मेंढक और सांप — प्राकृतिक शत्रु की सवारी और राजा का अंत

एक जंगल में एक बूढ़ा सांप रहता था, जिसका नाम 'मंदविष' था। बुढ़ापे के कारण वह अब मेंढकों का शिकार करने के लिए फुर्ती से दौड़ नहीं पाता था। वह कई दिनों से भूखा था।
भूख मिटाने के लिए उसने एक तरकीब सोची। वह एक ऐसे तालाब के किनारे जाकर चुपचाप उदास होकर बैठ गया, जहाँ बहुत सारे मेंढक रहते थे।
तालाब के किनारे एक सांप को शांति से बैठा देख, एक मेंढक ने दूर से पूछा: "अरे सांप! तुम हमारे दुश्मन हो। आज तुम हमें खाने के बजाय ऐसे उदास क्यों बैठे हो?"
सांप ने झूठे आंसू बहाते हुए कहा: "अरे भाई! कल रात मैंने गलती से एक ब्राह्मण के बेटे को डंस लिया था। उस ब्राह्मण ने मुझे श्राप दिया है कि अब से मैं खुद शिकार नहीं कर पाऊँगा। मुझे मेंढकों की गुलामी करनी पड़ेगी और उन्हें अपनी पीठ पर बैठाकर सवारी करवानी पड़ेगी। जो मेंढक अपनी मर्ज़ी से मेरे मुँह के पास आएगा, मैं केवल उसी को खा पाऊँगा।"
मेंढकों के राजा का घमंड: यह खबर तुरंत मेंढकों के राजा 'जालपाद' तक पहुँची। राजा जालपाद बहुत ही घमंडी था। उसने सोचा: "वाह! मेरा जन्मजात दुश्मन, एक सांप, मेरी सवारी बनेगा? इससे बड़ी शान की बात और क्या होगी!"
राजा जालपाद अपने मंत्रियों के साथ बाहर आया और सांप की पीठ पर चढ़कर बैठ गया। सांप ने उन्हें बड़ी शांति से तालाब के किनारे की सैर कराई। मेंढकों का राजा बहुत खुश हुआ। उसने अपने सभी मेंढकों को आदेश दिया कि वे बारी-बारी से सांप की सवारी करें।
सांप की चाल: अगले दिन सांप जानबूझकर बहुत 'धीरे-धीरे' रेंगने लगा। राजा जालपाद ने पूछा: "क्या बात है? आज तुम इतनी धीरे क्यों चल रहे हो?"
सांप ने कहा: "महाराज! मैं कई दिनों से भूखा हूँ। ब्राह्मण के श्राप के अनुसार, जब तक आप अपनी मर्ज़ी से मुझे कोई छोटा मेंढक खाने को नहीं देंगे, तब तक मुझमें सवारी करवाने की ताकत नहीं आएगी।"
घमंडी राजा जालपाद को अपनी शान की इतनी फिक्र थी कि उसने तुरंत कहा: "ठीक है, तुम रोज़ मेरे सेवकों में से कुछ छोटे मेंढकों को खा लिया करो, ताकि तुम मुझे तेज़ सवारी करवा सको।"
बस, सांप को तो यही चाहिए था! अब सांप रोज़ राजा जालपाद और बड़े मेंढकों को पीठ पर बिठाता, और अपनी भूख मिटाने के लिए तालाब के छोटे-छोटे मेंढकों को आराम से खाने लगा।
कुछ ही दिनों में तालाब के सारे छोटे मेंढक और मंत्री खत्म हो गए।
एक दिन जब तालाब में कोई और मेंढक नहीं बचा, तो सांप अपनी पीठ पर बैठे राजा जालपाद की ओर मुड़ा और मुस्कुराते हुए बोला: "महाराज! आज मेरे खाने के लिए कोई नहीं बचा है, इसलिए अब आपकी बारी है!"
इससे पहले कि राजा जालपाद कुछ समझ पाता या भाग पाता, सांप ने एक ही झपट्टे में उस मूर्ख और घमंडी राजा को निगल लिया।
नीति / सीख: अपने 'प्राकृतिक शत्रु' की मीठी बातों पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए। जो इंसान अपने अहंकार या शान के लिए अपने ही लोगों की बलि चढ़ाता है, उसका अपना अंत भी बहुत भयानक होता है।
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