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किंग मिडास का सुनहरा स्पर्श

शिक्षाप्रद कहानियाँ5 मिनट का पठन
किंग मिडास का सुनहरा स्पर्श

बहुत पुराने समय की बात है, फ्रिजिया नाम के एक राज्य में मिडास नाम का राजा राज करता था। मिडास के पास पहले से ही अपार धन-संपत्ति थी — विशाल महल, भरे हुए ख़ज़ाने, हरे-भरे बाग़। पर मिडास की एक कमज़ोरी थी — उसे सोने से बेइंतहा लगाव था। वह घंटों अपने ख़ज़ाने में बैठकर सोने के सिक्कों और आभूषणों को निहारता रहता, यह सोचते हुए कि काश उसके पास सोना कभी ख़त्म ही न हो।

एक दिन मिडास के बाग़ में एक बूढ़ा, अजीब-सा व्यक्ति भटकता हुआ मिला। असल में वह एक देवता का साथी था, जो रास्ता भटककर मिडास के राज्य में आ पहुँचा था। मिडास ने उसे पहचाना नहीं, पर उसकी अच्छी तरह मेहमान-नवाज़ी की, उसे भरपेट भोजन कराया और कई दिनों तक अपने महल में आराम से रहने दिया।

जब वह देवता का साथी अपने स्वामी के पास वापस लौटा, तो उसने मिडास की उदारता और मेहमान-नवाज़ी की खूब तारीफ़ की। इससे प्रसन्न होकर देवता स्वयं मिडास के पास आए और कहा — "तुमने मेरे साथी का जिस तरह ख़याल रखा, उससे मैं बहुत ख़ुश हूँ। बोलो, तुम्हें क्या वरदान चाहिए? जो भी माँगोगे, वह मैं तुम्हें दूँगा।"

मिडास की आँखों में सोने की चमक उतर आई। उसने बिना ज़्यादा सोचे-समझे कहा — "मुझे यह वरदान दीजिए कि मैं जिस भी चीज़ को छुऊँ, वह सोने में बदल जाए!"

देवता ने मिडास की तरफ़ ग़ौर से देखा, मानो एक बार उसे रोकने की कोशिश कर रहे हों, फिर धीरे से कहा — "जैसी तुम्हारी इच्छा।" और वहाँ से चले गए।

मिडास को पहले तो यक़ीन ही नहीं हुआ। उसने पास पड़ी एक टहनी को छुआ — वह तुरंत चमचमाते सोने में बदल गई! उसने एक पत्थर उठाया — वह भी सोना बन गया! ख़ुशी से पागल हुआ मिडास पूरे बाग़ में दौड़ने लगा, हर पेड़, हर फूल, हर दीवार को छूता गया, और हर चीज़ सोने में तब्दील होती चली गई। महल में लौटकर उसने दरवाज़ों के हत्थे छुए, कुर्सियाँ छुईं, मेज़ें छुईं — सब कुछ सोना बनता गया।

मिडास की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। उसने सोचा — "आज मैं दुनिया का सबसे धनवान इंसान बन गया हूँ!"

भूख लगने पर उसने खाने की मेज़ पर बैठकर रोटी उठाई — पर जैसे ही उसके हाथ रोटी को छुआ, वह भी सख़्त सोने का टुकड़ा बन गई। उसने फल उठाया, वह भी सोना बन गया। उसने पानी का प्याला उठाया, पानी भी उसके होंठ छूते ही सोने में बदल गया। मिडास को पहली बार एहसास हुआ कि कुछ गड़बड़ है — वह न कुछ खा सकता था, न पी सकता था।

तभी उसकी छोटी बेटी दौड़ती हुई आई, जो अपने पिता से बहुत प्यार करती थी। उसने मिडास को उदास देखकर पूछा — "पिताजी, आप इतने परेशान क्यों हैं?" और यह कहते हुए वह उससे लिपटने के लिए दौड़ी।

मिडास ने "रुको, मत छूना मुझे!" चिल्लाने की कोशिश की, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जैसे ही बेटी ने उसे छुआ, वह भी उसी पल एक ठंडी, निर्जीव सोने की मूर्ति में बदल गई।

मिडास टूट गया। जिस सोने के लिए वह इतना तरसता था, आज वही सोना उसकी सबसे प्यारी चीज़ — उसकी बेटी — को उससे छीन चुका था। वह अपनी बेटी की सोने की मूर्ति के सामने घुटनों के बल बैठकर फूट-फूटकर रोने लगा। उसे समझ आ गया कि उसने कितनी बड़ी भूल कर दी थी।

रोते-बिलखते मिडास ने आकाश की तरफ़ हाथ जोड़कर देवता को पुकारा — "मुझे माफ़ कर दीजिए! मैंने बहुत बड़ी ग़लती कर दी। कृपया यह वरदान वापस ले लीजिए, मुझे मेरी बेटी वापस चाहिए, सोना नहीं!"

देवता उसकी सच्ची पश्चाताप भरी पुकार सुनकर प्रकट हुए। उन्होंने मिडास से कहा — "अब तुम समझ गए हो कि हर चीज़ की एक क़ीमत होती है, और कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिनकी क़ीमत सोने से नहीं आँकी जा सकती। जाओ, पास की नदी में स्नान करो, उसका जल तुम्हारे इस वरदान को धो देगा।"

मिडास तुरंत भागा और नदी में कूद गया। जैसे ही उसने पानी में डुबकी लगाई, उसका सुनहरा स्पर्श धुल गया। वह भागकर वापस महल आया और अपनी बेटी को छुआ — इस बार वह सोने में नहीं बदली, बल्कि तुरंत जीवित होकर उसकी बाहों में आ गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

मिडास ने उसी दिन अपने महल के सारे सोने के ख़ज़ाने को त्याग दिया और नदी किनारे एक साधारण जीवन बिताने लगा। उसे समझ आ गया था कि दुनिया की सबसे बड़ी दौलत सोना नहीं, बल्कि वे लोग हैं जिन्हें हम प्यार करते हैं — और उनकी क़ीमत किसी भी ख़ज़ाने से कहीं ज़्यादा होती है।

🎉 कहानी समाप्त

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