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खाली हाथों की दौलत

अमन खंडेलवाल7 मिनट का पठन
खाली हाथों की दौलत

रामपुर गाँव के किनारे एक छोटा-सा कच्चा घर था। उसी घर में किसान हरिदास रहता था—पत्नी सीता, बूढ़ी माँ दादी अम्मा और आठ साल का बेटा मोहन साथ थे। घर छोटा था, पर जिम्मेदारियाँ बहुत बड़ी थीं।

हरिदास के पास दो बीघा ज़मीन थी, लेकिन साल दर साल फसल अच्छी नहीं होती थी। कभी बीज सही नहीं निकलते, कभी मिट्टी सूखी रह जाती, और जो थोड़ी बहुत उपज निकलती वह कर्ज़ चुकाने में खत्म हो जाती। कई रातों में खाना पानी और सूखी रोटी तक सीमित रह जाता।

सीता रोज़ सुबह चूल्हा जलाते समय भगवान से कुछ नहीं माँगती थी। वह बस इतना कहती थी, "आज बच्चों का पेट भर जाए।" दादी अम्मा आँगन में बैठकर आसमान को देखतीं और बुदबुदातीं कि शायद भगवान हमसे रूठ गए हैं।

धीरे-धीरे घर में आशा और विश्वास दोनों कम होते जा रहे थे। हरिदास मेहनत से पीछे नहीं हटता था, फिर भी हर कोशिश नाकाम हो जाती—कभी बीज खराब, कभी व्यापारी सही दाम नहीं देता, कभी बीमारी आ जाती। जब साहूकार ने साफ कह दिया कि अब कर्ज़ वापस चाहिए, हरिदास अंदर से टूट-सा गया।

उस रात वह चुपचाप गाँव के पुराने मंदिर चला गया। मंदिर में न पुजारी था, न भीड़—बस ठंडी हवा और जलता हुआ एक दीया था। हरिदास ने हाथ जोड़े और कहा कि मेहनत पूरी करता हूँ, फिर भी गलती समझ नहीं आती; बस इतनी कृपा हो जाए कि परिवार का पेट भर सके।

अगली सुबह पौ फटते ही करीब पाँच बजे हरिदास पानी भरने बाहर निकला। घर के पास पेड़ के नीचे एक आदमी सिकुड़कर बैठा था—फटे कपड़े, ठंड से काँपता हुआ और चेहरा सूखा हुआ। हरिदास ने पूछा, "क्या हुआ भाई? तबियत तो ठीक है?"

आदमी ने धीमे से कहा कि दो दिन से कुछ खाया नहीं और रात यहीं काट दी, अब आगे जाने की हिम्मत नहीं बची। हरिदास ने उसे सहारा देकर उठाया और बोला, "चलो, पहले अंदर आओ।" उसने बिना देर किए उसे घर में बैठा दिया।

सीता ने तुरंत पानी दिया और दादी अम्मा ने अपनी पुरानी शॉल उसे ओढ़ा दी। मोहन कंबल ले आया और थोड़ी देर में सीता ने गरम चाय बनाकर सुबह की बची रोटी गरम कर दी। उस आदमी की आँखें भर आईं कि आपके पास खुद कुछ नहीं, फिर भी आप लोग इतना कर रहे हैं।

हरिदास ने बस इतना कहा, "इंसान अगर इंसान का साथ न दे, तो फिर क्या बचेगा?" दोपहर तक वह आदमी थोड़ा ठीक हुआ और शुक्रिया कहकर चला गया। जाते-जाते उसने अपना नाम भी नहीं बताया।

करीब दस दिन बाद हरिदास खेत में काम कर रहा था कि किसी को आते देखा। वही आदमी था, लेकिन इस बार वह बेहतर दिख रहा था—साफ कपड़े और चेहरे पर थोड़ी रौनक। उसने मुस्कराकर पूछा, "भइया, मुझे पहचाना?"

उसने बताया कि पास के गाँव में मजदूरी मिल गई और आज पहली कमाई मिली है, तो सबसे पहले आपके पास आना था। फिर उसने एक कपड़े की पोटली खोली, जिसमें मुट्ठी भर बीज थे, और बोला कि अच्छी किस्म के हैं इसलिए आपके लिए ले आया। हरिदास ने मना किया कि ये तुम्हारी पहली कमाई है, पर आदमी ने कहा कि आप नहीं लेंगे तो मुझे बुरा लगेगा।

हरिदास ने बीज ले लिए और दोनों ने चाय पी। उसने सोचा, आजमाने में क्या जाता है, और खेत के एक कोने में वो बीज बो दिए। दो हफ्ते में पौधे निकल आए और जब बारिश कम हुई तो बाकी फसल मुरझाने लगी, लेकिन वो कोना हरा-भरा रहा।

तीन महीने बाद जब फसल पकी, उस छोटे हिस्से से इतना अनाज निकला कि हरिदास हैरान रह गया। उसे समझ आ गया कि ये बीज तो कमाल के हैं और उसे उस मजदूर को ढूँढना चाहिए। अगले दिन वह उसे खोजकर पास के गाँव पहुँचा, तो मजदूर खुश होकर बोला कि चलिए, मालिक से मिलवाता हूँ।

मालिक एक अनुभवी और भले किसान थे, और मजदूर ने पूरी कहानी सुना दी कि कैसे हरिदास ने भूखे को अपना खाना बाँटा। मालिक ने कहा कि तुमने इसकी जान बचाई, तो यह मेरा भी कर्ज हो गया, और पूछा कि बीज चाहिए? हरिदास ने कहा कि चाहिए, पर अभी पैसे नहीं हैं, फसल के बाद दे दूँगा।

मालिक मुस्कराए और बोले कि उधार ले जाओ, ब्याज नहीं लूँगा, नेकी का बदला नेकी से ही होता है। फिर उन्होंने समझाया कि ये शुद्ध देसी किस्म के बीज हैं, इनके साथ रासायनिक खाद डालोगे तो फायदा नहीं होगा। उन्होंने गोबर की खाद, सड़ी पत्तियाँ और नीम की खली जैसी प्राकृतिक खाद के बारे में बताया और दो बोरी तैयार खाद भी दे दी।

हरिदास को समझ आ गया कि पहले फसल इसीलिए खराब होती थी—सही बीज नहीं थे और जमीन की ताकत भी खत्म हो गई थी। अगले साल उसने वही किया जो मालिक ने बताया था: पूरे खेत में देसी बीज बोए और प्राकृतिक खाद डाली। फसल बहुत अच्छी हुई और उसने अनाज बेचकर मालिक का उधार चुकाया, साथ ही साहूकार का भी कुछ कर्ज उतारा।

धीरे-धीरे हालात सुधरते गए और तीन साल में साहूकार का पूरा कर्ज खत्म हो गया। घर में सुख-शांति लौट आई, मोहन नियमित स्कूल जाने लगा और दादी अम्मा की दवाइयाँ समय पर आने लगीं। एक दिन हरिदास खेत में लहलहाती फसल देख रहा था, तो मोहन ने पूछा कि उस दिन हमारे पास खुद खाने को नहीं था, फिर भी आपने उस आदमी को क्यों खिलाया?

हरिदास ने बेटे के सिर पर हाथ रखा और कहा, "बेटा, जो हाथ में रखोगे, वो उतना ही रहेगा; जो बाँट दोगे, वो बढ़ता जाएगा।" उसने समझाया कि हमने एक सुबह का नाश्ता दिया और भगवान ने सालों का खाना लौटा दिया, और मदद करने के लिए अमीर होना जरूरी नहीं—बस दिल बड़ा होना चाहिए।

सीता पास खड़ी मुस्कुरा रही थी। दादी अम्मा ने आसमान की ओर देखा और हाथ जोड़कर बोलीं कि भगवान रूठे नहीं थे, परीक्षा ले रहे थे।

🎉 कहानी समाप्त

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