मूर्ख गधा और नमक का बोरा — कामचोरी की सज़ा और रुई का बोझ

एक व्यापारी के पास एक गधा था। व्यापारी रोज़ उस गधे की पीठ पर 'नमक के भारी बोरे' लादकर नदी के पार बाज़ार में बेचने ले जाता था।
एक दिन नदी पार करते समय, गधे का पैर अचानक एक पत्थर से टकराकर फिसल गया और वह पानी में गिर पड़ा। गधा कुछ देर तक पानी में छटपटाता रहा। जब वह उठकर खड़ा हुआ, तो उसे बहुत हैरानी हुई। उसकी पीठ का भारी बोझ एकदम 'हल्का' हो गया था!
दरअसल, पानी में गिरने के कारण बोरे के अंदर का सारा नमक पानी में घुल गया था। गधा बहुत खुश हुआ।
कामचोरी की आदत: गधे को अब एक तरकीब मिल गई थी। अगले दिन जब व्यापारी ने फिर से गधे की पीठ पर नमक के बोरे लादे, तो गधा जानबूझकर नदी के ठीक बीच में जाकर पानी में बैठ गया। नमक फिर से पानी में घुल गया और बोझ हल्का हो गया। व्यापारी को भारी नुकसान हुआ।
गधे ने लगातार तीन-चार दिन तक यही नाटक किया। वह रोज़ पानी में गिरता और बिना मेहनत के बाज़ार पहुँच जाता।
व्यापारी की चालाकी: व्यापारी समझ गया कि गधा अब जानबूझकर पानी में गिरता है और कामचोरी कर रहा है। उसने गधे को सबक सिखाने की ठानी।
अगले दिन व्यापारी ने गधे की पीठ पर नमक के बजाय 'रुई के बड़े-बड़े बोरे' लाद दिए। रुई बहुत हल्की होती है, इसलिए गधे को लगा कि आज तो बोझ वैसे ही बहुत कम है।
नदी के पास पहुँचकर गधे ने अपनी वही पुरानी तरकीब अपनाई। वह जानबूझकर पानी में गिर पड़ा। गधे ने सोचा कि पानी में घुलकर यह रुई का बोझ और भी हल्का हो जाएगा।
परंतु रुई पानी में घुलती नहीं है, बल्कि वह पानी को 'सोख' लेती है!
रुई ने सारा पानी सोख लिया और वह पहले से भी दस गुना ज़्यादा 'भारी' हो गई। जब गधे ने पानी से उठने की कोशिश की, तो उस भयानक बोझ के कारण वह खड़ा ही नहीं हो पाया। बोझ इतना अधिक था कि गधे की पीठ टूटने को हो गई। वह पानी में डूबने लगा।
व्यापारी ने उसे डंडे मार-मार कर बड़ी मुश्किल से पानी से बाहर निकाला। उस दिन गधे को अपनी कामचोरी की ऐसी सज़ा मिली कि उसने जीवन में फिर कभी नदी में गिरने का नाटक नहीं किया।
नीति / सीख: कामचोरी और चालाकी हर बार काम नहीं आती। जो अपने कर्तव्य से भागने के लिए बहाने बनाता है, उसे अंत में अपनी मेहनत से भी कई गुना ज़्यादा बोझ और कष्ट उठाना पड़ता है।
📜 पंचतंत्र की और कहानियाँ
बंदर और लकड़ी का खूंटा — बिना बुलाए मेहमान और बेवकूफी का परिणाम
एक बंदर ने बढ़ई के छोड़े हुए आधे चिरे लट्ठे में फंसे खूंटे को निकालने की कोशिश की। खूंटा निकलते ही लकड़ी के दोनों हिस्से जुड़ गए और बंदर की पूंछ दबकर उसकी मृत्यु हो गई।
पढ़ें →सियार और युद्ध का ढोल — अनजाने डर का सामना और हकीकत
एक सियार ने युद्ध के मैदान में पड़े ढोल की आवाज़ सुनकर डरकर भागने की सोची, परंतु जब उसने साहस करके देखा तो पाया कि वह केवल एक खोखला ढोल था जिस पर टहनियाँ टकरा रही थीं।
पढ़ें →बगुला और केकड़ा — लालच का अंत और केकड़े की समझदारी
एक बूढ़े बगुले ने मछलियों को धोखा देकर उन्हें एक काल्पनिक तालाब में ले जाने का वादा किया। लेकिन चालाक केकड़े ने बगुले की पतली गर्दन को अपने पंजों से कसकर जकड़ लिया और उसकी हत्या करके सबको बचा लिया।
पढ़ें →चतुर खरगोश और मूर्ख शेर — बुद्धि का बल और कुएं की परछाई
एक खूंखार शेर रोज़ जानवरों को मारता था। खरगोश ने उसे एक कुएं में ले जाकर दिखाया कि वहाँ 'दूसरा शेर' है। शेर ने अपनी ही परछाई को दूसरा शेर समझकर उस पर झपटा और कुएं में गिरकर मर गया।
पढ़ें →खटमल और जूं की कहानी — बिना सोचे-समझे दी गई शरण और मौत
एक समझदार जूं राजा के बिस्तर पर चुपचाप रहती थी। एक खटमल ने जूं को बहकाया और बिस्तर पर शरण मांगी, फिर राजा को दर्दनाक डंक मार दिया। सेवकों ने बिस्तर छाना, खटमल तो नहीं मिला, लेकिन बेचारी जूं मारी गई।
पढ़ें →नीला सियार — झूठा दिखावा और असलियत का पर्दाफाश
एक सियार नीले रंग में नहाकर जंगल का राजा बन गया। उसने दूसरे सियारों को तिरस्कार किया। एक रात अपनी बिरादरी की आवाज़ सुनकर उसने सियारों की तरह रेंकना शुरू कर दिया और शेर उसकी असलियत जानकर उसे मार डाला।
पढ़ें →