बिल्ली और दो चूहे — ढोंगी साधु और विश्वासघात

एक घर में दो चूहे रहते थे। एक दिन उन्हें कहीं से रोटी का एक बहुत ही स्वादिष्ट और बड़ा टुकड़ा मिल गया। अब दोनों में झगड़ा शुरू हो गया।
पहला चूहा: "यह टुकड़ा पहले मैंने देखा था, इसलिए यह मेरा है!" दूसरा चूहा: "नहीं! इसे मैंने उठाया था, इसलिए इस पर मेरा हक है।"
दोनों का झगड़ा इतना बढ़ गया कि उन्होंने किसी तीसरे से फैसला करवाने की सोची। वे रोटी का टुकड़ा लेकर घर के बाहर निकले।
नदी के किनारे उन्होंने एक 'बिल्ली' को बैठे देखा। बिल्ली ने आँखें बंद की हुई थीं, उसके गले में माला थी और वह एक पैर पर खड़ी होकर सूर्य भगवान की पूजा करने का नाटक कर रही थी।
तपस्वी बिल्ली का ढोंग: चूहों को थोड़ा डर लगा। परंतु बिल्ली का यह साधु वाला रूप देखकर उन्होंने दूर से आवाज़ लगाई: "बिल्ली मौसी! हम दोनों में रोटी के लिए झगड़ा हो गया है। क्या तुम हमारा फैसला करोगी?"
बिल्ली ने बहुत ही शांत और पवित्र आवाज़ में कहा: "बेटा! मैंने तो बहुत पहले ही हिंसा और मांस खाना छोड़ दिया है। मैं अब 'तपस्वी' बन गई हूँ और केवल धर्म के मार्ग पर चलती हूँ। मैं तुम्हारे झगड़े का एकदम सही न्याय करूँगी। मेरे पास आ जाओ।"
चूहों ने कहा: "मौसी, तुम पर भरोसा तो है, लेकिन फिर भी तुम हमारी जन्मजात दुश्मन हो, हम थोड़ी दूर ही रहेंगे।"
मौत का इंसाफ: बिल्ली बहुत शातिर थी। उसने अपना आखिरी दांव चला और बोली: "बेटा, तुम्हारी बात सही है। परंतु मैं अब बहुत बूढ़ी हो गई हूँ। मेरी आँखें कमज़ोर हैं और मेरे 'कानों से मुझे कुछ सुनाई नहीं देता'। तुम इतनी दूर से बोलोगे तो मैं तुम्हारा न्याय कैसे करूँगी? डरो मत, बिल्कुल मेरे पास आओ और मेरे 'कानों' में आकर अपनी बात बताओ।"
चूहे उस ढोंगी बिल्ली की मीठी और पवित्र बातों के जाल में पूरी तरह फंस गए। वे जैसे ही उछलकर बिल्ली के कानों के पास पहुँचे...
बिल्ली ने अपनी असली फितरत दिखाई! उसने एक सेकंड से भी कम समय में अपने नुकीले पंजे बाहर निकाले और दोनों चूहों को एक साथ दबोच लिया। कुछ ही पलों में बिल्ली दोनों चूहों को खा गई और रोटी का टुकड़ा भी डकार गई।
नीति / सीख: कोई इंसान चाहे बाहर से कितना भी धर्म-कर्म या साधु होने का ढोंग कर ले, अगर वह आपका 'प्राकृतिक शत्रु' या स्वभाव से दुष्ट है, तो उस पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए। झगड़े का निपटारा खुद कर लेना चाहिए, वरना तीसरा हमेशा फायदा उठाता है।
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