शेर, चूहा और बिल्ली — ज़रूरत का खेल और अहमियत

एक जंगल में एक बहुत बड़ी गुफा थी, जिसमें 'खरनखर' नाम का एक खूंखार शेर रहता था। उसी गुफा के एक गहरे बिल में एक छोटा सा चूहा भी रहता था।
जब शेर दिन भर शिकार करके थक-हार कर गुफा में सोता, तो वह चूहा बिल से बाहर आता और मज़े से शेर के बालों को कुतरने लगता।
जब शेर की नींद खुलती, तो वह देखता कि उसके बाल कटे हुए हैं। शेर को बहुत गुस्सा आता, वह दहाड़ता और चूहे को पकड़ने की कोशिश करता। परंतु चूहा इतना छोटा और फुर्तीला था कि वह तुरंत बिल में घुस जाता। शेर के बड़े-बड़े पंजे उस छोटे से बिल में नहीं जा सकते थे। शेर बहुत परेशान हो गया।
शेर की चालाकी और बिल्ली की नौकरी: शेर ने एक तरकीब सोची। वह गांव की तरफ गया और वहाँ से 'दधिकर्ण' नाम की एक जंगली 'बिल्ली' को पकड़ कर ले आया। शेर ने बिल्ली से कहा: "तुझे मुझे रोज़ इस चूहे से बचाना है। जब तक तू यहाँ है, मैं तुझे रोज़ ताज़ा मांस खिलाऊंगा।"
बिल्ली गुफा में रहने लगी। बिल्ली की गंध और डर के मारे चूहे ने अपने बिल से बाहर निकलना बिल्कुल बंद कर दिया। शेर अब आराम से गहरी नींद सोता था।
चूँकि चूहा बाहर नहीं आता था, इसलिए शेर बिल्ली से बहुत खुश था। वह रोज़ बिल्ली को अपने शिकार का सबसे बेहतरीन मांस लाकर खिलाता। बिल्ली बिना कुछ किए बहुत मोटी-ताज़ी हो गई।
चूहे का अंत और बिल्ली की दुर्दशा: कई दिन बीत गए। बिल के अंदर बैठे-बैठे चूहा भूख से तड़पने लगा। एक दिन चूहे से रहा नहीं गया। उसने सोचा, "शायद बिल्ली सो रही होगी।" वह धीरे से बिल के बाहर निकला।
परंतु बिल्ली तो ताक में ही बैठी थी। जैसे ही चूहा बाहर आया, बिल्ली ने एक झपट्टे में उसे पकड़ लिया और मार डाला।
जब शेर वापस आया, तो बिल्ली ने गर्व से मरे हुए चूहे को दिखाया। बिल्ली ने सोचा कि अब शेर उसे और भी ज़्यादा इनाम देगा।
परंतु हुआ इसका बिल्कुल उल्टा! शेर ने देखा कि जो 'समस्या' (चूहा) उसकी नींद खराब कर रही थी, वह अब हमेशा के लिए खत्म हो गई है। इसका मतलब, अब उसे बिल्ली की कोई ज़रूरत नहीं थी।
शेर ने अगले ही दिन से बिल्ली को मांस देना बंद कर दिया! बिल्ली भूख से तड़पने लगी। जब उसने शेर से खाना मांगा, तो शेर ने दहाड़ कर कहा: "अब तेरा यहाँ कोई काम नहीं है, भाग जा यहाँ से!" बेचारी बिल्ली भूख के मारे सूख कर कांटा हो गई और उसे अपनी जान बचाकर वहाँ से भागना पड़ा।
नीति / सीख: संसार में किसी भी इंसान की अहमियत और सम्मान केवल तब तक है, जब तक उसकी 'ज़रूरत' है। जब किसी का काम पूरी तरह से खत्म हो जाता है, तो लोग अक्सर उसकी कद्र करना भी छोड़ देते हैं।
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