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📜 पंचतंत्र

शहर का चूहा और गांव का चूहा — सादा जीवन और सच्ची शांति

पंचतंत्र — विश्नु शर्मा4 मिनट का पठन
शहर का चूहा और गांव का चूहा — सादा जीवन और सच्ची शांति

दो चूहे थे जो आपस में पक्के दोस्त (या चचेरे भाई) थे। एक चूहा एक शांत 'गांव' में रहता था और दूसरा एक बड़े 'शहर' के एक बहुत अमीर घर में रहता था।

एक दिन शहर वाले चूहे ने सोचा कि चलो अपने गांव वाले दोस्त से मिलकर आते हैं। वह गांव पहुँचा। गांव वाले चूहे ने अपने दोस्त का बहुत खुशी से स्वागत किया।

उसने शहर के चूहे को खाने के लिए अपना सबसे बेहतरीन भोजन परोसा— ताज़े गेहूं के दाने, सूखी जड़ें और कुछ मटर।

गांव की दावत और शहर का घमंड: शहर वाले चूहे ने मुँह बनाते हुए उन सूखे दानों को थोड़ा सा चखा और फिर कहा: "मित्र! तुम इस वीरान गांव में यह रूखा-सूखा और बेस्वाद खाना कैसे खा लेते हो? तुम्हारी ज़िंदगी तो बहुत उबाऊ है। तुम मेरे साथ 'शहर' चलो। वहाँ मैं तुम्हें दिखाऊंगा कि असली और ऐशो-आराम की ज़िंदगी क्या होती है!"

गांव वाला चूहा शहर की आलीशान दावत की बात सुनकर ललचा गया और वह अपने दोस्त के साथ शहर चला गया।

शहर की आलीशान दावत: रात के समय दोनों एक बहुत बड़े और शानदार घर के डाइनिंग रूम में पहुँचे। मेज़ पर इंसानों की छोड़ी हुई दावत पड़ी थी— मीठे केक, पनीर, किशमिश और ताज़ा मक्खन।

गांव वाले चूहे ने अपनी ज़िंदगी में कभी इतना स्वादिष्ट भोजन नहीं देखा था। उसने खुशी से पनीर का एक बड़ा टुकड़ा उठाया और खाने ही वाला था कि...

भों-भों! अचानक घर के दो बड़े और खूंखार 'कुत्ते' कमरे में घुस आए!

शहर वाले चूहे ने चिल्लाकर कहा: "भागो मित्र! वरना ये हमें कच्चा चबा जाएंगे!" दोनों चूहे अपनी जान बचाने के लिए एक छोटे से बिल में घुस गए। गांव वाले चूहे का दिल डर के मारे ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

मौत का डर: कुछ देर बाद जब कुत्ते चले गए, तो शहर वाले चूहे ने कहा: "चलो मित्र, अब खतरा टल गया है, हम अपना केक खाते हैं।"

वे दोनों फिर से मेज़ पर आए। अभी उन्होंने केक का एक निवाला लिया ही था कि तभी एक भयानक 'बिल्ली' ने उन पर छलांग लगा दी! दोनों चूहों ने फिर से भागकर मुश्किल से अपनी जान बचाई।

पूरी रात यही चलता रहा। कभी इंसान का जूता पड़ता, तो कभी बिल्ली का पंजा। गांव वाला चूहा एक भी निवाला शांति से नहीं खा सका।

सुबह होते ही गांव वाले चूहे ने अपने दोस्त से हाथ जोड़कर कहा: "मित्र! तुम्हारा शहर और तुम्हारे ये पनीर-केक तुम्हें ही मुबारक हों! मैं तो वापस अपने गांव जा रहा हूँ। तुम्हारी इस अमीर दावत में 'हर पल मौत का डर' छिपा है।"

नीति / सीख: डर और खतरे के साये में मिलने वाले ऐशो-आराम से कहीं बेहतर वह सादा और साधारण जीवन है, जहाँ 'सुरक्षा और शांति' हो। चैन की सूखी रोटी, खौफ के पकवानों से हमेशा मीठी होती है।

🎉 कहानी समाप्त

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