सच्चाई का इम्तेहान

किसी राज्य में एक प्रतापी राजा राज करता था — बलशाली, न्यायप्रिय, और अपने राज्य के विस्तार से संतुष्ट। दरबार में उसके तीन सबसे भरोसेमंद अधिकारी थे — महामंत्री विक्रमसेन, कोषाध्यक्ष बलदेव, और सेनापति जयराम। तीनों ही बरसों से राजा की सेवा कर रहे थे, तीनों ही बुद्धिमान और योग्य थे।
एक दिन दरबार में बैठे-बैठे राजा के मन में अचानक एक विचार आया — "मेरे तीनों अधिकारी योग्य हैं, यह तो मुझे पता है। पर इनमें सबसे ईमानदार कौन है, यह मैंने कभी परखा नहीं। आज इसकी परीक्षा लेनी चाहिए।"
उसी शाम राजा ने तीनों अधिकारियों को दरबार में एक साथ बुलाया। सामने एक थाल में तीन मुट्ठी बीज रखे थे। राजा ने एक-एक करके तीनों के हाथ में एक-एक मुट्ठी बीज थमाया, और ऐलान किया — "यह सबसे उम्दा क़िस्म के बीज हैं। इन्हें अपने-अपने घर ले जाओ, गमले में बो दो, और एक महीने बाद, दीपावली की रात, जिसका पौधा सबसे सुंदर और सबसे बड़ा उगा हो, वही लेकर दरबार में आना।" जो राजा ने किसी को नहीं बताया, वह यह था कि तीनों मुट्ठी बीज पहले से ख़राब थे — सड़े हुए, बेजान बीज जो ज़मीन में कितनी भी मेहनत, पानी या खाद डालने पर भी कभी उग नहीं सकते थे।
तीनों अधिकारी अपने-अपने घर लौट गए।
महामंत्री विक्रमसेन ने घर पहुँचते ही बीज गमले में बो दिए। रोज़ पानी देता, धूप दिखाता, खाद डालता — पर हफ़्ते-दर-हफ़्ते बीत गए, गमले में कुछ भी नहीं उगा।
एक शाम तीनों अधिकारी दरबार से लौटते वक़्त रास्ते में मिल गए। बातों-बातों में विक्रमसेन ने पूछ ही लिया — "और भाई, तुम्हारे गमलों का क्या हाल है?"
बलदेव तुरंत बोला — "अरे मत पूछो, मेरा पौधा तो बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है! अभी से कलियाँ भी आ गई हैं, लगता है दीपावली तक फूल भी खिल जाएँगे।"
विक्रमसेन ने भी उतने ही उत्साह से कहा — "मेरा भी बिल्कुल वैसा ही हाल है! पत्तियाँ घनी हो गई हैं, कलियाँ भी दिख रही हैं, बड़ा अच्छा लग रहा है।"
दोनों ने जयराम की तरफ़ देखा। जयराम ने धीमी आवाज़ में सच बताया — "मेरे गमले में तो अभी तक कुछ भी नहीं उगा। न कोई अंकुर, न कोई पत्ती, कुछ नहीं।"
विक्रमसेन और बलदेव ने एक-दूसरे को देखकर हल्की-सी मुस्कान बदली, मानो मन-ही-मन सोच रहे हों — "बेचारा जयराम, इसकी देखभाल में ज़रूर कोई कमी रह गई होगी।" पर ऊपर से उन्होंने हमदर्दी जताते हुए कहा — "कोई बात नहीं, अभी महीना पूरा नहीं हुआ, शायद कुछ दिनों में उग आए।" कहकर दोनों अपने-अपने घर की ओर बढ़ गए।
असल में यह सुनकर विक्रमसेन और बलदेव दोनों घर पहुँचकर मन-ही-मन घबरा गए, क्योंकि उनके अपने गमलों में भी कुछ नहीं उगा था — यह बात उन्होंने एक-दूसरे से छुपाई थी, और झूठ बोल दिया था। जयराम की सच्ची बात सुनकर उन्हें एहसास हुआ कि अगर अभी भी कुछ नहीं हुआ, तो उनके पास वक़्त बहुत कम बचा है।
महीने के आख़िरी दिनों में विक्रमसेन ने घबराकर सोचा — "अगर मेरा गमला ख़ाली गया, तो राजा मुझे नाकाबिल समझेंगे, और सबके सामने मैंने पहले ही कह दिया है कि मेरे पौधे में कलियाँ आ गई हैं।" उसने बाज़ार से एक सुंदर, पहले से खिला हुआ पौधा ख़रीद लिया और उसे अपने गमले में लगा दिया, यह सोचकर कि राजा को असली-नक़ली में फ़र्क नहीं पता चलेगा।
कोषाध्यक्ष बलदेव ने भी यही किया। उसने भी चुपचाप बाज़ार से एक ख़ूबसूरत पौधा ख़रीदकर गमले में रोप लिया, यह सोचकर — "मैंने पहले ही सबको बता दिया है कि मेरा पौधा बढ़िया उग रहा है, अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं।"
सेनापति जयराम बहुत उदास था। उसने सोचा, "मैंने पूरी ईमानदारी से कोशिश की, फिर भी कुछ नहीं उगा। शायद बीज ही ख़राब थे। पर राजा के सामने ख़ाली गमला लेकर जाना बड़ी शर्म की बात होगी, ख़ासकर जब बाक़ी दोनों के पौधे इतने अच्छे बढ़ रहे हैं।" कुछ देर सोचने के बाद उसने ख़ुद से कहा — "चाहे राजा मुझे नाकाबिल ही क्यों न समझें, मैं झूठ का सहारा लेकर उनकी नज़रों में अच्छा नहीं बनना चाहता। जो सच है, वही लेकर जाऊँगा।"
दीपावली की रात दरबार सजा हुआ था। पूरा राज्य वहाँ इकट्ठा था। राजा ने ऐलान किया — "अब बारी है परिणाम की। एक-एक करके अपने गमले मेरे सामने लाओ।"
महामंत्री विक्रमसेन आगे आया, उसके गमले में एक सुंदर, भरा-पूरा फूलों वाला पौधा लहलहा रहा था। दरबारियों में फुसफुसाहट होने लगी — "वाह, कितना सुंदर उगा है!"
फिर कोषाध्यक्ष बलदेव आगे आया, उसका पौधा भी उतना ही सुंदर और भरा-पूरा था।
आख़िर में सेनापति जयराम आगे बढ़ा। उसके हाथ में वही मिट्टी का गमला था — बिल्कुल ख़ाली, सिर्फ़ मिट्टी भरी हुई, कोई पौधा नहीं। वह सिर झुकाकर बोला — "महाराज, मैंने पूरे महीने दिन-रात इसकी देखभाल की, पर इसमें कुछ भी नहीं उगा। मुझे नहीं पता क्यों, पर मैं आपके सामने झूठ लेकर नहीं आ सकता। यही सच है, और यही आपको सौंपता हूँ।"
पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। कुछ दरबारी हँसने लगे, कुछ जयराम पर तरस खाने लगे। राजा कुछ देर चुप रहा, फिर धीरे-धीरे मुस्कुराया।
राजा उठकर खड़ा हुआ और बोला — "आज तुम सब जान लो असली सच। जो बीज मैंने तीनों को दिए थे, वे पहले से ही ख़राब कर दिए गए थे — दुनिया की कोई भी मेहनत उन्हें उगा नहीं सकती थी। मैं यह परखना चाहता था कि मुसीबत में, शर्मिंदगी के डर में, और यहाँ तक कि आपस में एक-दूसरे को झूठी शेखी बघारते देखकर भी, मेरा कौन-सा अधिकारी सच्चाई का साथ नहीं छोड़ेगा।"
राजा ने विक्रमसेन और बलदेव की तरफ़ देखा — "तुम दोनों ने न सिर्फ़ मुझसे, बल्कि आपस में एक-दूसरे से भी झूठ बोला, और फिर उसी झूठ को सच साबित करने के लिए धोखे का सहारा लिया।" फिर उसने जयराम की तरफ़ देखा — "और तुमने अकेले खड़े होकर भी, दोनों तरफ़ से दबाव महसूस करते हुए भी, सच्चाई का साथ नहीं छोड़ा। जो व्यक्ति अपमान के डर से, और दूसरों की झूठी सफलता देखकर भी सच्चाई नहीं छोड़ता, वही मेरा सबसे भरोसेमंद अधिकारी कहलाने लायक़ है।"
उसी रात राजा ने सेनापति जयराम को दरबार का सबसे सम्मानित पद और अपना सबसे विश्वस्त सलाहकार घोषित कर दिया। विक्रमसेन और बलदेव शर्मिंदा होकर सिर झुकाए खड़े रहे, और पूरे राज्य में यह बात फैल गई कि राजा ने सोने-चाँदी या ताक़त से नहीं, बल्कि एक ख़ाली गमले से अपने सबसे ईमानदार अधिकारी को पहचान लिया।
📚 शिक्षाप्रद कहानियाँ की और कहानियाँ
अंधा गिद्ध और बिलाव — झूठे अजनबियों पर विश्वास का भयंकर परिणाम
एक अंधे गिद्ध ने एक धूर्त बिलाव की मीठी बातों में आकर उसे पनाह दे दी। बिलाव ने पक्षियों के बच्चों को खाकर गिद्ध को फंसा दिया, जिसका परिणाम बेकसूर गिद्ध की मौत के रूप में सामने आया।
पढ़ें →बूढ़ा बाघ और लालची राहगीर — लालच का दलदल और मौत का फंदा
एक बूढ़े और शातिर बाघ ने सोने के कंगन का लालच देकर एक राहगीर को दलदल में फंसा लिया। राहगीर बाघ के धर्म-कर्म के दिखावे में आकर अपनी जान गँवा बैठा।
पढ़ें →हिरण, कौवा और सियार — सच्चे मित्र की चेतावनी और स्वार्थी का अंत
एक सीधे हिरण ने कौवे की चेतावनी को नज़रअंदाज़ कर एक धूर्त सियार से दोस्ती कर ली। सियार ने हिरण को किसान के जाल में फंसा दिया, लेकिन सच्चे मित्र कौवे ने उसकी जान बचाई और सियार अपने ही बुने जाल में मारा गया।
पढ़ें →सोने का हंस — अत्यधिक लालच और जादुई पंखों का रहस्य
एक जादुई सोने का हंस एक गरीब की मदद करने के लिए उसे सोने के पंख देता था। लेकिन उस औरत के लालच ने उसे सब कुछ छीनकर उसे वापस उसी गरीबी में धकेल दिया।
पढ़ें →बुद्धिमान व्यापारी और मरा हुआ चूहा — शून्य से शिखर तक का सफर
एक गरीब लेकिन चतुर लड़के ने एक मरे हुए चूहे से व्यापार शुरू किया और अपनी सूझ-बूझ से नगर का सबसे अमीर व्यापारी बन गया।
पढ़ें →खरगोश का खौफ: 'आसमान गिर रहा है!' — अफ़वाहों का अंधा तूफान
एक डरपोक खरगोश ने फल गिरने की आवाज़ को आसमान गिरना समझ लिया और पूरे जंगल में अफ़वाह फैलाकर भयंकर भगदड़ मचा दी। शेर ने अपनी सूझबूझ से जानवरों को सच्चाई से अवगत कराया।
पढ़ें →