लालची सियार और धनुष की डोरी — अत्यधिक लालच का अंत

एक जंगल में एक बहुत ही क्रूर और लालची शिकारी रहता था। एक दिन वह शिकार के लिए जंगल में निकला। थोड़ी दूर जाने पर उसने एक हिरण का शिकार किया और उसे अपने कंधे पर लादकर घर की ओर लौटने लगा।
रास्ते में उसे एक बहुत बड़ा और खूंखार 'जंगली सूअर' दिखाई दिया। शिकारी के मन में लालच आ गया। उसने हिरण को ज़मीन पर रखा और अपने धनुष पर बाण चढ़ाकर सूअर पर निशाना साध दिया।
तीर सीधे सूअर की छाती में जाकर लगा। सूअर दर्द से पागल हो गया, लेकिन मरने से पहले उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर शिकारी पर पलटवार किया। सूअर के नुकीले दांत शिकारी के पेट में घुस गए। उसी जगह पर शिकारी और सूअर, दोनों तड़प-तड़प कर मर गए। पास ही मरे हुए हिरण की भी लाश पड़ी थी।
सियार की दावत और लालच: कुछ देर बाद, वहाँ से 'दीर्घराव' नाम का एक सियार गुज़रा। जब उसने एक ही जगह पर तीन-तीन शिकार (शिकारी, सूअर और हिरण) मरे हुए देखे, तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
सियार ने सोचा: "वाह! आज तो मेरी किस्मत खुल गई। यहाँ इतना सारा मांस पड़ा है कि मैं महीनों तक आराम से बैठकर खा सकता हूँ। लेकिन मुझे इसे बहुत समझदारी से खाना होगा, ताकि यह जल्दी खत्म न हो।"
अत्यधिक लालच के कारण सियार ने तय किया कि वह आज स्वादिष्ट मांस नहीं खाएगा। उसने सोचा: "मांस तो मैं कल से खाना शुरू करूँगा। आज मैं केवल इस शिकारी के धनुष की डोरी खाकर अपना पेट भर लूँगा, जो जानवरों की सूखी नसों (तंत) से बनी है। कुछ भी बर्बाद नहीं होना चाहिए!"
धनुष का पलटवार: सियार उस धनुष के पास गया। धनुष की डोरी बहुत कसी हुई थी। सियार ने जैसे ही उस सूखी डोरी को अपने दांतों से काटना शुरू किया... खट्ट!
डोरी कटते ही, जो धनुष ज़ोर से मुड़ा हुआ था, वह भयंकर झटके के साथ सीधा हो गया! धनुष का एक नुकीला और सख्त सिरा सीधा उछलकर सियार की 'छाती' और 'गले' के आर-पार हो गया।
सियार दर्द से चीख पड़ा। उसने मांस का एक टुकड़ा भी नहीं खाया था, और अपने अत्यधिक लालच और कंजूसी के कारण वह वहीं तड़प-तड़प कर मर गया।
नीति / सीख: ज़रूरत से ज़्यादा लालच और कंजूसी हमेशा जानलेवा होती है। इंसान को कल की चिंता ज़रूर करनी चाहिए, लेकिन आज का आनंद छोड़कर केवल भविष्य के लिए चीज़ें बटोरने वाला हमेशा खाली हाथ ही मरता है।
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