संगीतकार गधा — बेवकूफी का राग और डंडों की ताल

एक गाँव में 'उद्धत' नाम का एक गधा रहता था। वह दिन भर अपने मालिक का बोझा ढोता और रात को खुला छूटने पर गाँव के खेतों में घुसकर फसलें चरता था।
उसी गाँव में एक 'सियार' भी रहता था। गधे और सियार में गहरी दोस्ती हो गई। दोनों रोज़ रात को एक साथ खेतों में जाते। गधा पेट भर कर खीरे और ककड़ी खाता, और सियार आस-पास के मुर्गियों के दरबे से अपना भोजन ढूंढ लेता।
एक रात, दोनों एक बहुत बड़े और सुंदर खीरे के खेत में पहुँचे। खेत में चाँदनी फैली हुई थी और खीरे बहुत रसीले थे। गधे ने खूब छक कर खीरे खाए। उसका पेट पूरा भर गया।
गधे का 'संगीतमय' मिज़ाज: पेट भरने के बाद गधे का मिज़ाज आशिकाना हो गया। उसने चाँद को देखते हुए सियार से कहा: "मित्र! देखो, रात कितनी सुहानी है, चाँद कितना सुंदर है और ठंडी हवा चल रही है। ऐसे सुहावने मौसम में मेरा 'गाना गाने' का बहुत मन कर रहा है!"
सियार यह सुनकर घबरा गया। उसने कहा: "अरे मूर्ख दोस्त! तू पागल हो गया है क्या? हम यहाँ चोरी से खेत में घुसे हैं। अगर तूने गाना गाया (रेंकना शुरू किया), तो किसान जाग जाएंगे और हमारी हड्डी-पसली एक कर देंगे। चुपचाप अपना मुँह बंद रख।"
परंतु गधे को अपनी आवाज़ पर बहुत घमंड था। उसने चिढ़कर कहा: "तू तो बस एक जंगली सियार है, तू 'संगीत कला' के बारे में क्या जाने? मैं आज एक बहुत ही सुरीला राग गाकर सुनाऊँगा।"
सियार की समझदारी और गधे की पिटाई: सियार समझ गया कि गधा नहीं मानेगा और अब यहाँ पिटना तय है।
सियार ने तुरंत कहा: "ठीक है मित्र, तुम ज़रूर गाना गाओ। लेकिन मुझे खेत के बाहर जाकर देखने दो कि कहीं कोई किसान तो नहीं आ रहा। मैं बाहर खड़ा होकर तुम्हारा सुरीला संगीत सुनूँगा।"
सियार खेत के बाहर जाकर झाड़ियों में छिप गया।
गधे ने आँखें बंद कीं, सिर ऊपर उठाया और अपनी बेसुरी और कर्कश आवाज़ में ज़ोर-ज़ोर से रेंकना शुरू कर दिया— "ढेंचू! ढेंचू! ढेंचू!"
गधे की भयानक आवाज़ सुनकर खेत के रखवाले और किसान तुरंत जाग गए। वे लाठियां लेकर खेत में दौड़े। उन्होंने देखा कि एक गधा खेत के बीचों-बीच खड़ा होकर उनकी फसलें खराब कर रहा है और रेंक रहा है।
किसानों ने गधे को चारों तरफ से घेर लिया और लाठियों से उसकी इतनी भयंकर पिटाई की कि गधे का सारा 'संगीत' निकल गया। पीट-पीट कर उन्होंने गधे के गले में एक भारी पत्थर बांध दिया और उसे खेत से भगा दिया।
खेत के बाहर खड़ा सियार यह सब देखकर मन ही मन सोच रहा था, "मैंने तो पहले ही मना किया था, लेकिन बेवकूफों को समझाना पत्थर पर सिर मारना है।"
नीति / सीख: हर काम का एक सही 'समय और स्थान' होता है। जो मूर्ख व्यक्ति समय और स्थिति को समझे बिना अपनी ज़िद पर अड़ा रहता है, उसका परिणाम हमेशा डंडों (नुकसान) से ही होता है।
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