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📜 पंचतंत्र

मूर्ख मित्र — बंदर और राजा की तलवार (चापलूसी का अंत)

पंचतंत्र — विश्नु शर्मा4 मिनट का पठन
मूर्ख मित्र — बंदर और राजा की तलवार (चापलूसी का अंत)

एक राजा था जिसे जानवरों को पालने का बहुत शौक था। उसने अपने महल में एक 'बंदर' पाल रखा था। वह बंदर राजा का सबसे प्रिय था। राजा ने उसे महल में कहीं भी जाने की आज़ादी दे रखी थी।

धीरे-धीरे राजा को उस बंदर पर इतना अंधा विश्वास हो गया कि उसने उस बंदर को अपना 'निजी अंगरक्षक' बना लिया। महल के सभी ज्ञानी मंत्री राजा को समझाते थे कि एक जानवर, विशेषकर चंचल बंदर को इतनी ज़िम्मेदारी देना खतरनाक हो सकता है, लेकिन राजा ने किसी की नहीं सुनी।

एक दिन दोपहर के समय, राजा अपने शयनकक्ष में सो रहा था। बंदर राजा के पास ही बैठकर एक पंखे से उसे हवा कर रहा था। राजा गहरी नींद में था।

मक्खी की ज़िद: तभी खिड़की से एक 'मक्खी' अंदर आई। मक्खी उड़ते-उड़ते राजा की 'छाती' पर जाकर बैठ गई।

बंदर ने अपने पंखे से उसे उड़ा दिया। मक्खी उड़कर वापस राजा के मुँह पर आ बैठी। बंदर ने उसे फिर उड़ाया, लेकिन मक्खी बार-बार वापस आकर राजा के चेहरे या गर्दन पर बैठ जाती।

बंदर को बहुत गुस्सा आ गया। उसने सोचा, "इस छोटी सी मक्खी की इतनी हिम्मत कि यह मेरे मालिक की नींद खराब कर रही है! आज मैं इसे ज़िंदा नहीं छोडूँगा।"

तलवार और मूर्खता: बंदर ने पंखा फेंक दिया। उसने मक्खी को मारने के लिए कुछ हथियार ढूंढा। उसकी नज़र राजा के बिस्तर के पास रखी राजा की 'तेज़ धार वाली तलवार' पर पड़ी।

बंदर ने वह भारी तलवार उठा ली।

मक्खी उड़कर वापस राजा की 'गर्दन' पर आकर बैठ गई। बंदर ने अपनी पूरी ताकत लगाई और उस मक्खी को मारने के लिए तलवार से एक ज़ोरदार वार किया!

मक्खी तो बहुत फुर्तीली थी, वह पलक झपकते ही तलवार की हवा से उड़ गई। परंतु वह तेज़ धार वाली तलवार सीधे राजा की 'गर्दन' पर जा लगी!

एक ही झटके में राजा की गर्दन धड़ से अलग हो गई और राजा की मौके पर ही मौत हो गई। वह मूर्ख बंदर अपनी वफादारी साबित करने के चक्कर में अपने ही मालिक का हत्यारा बन गया।

नीति / सीख: एक 'मूर्ख दोस्त' एक 'समझदार दुश्मन' से कहीं ज़्यादा खतरनाक होता है। मूर्ख व्यक्ति हमारी मदद करने के चक्कर में हमें ऐसा नुकसान पहुँचा सकता है, जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती।

🎉 कहानी समाप्त

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