लोमड़ी और बकरी — बिना सोचे-समझे छलांग और धोखा

एक जंगल में एक लोमड़ी रहती थी। एक दिन अंधेरे में चलते हुए उसका पैर फिसला और वह एक बहुत ही 'गहरे कुएं' में जा गिरी।
कुएं में पानी ज़्यादा नहीं था, इसलिए वह डूबी तो नहीं, लेकिन कुआं इतना गहरा था कि वह छलांग लगाकर बाहर भी नहीं आ सकती थी। लोमड़ी ने बाहर निकलने की बहुत कोशिश की, लेकिन सारी रात उसे उसी कुएं में बितानी पड़ी।
अगली सुबह, एक 'बकरी' पानी की तलाश में उस कुएं के पास से गुज़री। बकरी को बहुत प्यास लगी थी। उसने कुएं के अंदर झांका तो उसे वहां लोमड़ी दिखाई दी।
बकरी ने लोमड़ी से पूछा: "अरे लोमड़ी बहन! तुम वहां नीचे क्या कर रही हो? क्या कुएं का पानी मीठा है?"
लोमड़ी की चालाकी: लोमड़ी तो अपनी जान बचाने का मौका ही ढूंढ रही थी। उसने अपनी मीठी आवाज़ में झूठ बोलते हुए कहा: "अरे बकरी बहन! क्या बताऊँ, यह पानी इतना ठंडा और मीठा है कि मैं तो इसे पीते-पीते थक ही नहीं रही हूँ! जंगल में ऐसा मीठा पानी कहीं नहीं है। तुम भी जल्दी से नीचे आ जाओ और जी भरकर यह ठंडा पानी पी लो।"
बकरी बहुत भोली और प्यासी थी। उसने बिल्कुल भी 'दिमाग नहीं लगाया' कि अगर वह कुएं में कूद गई, तो वापस बाहर कैसे आएगी। मीठे पानी के लालच में उसने तुरंत कुएं के अंदर छलांग लगा दी!
स्वार्थ का धोखा: कुएं में गिरते ही बकरी ने जी भरकर पानी पिया। प्यास बुझने के बाद उसने लोमड़ी से कहा: "बहन, पानी तो सच में बहुत मीठा था। लेकिन अब हम इस गहरे कुएं से बाहर कैसे निकलेंगे?"
लोमड़ी ने मुस्कुराते हुए अपनी चालाकी दिखाई और कहा: "चिंता मत करो, मेरे पास एक योजना है। तुम अपने आगे के दोनों पैर कुएं की दीवार पर रखकर खड़ी हो जाओ। मैं तुम्हारी पीठ और सींगों पर पैर रखकर छलांग लगाऊंगी और बाहर निकल जाऊँगी। बाहर जाकर मैं तुम्हें भी खींच लूँगी।"
भोली बकरी ने लोमड़ी की बात मान ली। वह दीवार के सहारे खड़ी हो गई।
लोमड़ी तुरंत बकरी की पीठ पर चढ़ी, उसके सींगों पर पैर रखा और एक ज़ोरदार छलांग लगाकर कुएं से 'बाहर' आ गई।
बाहर आते ही लोमड़ी वहां से जाने लगी। बकरी ने घबराकर आवाज़ दी: "अरे लोमड़ी बहन! मुझे तो बाहर निकालो।"
लोमड़ी ने कुएं के मुहाने से झांकते हुए हंस कर कहा: "अरे मूर्ख बकरी! अगर तेरे दिमाग में दाढ़ी के बालों जितनी भी अक्ल होती, तो तू इस कुएं में कूदने से पहले बाहर निकलने का रास्ता ज़रूर सोचती! अब बैठी रह यहीं।" यह कहकर स्वार्थी लोमड़ी वहां से भाग गई और बेचारी बकरी उसी कुएं में तड़प-तड़प कर मर गई।
नीति / सीख: "बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताय।"। कोई भी नया काम करने या किसी की बातों में आने से पहले, उसके 'परिणामों' के बारे में अच्छी तरह से सोच-विचार कर लेना चाहिए।
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