चतुर सियार और हाथी — झूठी तारीफ और मौत का दलदल

एक जंगल में सियारों का एक बहुत बड़ा झुंड रहता था। एक दिन उन्होंने जंगल में एक बहुत ही विशालकाय 'हाथी' को घूमते हुए देखा। सियारों के मुँह में पानी आ गया। उन्होंने सोचा कि अगर यह हाथी मर जाए, तो हमें महीनों तक शिकार नहीं करना पड़ेगा। परंतु छोटे सियार इतने बड़े हाथी को मार नहीं सकते थे।
झुंड में एक बहुत ही बूढ़ा और चतुर सियार था। उसने कहा: "तुम सब चिंता मत करो। मैं अपनी बुद्धि से इस पहाड़ जैसे हाथी को ज़मीन पर गिरा दूँगा।"
वह चतुर सियार हाथी के पास गया और साष्टांग प्रणाम करते हुए बोला: "महाराजाधिराज की जय हो! हे गजराज, आप ही इस पूरे जंगल में सबसे विशाल, बलवान और सुंदर जानवर हैं। जंगल के सभी जानवरों ने मिलकर फैसला किया है कि हम शेर को हटाकर आपको अपना 'नया राजा' बनाएंगे।"
अहंकार और दलदल का रास्ता: हाथी अपनी इतनी तारीफ सुनकर खुशी से फूल कर कुप्पा हो गया। उसका अहंकार जाग गया।
सियार ने कहा: "महाराज! राज्याभिषेक का शुभ मुहूर्त बीता जा रहा है। आप तुरंत मेरे पीछे-पीछे चलिए, सभी जानवर आपका इंतज़ार कर रहे हैं।"
हाथी बिना कुछ सोचे-समझे राज्याभिषेक के लालच में उस सियार के पीछे-पीछे चल पड़ा। सियार उसे एक बहुत ही गहरे 'दलदल' के किनारे ले गया। सियार तो बहुत हल्का था, इसलिए वह दलदल के ऊपर सूखी घास पर पैर रखकर आसानी से पार निकल गया।
परंतु जैसे ही भारी-भरकम हाथी ने दलदल में पैर रखा, वह धंसने लगा।
हाथी का अंत: हाथी घबरा गया। वह जितना ज़ोर लगाता, उतना ही और अंदर धंसता जाता। दलदल उसके पेट तक आ गया था।
हाथी ने चिल्लाकर कहा: "अरे मित्र सियार! मैं तो दलदल में धंस रहा हूँ। जल्दी से मेरी सूंड पकड़कर मुझे बाहर निकालो!"
सियार दूर सुरक्षित ज़मीन पर खड़ा होकर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा और व्यंग्य कसते हुए बोला: "महाराज! मेरी पूंछ पकड़ लीजिए, मैं आपको बाहर निकाल लूँगा! अरे मूर्ख हाथी! राजा बनने के लालच और अपनी झूठी तारीफ सुनकर तेरी अक्ल घास चरने गई थी क्या? अब यहीं मरो!"
कुछ ही देर में भारी हाथी पूरी तरह दलदल में डूबकर मर गया और सियारों के झुंड ने कई महीनों तक उसके मांस की दावत उड़ाई।
नीति / सीख: जो लोग आपकी झूठी तारीफ करते हैं, वे आपके सबसे बड़े दुश्मन होते हैं। लालच और अहंकार में आकर किसी अनजान इंसान के पीछे चलने वाला हमेशा मौत के दलदल में ही फंसता है।
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