सबसे क़ीमती उपहार

एक राज्य में एक प्रतापी राजा राज करता था। उसका जन्मदिन नज़दीक आ रहा था, और पूरे राज्य में इसकी तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं। राजा के मंत्री ने ऐलान करवा दिया — "राजा के जन्मदिन पर जो भी सबसे बेहतरीन उपहार लाएगा, उसे राजा की तरफ़ से विशेष सम्मान मिलेगा।"
यह सुनकर राज्य भर के अमीर व्यापारी, ज़मींदार और सामंत अपनी-अपनी हैसियत दिखाने की होड़ में जुट गए। किसी ने सोने के आभूषण मँगवाए, किसी ने विदेशी रेशमी वस्त्र, किसी ने बहुमूल्य रत्नों से जड़ा हुआ ताज, तो किसी ने अरबी नस्ल का सबसे सुंदर घोड़ा। हर कोई एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर उपहार लाने की तैयारी में लगा था, यह सोचकर कि सबसे महँगा तोहफ़ा ही राजा का सबसे ज़्यादा दिल जीतेगा।
इसी राज्य के एक छोटे से गाँव में मोहन नाम का एक ग़रीब बालक अपनी विधवा माँ के साथ रहता था। मोहन के पिता एक कुम्हार थे, जो कुछ साल पहले चल बसे थे। मोहन ने भी अपने पिता से मिट्टी के बर्तन और दीये बनाना सीखा था, और वही करके वह और उसकी माँ अपना गुज़ारा चलाते थे।
जब मोहन को पता चला कि राजा का जन्मदिन आ रहा है और सब लोग बड़े-बड़े उपहार ले जा रहे हैं, तो उसका मन भी हुआ कि वह भी कुछ भेंट करे। पर उसके पास न पैसे थे, न कोई क़ीमती चीज़। उसने अपनी माँ से कहा — "माँ, मेरे पास तो राजा को देने के लिए कुछ भी नहीं है।"
माँ ने प्यार से समझाया — "बेटा, ज़रूरी नहीं कि उपहार महँगा हो। तुम जो सबसे अच्छा बना सकते हो, वही अपने हाथों से बनाकर ले जाओ। दिल से दिया गया छोटा उपहार भी कम नहीं होता।"
मोहन को यह बात जँच गई। उसने कई दिन मेहनत करके अपनी सबसे अच्छी मिट्टी छानी, बड़ी बारीकी से एक सुंदर दीया बनाया, उसे धूप में सुखाया, फिर आँच में पकाया। उसने उस दीये पर बड़े जतन से कुछ नक़्क़ाशी भी की, यह सोचकर कि यह उसकी तरफ़ से राजा के लिए सबसे अच्छी भेंट होगी।
जन्मदिन के दिन राजा के दरबार में उपहारों की क़तार लग गई। सोने के आभूषण, रत्न-जड़ित मुकुट, रेशमी वस्त्र, क़ीमती घोड़े — एक के बाद एक शानदार तोहफ़े राजा के सामने पेश किए जा रहे थे। दरबारी और सामंत बड़े गर्व से अपने-अपने उपहार दिखा रहे थे, और राजा हर उपहार को देखकर धन्यवाद कह रहा था।
आख़िर में सबसे पीछे खड़ा मोहन डरते-सहमते आगे बढ़ा। उसके कपड़े मैले थे, हाथों में मिट्टी लगी हुई थी, और उसके हाथ में सिर्फ़ एक साधारण-सा मिट्टी का दीया था। दरबार में मौजूद कुछ अमीर सामंत उसे देखकर हँसने लगे, कुछ ने मुँह बिचकाया। एक सामंत ने तंज़ कसा — "यह क्या मज़ाक है? राजा को इतना बेशक़ीमती उपहार देने के बाद यह मिट्टी का दीया?"
मोहन का चेहरा शर्म से लाल हो गया, पर उसने हिम्मत करके दीया राजा के सामने रख दिया और धीरे से बोला — "महाराज, मेरे पास आपको देने के लिए सोना-चाँदी तो नहीं है। यह दीया मैंने अपने हाथों से, कई दिनों की मेहनत से, पूरे दिल से बनाया है। यही मेरी सबसे अच्छी भेंट है।"
राजा ने दीया उठाया, उसे ग़ौर से देखा, उस पर की गई बारीक नक़्क़ाशी को छुआ, और फिर मुस्कुराते हुए मोहन की तरफ़ देखा। राजा ने पूछा — "बेटा, तुमने यह कितने दिनों में बनाया?"
मोहन ने जवाब दिया — "महाराज, पूरे सात दिन लगे। मैंने हर शाम इसे बनाने में पूरा मन लगाया।"
राजा ने पूरे दरबार की तरफ़ देखा और गंभीर आवाज़ में कहा — "आज तक जितने भी उपहार आए, वे सब बाज़ार से ख़रीदे गए थे — किसी की मेहनत नहीं, किसी की जान नहीं उनमें। पर यह दीया अलग है। इसमें एक ग़रीब बालक की सात दिनों की मेहनत है, उसका पसीना है, उसका पूरा दिल है। धन से ख़रीदी चीज़ किसी और की मेहनत का प्रमाण होती है, पर यह दीया इस बालक की अपनी मेहनत, अपनी लगन और अपने प्रेम का प्रमाण है।"
राजा ने वह दीया अपने सिंहासन के पास सबसे ऊँचे स्थान पर रखवा दिया और कहा — "आज से यह दीया मेरे महल की सबसे क़ीमती वस्तु है, क्योंकि इसकी क़ीमत सोने-चाँदी में नहीं आँकी जा सकती।"
राजा ने मोहन को अपने पास बुलाकर उसे सम्मानित किया, उसकी शिक्षा का प्रबंध करवाया, और कहा — "तुमने आज पूरे राज्य को सिखाया कि उपहार का असली मूल्य उसकी क़ीमत में नहीं, बल्कि उसमें लगे प्रेम और मेहनत में होता है।"
दरबार में मौजूद वे सामंत, जो कुछ देर पहले मोहन पर हँस रहे थे, अब शर्मिंदा होकर सिर झुकाए खड़े थे। उस दिन के बाद पूरे राज्य में यह क़िस्सा फैल गया, और लोग समझने लगे कि किसी को दिल से दिया गया छोटा-सा उपहार, महँगे से महँगे तोहफ़े से कहीं ज़्यादा क़ीमती हो सकता है।
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