भोलाराम का जीव

स्वर्ग के दरबार में आज सन्नाटा छाया हुआ था। धर्मराज (यमराज) अपनी गद्दी पर बैठे बहुत ही परेशान लग रहे थे। उनके पास ही उनके मंत्री 'चित्रगुप्त' अपना बड़ा सा रजिस्टर (बहीखाता) खोले हुए बार-बार पन्ने पलट रहे थे और बार-बार अपना चश्मा पोंछ रहे थे।
धर्मराज ने झुँझलाते हुए पूछा, "चित्रगुप्त! क्या बात है? आज यमदूत अभी तक वापस क्यों नहीं आया? क्या पृथ्वी पर लोगों ने मरना बंद कर दिया है?"
चित्रगुप्त ने रजिस्टर में देखते हुए कहा, "नहीं महाराज! मरने वाले तो बहुत हैं, लेकिन एक अजीब सी घटना हो गई है। जबलपुर शहर के 'धमापुर' मोहल्ले में रहने वाले 'भोलाराम' नाम के एक आदमी की पाँच दिन पहले मौत हो गई थी। मैंने उसे लाने के लिए अपने सबसे तेज़ और होशियार 'यमदूत' को भेजा था, लेकिन न तो वह यमदूत वापस आया और न ही भोलाराम का जीव (आत्मा) यहाँ पहुँचा है।"
तभी दरबार का दरवाज़ा खुला और एक यमदूत बुरी तरह हाँफता हुआ, अस्त-व्यस्त कपड़ों में अंदर आया। उसका चेहरा उतरा हुआ था।
उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्लाए, "अरे मूर्ख! तू पाँच दिन से कहाँ था? और भोलाराम का जीव कहाँ है?"
यमदूत ने हाथ जोड़कर काँपते हुए कहा, "महाराज! मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं आज तक कभी धोखा नहीं खाया था, लेकिन इस भोलाराम के जीव ने मुझे चकमा दे दिया! जैसे ही भोलाराम ने शरीर छोड़ा, मैंने उसकी आत्मा को पकड़ लिया। हम दोनों हवा में उड़ते हुए स्वर्ग की तरफ आ रहे थे। लेकिन बीच रास्ते में एक बहुत ज़ोर की तेज़ हवा का झोंका आया और भोलाराम का जीव मेरे हाथों से फिसल कर न जाने कहाँ गायब हो गया! मैंने पाँच दिन तक पूरी पृथ्वी और ब्रह्मांड छान मारा, लेकिन भोलाराम का जीव कहीं नहीं मिला।"
धर्मराज को बहुत गुस्सा आया। "मूर्ख! क्या पृथ्वी के भ्रष्ट लोगों की तरह तूने भी रिश्वत खाकर भोलाराम को छोड़ दिया?"
उसी समय स्वर्ग में देवताओं के संवाददाता 'नारद मुनि' अपनी वीणा बजाते हुए — "नारायण! नारायण!" — कहते हुए दरबार में पधारे।
नारद जी ने धर्मराज को परेशान देखा तो पूछा, "क्या बात है धर्मराज? आज आप इतने उदास क्यों हैं? क्या नरक में जगह खत्म हो गई है?"
धर्मराज ने भोलाराम के जीव के गायब होने की पूरी कहानी नारद जी को बता दी।
नारद जी मुस्कुराए और बोले, "यह तो बड़ी विचित्र बात है। मैं पृथ्वी पर जाता हूँ और भोलाराम के घर जाकर पता लगाता हूँ कि आखिर उसकी आत्मा कहाँ अटक गई है।"
नारद जी तुरंत जबलपुर के धमापुर मोहल्ले में भोलाराम के घर पहुँचे। घर क्या था, एक टूटी-फूटी झोपड़ी थी। अंदर से औरतों और बच्चों के रोने की आवाज़ें आ रही थीं।
नारद जी ने दरवाज़े पर खड़े होकर आवाज़ लगाई, "नारायण! नारायण! भिक्षा दे दे माई!"
भोलाराम की पत्नी रोती हुई बाहर आई। नारद जी ने पूछा, "माता! भोलाराम को क्या बीमारी थी?"
पत्नी ने आँसू पोंछते हुए कहा, "महाराज! बीमारी क्या थी, गरीबी की बीमारी थी! मेरे पति सरकारी दफ्तर में काम करते थे। पाँच साल पहले वे 'रिटायर' (सेवानिवृत्त) हो गए थे। इन पाँच सालों में उन्होंने अपनी 'पेंशन' चालू करवाने के लिए दफ्तर में पचासों दरख्वास्तें दीं। लेकिन दफ्तर वालों ने एक न सुनी। घर में खाने को दाना नहीं था, गहने बर्तन सब बिक गए। अंत में भूख और चिंता के मारे उन्होंने दम तोड़ दिया।"
नारद जी को बात समझ में आने लगी। उन्होंने पूछा, "माता, क्या उनका किसी से कोई लेन-देन या उधार था? शायद उनका जीव वहीं अटक गया हो।"
पत्नी ने चिढ़कर कहा, "अरे महाराज! जो आदमी भूख से मर गया, उसे कौन उधार देगा? उनका मन सिर्फ एक ही जगह अटका हुआ था— उनकी 'पेंशन की फाइलों' में!"
नारद जी समझ गए कि मामला सरकारी दफ्तर का है। वे तुरंत शहर के उस बड़े सरकारी दफ्तर में पहुँच गए जहाँ भोलाराम काम करता था।
दफ्तर में एक बाबू फाइलों के ढेर के पीछे बैठा था। नारद जी ने उससे जाकर कहा, "भाई! भोलाराम की पेंशन का क्या हुआ? वह बेचारा तो मर गया।"
बाबू ने नारद जी को ऊपर से नीचे तक देखा और बोला, "बाबा जी! भोलाराम ने दरख्वास्तें तो बहुत दी थीं, लेकिन उन पर 'वज़न' नहीं रखा था, इसलिए वे उड़ गईं!"
नारद जी बहुत सीधे थे, वे समझे नहीं। "वज़न? मतलब पेपर-वेट नहीं रखा था?"
बाबू हँसा और बोला, "अरे बाबा जी! आप साधु-संन्यासी हैं, आप दुनियादारी नहीं समझते। वज़न का मतलब है 'रिश्वत'! भोलाराम दरख्वास्त देता था, लेकिन बाबू लोगों को खुश करने के लिए पैसे नहीं देता था। जाइए, बड़े साहब से मिलिए।"
नारद जी बड़े साहब के कमरे में गए। बड़ा साहब आराम से अपनी कुर्सी पर बैठा था।
नारद जी ने कहा, "साहब! भोलाराम की पेंशन की फाइल कहाँ है? उसे पाँच साल से पेंशन नहीं मिली।"
बड़े साहब ने नारद जी की सुंदर और कीमती 'वीणा' को लालच भरी नज़रों से देखा और इशारे में कहा, "साधु जी! सरकारी काम ऐसे ही नहीं होते। फाइलें बहुत भारी होती हैं, उन्हें आगे बढ़ाने के लिए कुछ 'प्रसाद' चढ़ाना पड़ता है। अगर आप अपनी यह 'वीणा' मुझे भेंट कर दें, तो मैं अभी भोलाराम की फाइल मँगवा कर काम पक्का कर देता हूँ। मेरी बेटी को संगीत का शौक है।"
नारद जी को बहुत गुस्सा आया, लेकिन भोलाराम का जीव ढूँढने के लिए उन्होंने अपनी प्यारी वीणा बड़े साहब की मेज़ पर रख दी।
"लीजिए साहब! अब तो फाइल निकालिए।"
वीणा मिलते ही बड़ा साहब खुश हो गया। उसने तुरंत चपरासी को आवाज़ लगाई, "ओए! भोलाराम की पेंशन वाली फाइल लेकर आ।"
चपरासी एक बहुत ही मोटी और धूल भरी फाइल लेकर आया जिस पर लिखा था— 'भोलाराम पेंशन केस'।
बड़े साहब ने फाइल खोली और नाम पुकारने के अंदाज़ में ज़ोर से कहा, "भोलाराम! कहाँ है भोलाराम की दरख्वास्त?"
फाइल का नाम सुनते ही, अचानक उस 'सरकारी फाइल के अंदर' से एक बहुत ही कमज़ोर और काँपती हुई आवाज़ आई:
"कौन पुकार रहा है मुझे? क्या पोस्टमैन आया है? क्या मेरी पेंशन का ऑर्डर (ऑर्डर) आ गया?"
नारद जी और बड़ा साहब दोनों हक्के-बक्के रह गए। आवाज़ फाइल के अंदर से आ रही थी!
नारद जी तुरंत समझ गए। उन्होंने फाइल की तरफ झुककर कहा, "अरे भोलाराम! मैं स्वर्ग से नारद मुनि आया हूँ। धर्मराज तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं। चलो, मैं तुम्हें स्वर्ग ले जाने आया हूँ!"
फाइल के अंदर से भोलाराम के जीव (आत्मा) ने बहुत ही मज़बूती से जवाब दिया:
"नहीं महाराज! मैं आपके साथ स्वर्ग नहीं जाऊँगा। आप जाइए! मुझे स्वर्ग नहीं चाहिए। मेरी तो आत्मा मेरी 'पेंशन की फाइलों' में अटकी हुई है! जब तक मेरी पेंशन चालू नहीं हो जाती, मैं इन फाइलों को छोड़कर कहीं नहीं जाने वाला!"
नारद जी दंग रह गए। यमदूत पूरे ब्रह्मांड में भोलाराम को ढूँढ रहा था, और भोलाराम का जीव भारत के एक भ्रष्ट सरकारी दफ्तर की धूल भरी 'फाइलों' में उलझ कर रह गया था!
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