चींटी और टिड्डा — भविष्य की तैयारी और आज का आलस

गर्मियों के सुहावने दिन थे। सूरज चमक रहा था और जंगल में चारो तरफ हरियाली और भोजन भरा हुआ था।
एक हरा 'टिड्डा' एक पत्ते पर आराम से लेटा हुआ अपनी बांसुरी बजा रहा था और मज़े से गाना गा रहा था। उसे कल की कोई चिंता नहीं थी।
तभी वहाँ से एक 'चींटी' गुज़री। वह बहुत ही छोटी थी, लेकिन वह अपने शरीर से कई गुना बड़ा मक्के का एक दाना अपनी पीठ पर लादकर बड़ी मुश्किल से अपने बिल की ओर ले जा रही थी। चींटी पसीने से तर-बतर थी।
टिड्डे का मज़ाक: टिड्डे ने चींटी को देखकर उसका मज़ाक उड़ाया: "अरे चींटी रानी! इतनी सुंदर गर्मियों में तुम इतनी मेहनत क्यों कर रही हो? आओ मेरे साथ बैठो, गाना गाओ और जीवन का आनंद लो। पूरे जंगल में इतना खाना पड़ा है, फिर तुम यह दाना ढोकर क्यों मर रही हो?"
चींटी ने रुके बिना जवाब दिया: "टिड्डे भाई! मैं आने वाली 'सर्दियों' के लिए अपना भोजन इकट्ठा कर रही हूँ। जब बर्फ गिरेगी, तो बाहर खाने को कुछ नहीं मिलेगा। तुम्हें भी मेरी तरह अभी से सर्दियों की तैयारी कर लेनी चाहिए।"
टिड्डा ज़ोर-ज़ोर से हंसा और बोला: "सर्दियों में तो अभी बहुत महीने बाकी हैं! आज का मज़ा कल की चिंता में क्यों खराब करना?"
चींटी ने कुछ नहीं कहा और वह अपने काम में लगी रही। पूरी गर्मियां चींटी ने दिन-रात मेहनत करके अपने बिल में बहुत सारा अनाज जमा कर लिया, जबकि टिड्डा रोज़ सिर्फ बांसुरी बजाता और सोता रहा।
सर्दियों की मार: कुछ महीनों बाद भयंकर सर्दियां आ गईं। पूरे जंगल में हर तरफ सफेद 'बर्फ' की मोटी चादर बिछ गई। पेड़ों के सारे पत्ते झड़ गए।
अब टिड्डे के पास न तो छिपने के लिए घर था और न ही खाने के लिए एक भी दाना। वह भूख और ठंड के मारे कांपने लगा। उसे चींटी की बात याद आई।
वह कांपता हुआ चींटी के घर (बिल) के पास गया और उसने दरवाज़ा खटखटाया: "चींटी बहन! मुझे बहुत भूख लगी है और मैं ठंड से मर रहा हूँ। कृपया मुझे कुछ खाने को दे दो।"
चींटी ने दरवाज़ा खोला और कहा: "टिड्डे भाई! जब मैं पूरी गर्मी धूप में मेहनत कर रही थी, तब तुम मेरा मज़ाक उड़ा रहे थे और बांसुरी बजा रहे थे। जो लोग मेहनत करने के समय गाना गाकर और आराम करके अपना समय बर्बाद करते हैं, उन्हें सर्दियों में 'भूखे पेट नाचना' ही पड़ता है।"
चींटी ने उसे एक छोटा सा दाना दिया और अपना दरवाज़ा बंद कर लिया। टिड्डे को अपनी गलती का गहरा अहसास हुआ कि उसने समय रहते अपने भविष्य की कोई तैयारी नहीं की।
नीति / सीख: जो आज आराम और आलस करता है, उसे कल बहुत कष्ट सहने पड़ते हैं। भविष्य की सुरक्षा के लिए 'आज' की मेहनत बहुत ज़रूरी है। समय बीत जाने पर पछताने से कुछ हासिल नहीं होता।
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