दर्जी और हाथी — जैसा करोगे, वैसा भरोगे (बदले की कीचड़)

एक नगर में एक राजा का हाथी रहता था। महावत उस हाथी को रोज़ सुबह नदी पर नहलाने के लिए ले जाता था। नदी के रास्ते में बाज़ार पड़ता था, जहाँ एक दर्जी की दुकान थी।
दर्जी बहुत अच्छे स्वभाव का था। जब भी हाथी उसकी दुकान के सामने से गुज़रता, दर्जी उसे खाने के लिए रोज़ एक 'केला' या ताज़ी रोटी देता था। हाथी भी अपनी सूंड उठाकर दर्जी को सलाम करता। धीरे-धीरे दोनों में बहुत अच्छी 'दोस्ती' हो गई।
एक दिन दर्जी का किसी बात पर अपनी पत्नी से झगड़ा हो गया था और वह बहुत 'गुस्से' में दुकान पर बैठा था।
दर्जी की शरारत और सुई की चुभन: उसी समय हाथी नदी की ओर जाते हुए दर्जी की दुकान के सामने आकर खड़ा हो गया और केले की उम्मीद में अपनी सूंड दर्जी की ओर बढ़ा दी।
दर्जी का मूड खराब था। उसने हाथी को केला देने के बजाय, अपने हाथ में पकड़ी हुई कपड़े सिलने की 'नुकीली सुई' हाथी की सूंड में ज़ोर से चुभा दी!
हाथी दर्द से चिंघाड़ उठा। उसकी सूंड से खून निकलने लगा। वह चुपचाप दर्द सहते हुए वहाँ से चला गया। दर्जी अपनी इस क्रूर शरारत पर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा।
हाथी का बदला: हाथी नदी पर पहुँचा। उसने पानी पिया और नहाया। परंतु वह दर्जी की उस सुई की चुभन और अपमान को भूला नहीं था।
लौटते समय हाथी ने नदी के किनारे से अपनी लंबी सूंड में ढेर सारा 'गंदा और कीचड़ वाला पानी' भर लिया।
जब हाथी दर्जी की दुकान के सामने पहुँचा, तो दर्जी अपनी दुकान में रखे लोगों के महंगे और नए कपड़ों की सिलाई कर रहा था। हाथी ने दुकान के ठीक सामने खड़े होकर अपनी सूंड ज़ोर से उठाई और सारा 'गंदा कीचड़ वाला पानी' फव्वारे की तरह दर्जी और उसकी दुकान के अंदर फेंक दिया!
दर्जी सिर से पैर तक कीचड़ में नहा गया। लोगों के सिलने के लिए रखे सारे महंगे और नए कपड़े पूरी तरह खराब हो गए। दर्जी को भारी नुकसान हुआ। उसे अपनी उस एक छोटी सी क्रूर शरारत की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।
नीति / सीख: जैसे को तैसा। जो हमारे साथ अच्छा व्यवहार करता है, हमें कभी उसे अकारण दुख नहीं देना चाहिए। बेज़ुबान जानवरों को सताने का परिणाम हमेशा बुरा ही होता है।
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