बसेसर का बड़ा नाम

किसी गाँव में एक लड़का रहता था, जिसका पूरा नाम था — "बसेसर ससेसर तसेसर प्रताप-नारायण-देव।" इस नाम में पहले तीन शब्द तुकबंदी में थे — बसेसर ख़ुद का नाम, ससेसर उसके पिता का नाम, और तसेसर उसके दादा का नाम। और आख़िरी तीन शब्द — "प्रताप-नारायण-देव" — यह एक ही, इकलौता पारिवारिक उपनाम था (कुछ पुराने राजघरानों की तरह, जहाँ एक ही हुई उपाधि तीन शब्दों में जुड़ी होती है), जो पीढ़ियों से इसी एक जुड़े हुए रूप में चला आ रहा था — कोई अलग-अलग तीन उपनाम नहीं, बल्कि एक ही नाम के तीन हिस्से।
गाँव वालों के लिए इतना लंबा छह-शब्दों वाला नाम बोलना बड़ा मुश्किल काम था, तो सब उसे छोटा करके सिर्फ़ "बसेसर" कहकर बुलाने लगे।
बसेसर को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं थी। उसे लगता था कि "सिर्फ़ बसेसर" कहना उसकी बेइज़्ज़ती है, मानो उसके पिता, दादा और खानदान के उस पूरे उपनाम की कोई अहमियत ही न हो। वह अक्सर सोचता — "मेरा नाम इतना बड़ा और शानदार है, फिर लोग मुझे आधे-अधूरे नाम से क्यों बुलाते हैं?"
एक दिन उसने ठान लिया। उसने पूरे गाँव में ऐलान करवा दिया — "आज से जो भी मुझे बुलाएगा, वह मेरा पूरा नाम लेकर बुलाएगा — 'बसेसर ससेसर तसेसर प्रताप-नारायण-देव।' जो सिर्फ़ 'बसेसर' कहेगा, मैं उसका जवाब नहीं दूँगा।"
गाँव वाले पहले तो हँसे, फिर सोचा चलो लड़के की ज़िद है, मान लेते हैं। धीरे-धीरे सबने पूरा नाम लेकर बुलाना शुरू कर दिया, हालाँकि हर बार इतना लंबा नाम बोलने में उन्हें ख़ासी मशक्कत करनी पड़ती — कोई "ससेसर-तसेसर" वाले हिस्से में उलझ जाता, तो कोई आख़िर के "प्रताप-नारायण-देव" तक पहुँचते-पहुँचते हाँफ जाता। पर बसेसर की ज़िद के आगे किसी की नहीं चलती थी।
एक दोपहर बसेसर खेत के पास से गुज़र रहे पुराने कुएँ की मुँडेर पर बैठा कुछ सोच रहा था। अचानक उसका पैर फिसला और वह सीधा कुएँ में जा गिरा। कुआँ ज़्यादा गहरा तो नहीं था, पर पानी काफ़ी था, और बसेसर को तैरना नहीं आता था। वह हाथ-पैर मारते हुए ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा — "बचाओ! बचाओ!"
पास के खेत में काम कर रहे एक किसान रामू ने आवाज़ सुनी। वह दौड़ता हुआ कुएँ के पास आया और अंदर झाँककर पूछा — "अरे, कौन गिरा है इसमें?"
बसेसर ने पानी में हाथ-पैर मारते हुए घबराई आवाज़ में जवाब देने की कोशिश की — "मैं हूँ... ब...बसेसर ससेसर तसेसर प्रताप-नारायण-देव!" इतना लंबा नाम बोलने में उसकी साँस उखड़ गई।
रामू को पूरा नाम समझने और पहचानने में ही कुछ पल लग गए — "अरे, यह तो अपने गाँव का वही लड़का है जिसने नाम छोटा बुलाने पर मना किया था!" वह घबराकर बोला — "रुको, रुको, मैं अभी और लोगों को बुलाकर लाता हूँ!"
रामू भागा-भागा गाँव की तरफ़ गया। रास्ते में सबसे पहले उसे मिला मंगल काका। रामू हाँफते हुए बोला — "काका, जल्दी चलो! बसेसर ससेसर तसेसर प्रताप-नारायण-देव कुएँ में गिर गए हैं!"
मंगल काका ने चौंककर पूछा — "कौन गिरा है? ज़रा फिर से बोलना।"
रामू ने हाँफते हुए फिर से पूरा नाम दोहराया — "बसेसर... ससेसर... तसेसर... प्रताप... नारायण... देव!" इतना कहने में ही उसे अच्छी-ख़ासी साँस खींचनी पड़ी।
मंगल काका ने कहा — "अरे, चलो-चलो, जल्दी बताओ आगे भी लोगों को!" दोनों मिलकर आगे बढ़े और रास्ते में मिले सोहन को रोककर बताने लगे, पर सोहन को भी पहली बार में समझ नहीं आया — "कौन गिरा है? इतना लंबा नाम फिर से बोलो!"
फिर से वही छह शब्दों वाला पूरा नाम दोहराया गया। इस तरह जैसे-जैसे यह ख़बर एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे तक पहुँचती गई, हर बार वही लंबा नाम पूरा बोलना पड़ता, हर बार सुनने वाला चौंककर दोबारा पूछता, और हर बार थोड़ा-थोड़ा क़ीमती वक़्त बर्बाद होता चला गया। अगर बसेसर का नाम सिर्फ़ "बसेसर" होता, तो शायद यह ख़बर आधे से भी कम समय में पूरे गाँव में फैल जाती।
इधर कुएँ में बसेसर का दम फूलने लगा था। हाथ-पैर मारते-मारते उसकी ताक़त जवाब देने लगी थी, और वह मन-ही-मन सोचने लगा — "काश मैंने अपना नाम छोटा रखने दिया होता, तो शायद अब तक मदद आ भी चुकी होती!"
आख़िरकार गाँव के पाँच-छह मज़बूत आदमी रस्सी और बाँस लेकर कुएँ तक पहुँचे। उन्होंने रस्सी नीचे डाली और बड़ी मशक्कत के बाद बसेसर को बाहर खींच निकाला। बसेसर बुरी तरह थका हुआ, खाँसता-हाँफता हुआ ज़मीन पर लेट गया, पर बच गया था।
गाँव वालों ने राहत की साँस ली। मंगल काका ने हँसते हुए कहा — "बसेसर बेटा, आज तो ठीक-ठाक बच गए, पर अगर एक मिनट और देर हो जाती, तो यह तुम्हारा छह-शब्दों वाला नाम ही तुम्हारी जान पर भारी पड़ जाता। हम एक-दूसरे को ख़बर पहुँचाने में ही तुम्हारा पूरा नाम बोलते-बोलते हाँफ गए!"
बसेसर को साँस लेते हुए भी अपनी ग़लती समझ आ गई। उसने धीरे से कहा — "काका, आज से मुझे 'बसेसर' कहकर ही बुलाया करो। मुझे अब समझ आया कि नाम की शान से बड़ी चीज़ होती है — वक़्त पर मदद पहुँचना। बड़ा नाम रखने की मेरी ज़िद ने आज मुझे बाल-बाल बचाया, दोबारा ऐसी ग़लती नहीं दोहराऊँगा।"
उस दिन के बाद से गाँव में फिर से सब उसे प्यार से सिर्फ़ "बसेसर" ही बुलाने लगे, और बसेसर ने भी कभी अपने नाम को लेकर कोई शिकायत नहीं की।
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