हर कण में भगवान

प्राचीन काल में, जंगल के बीचों-बीच एक बहुत ही शांत और पवित्र आश्रम हुआ करता था। उस आश्रम में एक बहुत ही सिद्ध और ज्ञानी गुरु जी रहते थे। उनके कई शिष्य (विद्यार्थी) थे, जो दिन-रात गुरु जी की सेवा करते और उनसे शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करते थे।
एक दिन गुरु जी ने अपने सभी शिष्यों को बरगद के पेड़ के नीचे बैठाया और एक बहुत ही गहरा आध्यात्मिक ज्ञान दिया।
गुरु जी ने कहा, "मेरे प्यारे बच्चो! एक बात हमेशा याद रखना। यह पूरी सृष्टि (दुनिया) भगवान ने बनाई है। इस दुनिया के हर इंसान, हर जानवर, हर पेड़-पौधे और 'हर एक कण में भगवान का वास है'। इसलिए हमें कभी किसी से नफरत नहीं करनी चाहिए, किसी से डरना नहीं चाहिए और हर जीव में ईश्वर को देखकर उसका आदर करना चाहिए। नारायण ही सबमें बसते हैं!"
आश्रम का एक शिष्य बहुत ही सीधा और 'शाब्दिक अर्थ' निकालने वाला था। उसने गुरु जी की इस बात को अपने दिमाग में बिल्कुल पत्थर की लकीर की तरह बैठा लिया कि 'हर चीज़ में भगवान है'।
अगले दिन वह सीधा-सादा शिष्य भिक्षा माँगने के लिए पास के एक गाँव में गया। वह बाज़ार की एक पतली सड़क के बीचों-बीच चल रहा था और मन ही मन गुरु जी का दिया हुआ ज्ञान दोहरा रहा था— "मुझमें भी भगवान है, इन लोगों में भी भगवान है, इस पेड़ में भी भगवान है..."
तभी बाज़ार में अचानक एक ज़बरदस्त हलचल मच गई। लोग अपनी दुकानें छोड़कर इधर-उधर भागने लगे। स्त्रियाँ चीखने लगीं और बच्चे रोने लगे।
सामने से एक बहुत ही विशाल और 'पागल हाथी' चिंघाड़ता हुआ और तबाही मचाता हुआ चला आ रहा था। हाथी की सूँड में जो कुछ भी आता, वह उसे उठाकर फेंक रहा था।
हाथी की पीठ पर उसका 'महावत' बैठा हुआ था, जो अपने हाथों में लोहे का अंकुश (भाला) लिए हाथी को काबू करने की पूरी कोशिश कर रहा था, लेकिन हाथी उसके काबू से बाहर हो चुका था।
महावत ने जब देखा कि सड़क के बिल्कुल बीचों-बीच एक बाबा जी (शिष्य) शांति से चले जा रहे हैं, तो उसने ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना शुरू किया: "ओ बाबा जी! रास्ता छोड़ दो! भाग जाओ यहाँ से! हाथी पागल हो गया है, यह तुम्हें कुचल देगा! हटो सामने से!"
लेकिन शिष्य ने अपनी जगह से एक इंच भी हिलने से मना कर दिया।
उसने मन ही मन अपना आध्यात्मिक ज्ञान दौड़ाया: "गुरु जी ने कहा था कि हर चीज़ में भगवान है। इस सामने से आते हुए हाथी में भी भगवान हैं, और मेरे अंदर भी भगवान हैं। भला एक भगवान (मैं), दूसरे भगवान (हाथी) से डर कर क्यों भागेगा? मैं बिल्कुल नहीं भागूँगा, भगवान मेरा कुछ नहीं बिगाड़ेंगे!"
शिष्य दोनों हाथ जोड़कर, आँखें बंद करके उस पागल हाथी के बिल्कुल सामने खड़ा हो गया और मुस्कुराने लगा।
हाथी तो पागल था ही। उसने जैसे ही उस शिष्य को अपने रास्ते में खड़ा देखा, उसने अपनी मोटी सूँड को हवा में घुमाया। हाथी ने अपनी सूँड से उस शिष्य की कमर को जकड़ लिया, उसे हवा में गोल-गोल घुमाया और फिर पूरी ताक़त से सड़क के किनारे एक काँटेदार झाड़ी में उछाल कर फेंक दिया! — 'धड़ाम!'
शिष्य हवा में उड़ता हुआ सीधा काँटों और पत्थरों के बीच जाकर गिरा। हाथी चिंघाड़ता हुआ आगे बढ़ गया।
बेचारे शिष्य की हड्डियाँ ढीली हो गई थीं। उसके कपड़े फट गए थे और पूरे शरीर से खून बह रहा था। मुँह पर धूल और कीचड़ लगा हुआ था।
वह बड़ी मुश्किल से लंगड़ाता हुआ, कराहता हुआ वापस आश्रम पहुँचा।
शिष्य की यह दुर्दशा देखकर दूसरे शिष्य दौड़कर आए और उसे उठाकर गुरु जी के पास ले गए।
गुरु जी ने हैरान होकर पूछा, "अरे बेटा! यह तेरी क्या हालत हो गई? क्या तू पहाड़ से गिर गया था या किसी ने तुझे पीटा है?"
शिष्य ने रोते हुए और बहुत ही शिकायत भरे लहज़े में कहा, "गुरु जी! यह सब आपकी वजह से हुआ है! आपने कल जो मुझे ज्ञान दिया था, वह बिल्कुल झूठ था। आपने कहा था कि 'हर कण में भगवान हैं'। आज बाज़ार में एक पागल हाथी मेरी तरफ आ रहा था। मैंने सोचा कि हाथी में भी भगवान हैं और मुझमें भी भगवान हैं, तो मैंने रास्ता नहीं छोड़ा। लेकिन उस 'हाथी वाले भगवान' ने मुझे सूँड से उठाया और काँटों में फेंक दिया! मेरी तो हड्डी-पसली एक हो गई।"
गुरु जी ने शिष्य की पूरी बात बहुत ध्यान से सुनी। उन्हें अपने इस भोले और मूर्ख शिष्य पर बहुत दया आई, लेकिन उन्हें हँसी भी आ रही थी।
गुरु जी ने मुस्कुराते हुए शिष्य के कंधे पर हाथ रखा और कहा: "बेटा! मेरा ज्ञान बिल्कुल झूठा नहीं था। हाथी में भी भगवान हैं, यह बात बिल्कुल सच है।"
शिष्य ने झुँझलाते हुए पूछा, "तो फिर उसने मुझे मारा क्यों?"
गुरु जी ने बहुत ही गहरी और व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ जवाब दिया: "बेटा! हाथी में भगवान हैं, यह सच है। लेकिन ज़रा यह तो बता, जो महावत हाथी के ऊपर बैठकर तुझे ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर कह रहा था कि 'बाबा जी, सामने से हट जाओ, भाग जाओ!'... क्या उस 'महावत के अंदर भगवान नहीं थे'? तूने 'हाथी वाले भगवान' की बात तो मान ली, लेकिन जो 'महावत वाला भगवान' तुझे रास्ता छोड़ने की चेतावनी दे रहा था, उसकी बात तूने क्यों अनसुनी कर दी?"
गुरु जी का यह तार्किक और सटीक जवाब सुनकर शिष्य का मुँह खुला का खुला रह गया। उसे अपनी बेवकूफी का अहसास हो गया कि उसने ज्ञान का कितना गलत मतलब निकाला था। उसने अपना सिर झुका लिया और आश्रम के बाकी सभी शिष्य ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाकर हँसने लगे।
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