-मदिरा (शराब) का नाम लेना भी पाप समझते थे। लहसुन-प्याज़ भी उनके घर में नहीं आता था।

सेठ जी का व्यापार बहुत बड़ा था। एक दिन उन्होंने सोचा कि शहर में विदेशी पर्यटकों और बड़े लोगों के लिए एक बहुत ही शानदार 'फाइव स्टार होटल' खोला जाए। सेठ जी ने करोड़ों रुपये लगाकर एक भव्य होटल बनवाया।

होटल का उद्घाटन बहुत धूमधाम से हुआ, लेकिन कुछ ही महीनों में होटल 'घाटे' में जाने लगा।

एक दिन सेठ जी ने होटल के मैनेजर को बुलाया और पूछा, "मैनेजर बाबू! यह क्या हो रहा है? इतना बढ़िया होटल बनाया है, फिर भी कमरे खाली पड़े हैं। लोग क्यों नहीं आ रहे?"

मैनेजर ने डरते हुए कहा, "सेठ जी! हमारा होटल बहुत शानदार है, लेकिन जो विदेशी मेहमान या बड़े-बड़े रईस आते हैं, वे शुद्ध शाकाहारी खाना खाकर भाग जाते हैं। वे कहते हैं कि जब तक खाने में 'मांस और मुर्ग-मुसल्लम' न हो, तब तक फाइव स्टार होटल का क्या मज़ा? अगर आप होटल में 'मांस' परोसने की इजाज़त दे दें, तो होटल चल पड़ेगा।"

मांस का नाम सुनते ही सेठ जी ने दोनों हाथों से अपने कान पकड़ लिए। "राम-राम-राम! घोर पाप! मैं एक शुद्ध वैष्णव हूँ। मेरे होटल में जीव-हत्या होगी? मैं व्यापार में घाटा सह लूँगा, लेकिन धर्म भ्रष्ट नहीं करूँगा!"

लेकिन कुछ दिनों बाद घाटा और बढ़ गया। सेठ जी का व्यापारी दिमाग उनके 'वैष्णव' मन से टकराने लगा। रात को सेठ जी पूजा करने बैठे, तो भगवान की मूर्ति के सामने आँखें बंद करके 'ज्ञान' का विचार करने लगे।

सेठ जी ने खुद से कहा: "आत्मा तो अमर है। उसे न कोई मार सकता है, न कोई काट सकता है। 'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः'। तो फिर यह मुर्गा और बकरा क्या है? यह तो सिर्फ नाशवान 'शरीर' है। और शरीर तो वैसे भी एक दिन मिट्टी में मिल ही जाना है। जब आत्मा मरती ही नहीं, तो मेरे होटल में 'पाप' कैसा? मैं तो सिर्फ शरीर बेचूँगा!"

यह महान आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के बाद सेठ जी ने मैनेजर को बुलाया और कहा, "ठीक है! होटल में गोश्त (मांस) पकाना शुरू कर दो। लेकिन ध्यान रहे, मेरे सामने उसका नाम मत लेना!"

होटल में मांस पकने लगा। ग्राहक बढ़ने लगे।

कुछ महीनों बाद मैनेजर फिर आया और बोला, "सेठ जी! कमाई तो बढ़ी है, लेकिन विदेशी मेहमान कहते हैं कि मांस तो है, लेकिन गला तर करने के लिए 'शराब' नहीं है। बिना शराब के फाइव स्टार होटल कैसा? अगर आप 'बार' खोलने की इजाज़त दे दें, तो नोटों की बारिश होने लगेगी।"

सेठ जी फिर भड़के। "अरे मूर्ख! मैं पक्का वैष्णव हूँ! मेरे होटल में शराब बिकेगी? लोग पीकर गालियाँ बकेंगे? मेरा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा!"

लेकिन नोटों की बारिश की बात सेठ जी के दिमाग में अटक गई। रात को वे फिर भगवान की मूर्ति के सामने बैठे और 'आध्यात्मिक चिंतन' करने लगे।

"यह शराब आखिर है क्या?" सेठ जी ने सोचा। "यह भी तो भगवान की बनाई हुई प्रकृति से ही निकलती है। जौ, अंगूर, और सेब से ही तो शराब बनती है। अंगूर भगवान ने बनाए हैं। जब भगवान के बनाए अंगूर खाने में पाप नहीं है, तो उनका रस (शराब) पीने में पाप कैसा? हमारे शास्त्रों में भी तो देवताओं के 'सोमरस' पीने का ज़िक्र है! तो फिर शराब भी तो कलियुग का सोमरस ही है!"

सेठ जी ने मैनेजर को हुक्म दिया, "जाओ! होटल में एक शानदार 'बार' खोल दो और सोमरस... मेरा मतलब है, शराब पिलाना शुरू कर दो!"

शराब और कबाब का इंतज़ाम होते ही होटल में ग्राहकों की भीड़ उमड़ पड़ी। सेठ जी की तिजोरी नोटों से भरने लगी। वे रोज़ सुबह और भी ज़्यादा भक्ति-भाव से भगवान की पूजा करते।

कुछ महीने और बीते। एक दिन मैनेजर बहुत खुश होकर आया और बोला, "सेठ जी! अब होटल पूरे शहर में मशहूर हो गया है। बस एक आखिरी चीज़ की कमी है। रात को शराब पीने के बाद बड़े-बड़े रईस 'मनोरंजन' माँगते हैं। अगर हम रात को होटल में 'कैबरे डांस' शुरू करवा दें, तो हमारा होटल देश का नंबर वन होटल बन जाएगा!"

इस बार सेठ जी ने कान नहीं पकड़े। उन्होंने सिर्फ आँखें बंद कीं और अपनी गद्दी पर बैठे-बैठे ही अपना 'ज्ञान' दौड़ाया।

सेठ जी ने मुस्कुराते हुए खुद को समझाया: "यह सुंदरता क्या है? यह सब भगवान की ही तो माया है! 'नारी' में भी उसी परमेश्वर का अंश है। और हमारे स्वर्ग में क्या होता है? इंद्र के दरबार में मेनका, रंभा और उर्वशी जैसी अप्सराएँ भी तो देवताओं के सामने नृत्य करती हैं! अगर मेरे होटल में कुछ सुंदर अप्सराएँ नृत्य कर लेंगी, तो यह तो एक तरह से इंद्रलोक की ही नकल है। इसमें पाप कैसा?"

सेठ जी ने मैनेजर से कहा, "बुलाओ अप्सराओं को! और नाच शुरू करवाओ!"

इस तरह, एक 'शुद्ध पक्के वैष्णव' सेठ जी ने धर्म, गीता और ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातों का सहारा लेकर, अपने ही हाथों से अपने होटल में गोश्त, शराब और कैबरे डांस शुरू करवा दिया। उनकी 'फिसलन' (गिरावट) इतनी मीठी और आध्यात्मिक थी कि उन्हें कभी लगा ही नहीं कि वे कोई पाप कर रहे हैं!

🎉 कहानी समाप्त

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