आधी इनाम का हिस्सेदार — दरबान का लालच और कोड़ों की सज़ा

यह उस समय की बात है जब तेनालीरामा अभी महाराज कृष्णदेवराय के दरबार में शामिल नहीं हुए थे। तेनालीरामा एक साधारण युवक थे, परंतु अपनी बुद्धिमत्ता को लेकर बहुत आश्वस्त थे। वे अपनी किस्मत आजमाने और महाराज को अपनी अक्ल का जौहर दिखाने के लिए विजयनगर की राजधानी पहुँचे।
जब तेनालीरामा राजमहल के मुख्य द्वार पर पहुँचे, तो वहां खड़े शाही दरबान ने उन्हें रोक लिया। दरबान ने तेनाली के साधारण कपड़े देखकर ताना मारा: "कहाँ जा रहे हो? महाराज के पास ऐसे ही किसी ऐरे-गैरे को जाने की इजाज़त नहीं है।"
तेनालीरामा ने कहा, "मुझे महाराज को अपनी एक कविता सुनानी है। मुझे यकीन है कि महाराज मेरी कविता सुनकर बहुत खुश होंगे और मुझे भारी इनाम देंगे।"
दरबान का लालच: 'इनाम' का नाम सुनते ही लालची दरबान की आंखें चमक उठीं। उसने एक चालाकी भरी शर्त रखी: "मैं तुम्हें अंदर तभी जाने दूँगा, जब तुम मुझसे एक वादा करो। महाराज तुम्हारी कविता सुनकर तुम्हें जो भी 'इनाम' देंगे, उसका ठीक आधा (50%) हिस्सा तुम्हें बाहर आकर मुझे देना होगा। मंज़ूर है?"
तेनालीरामा दरबान की इस घूसखोरी को समझ गए। उन्होंने मुस्कुराकर हामी भर दी— "मुझे मंज़ूर है! मुझे जो भी मिलेगा, उसका आधा हिस्सा तुम्हारा।"
राजदरबार में तेनाली का जादू: तेनालीरामा अंदर गए। उन्होंने महाराज कृष्णदेवराय के सामने अपनी ऐसी हास्यपूर्ण और बुद्धिमानी से भरी कविताएं और बातें पेश कीं, कि महाराज हंसते-हंसते लोटपोट हो गए।
महाराज अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा: "युवक! तुम्हारी बातों ने आज मेरा दिल खुश कर दिया है। मांगो, तुम इनाम में क्या चाहते हो? सोने के सिक्के, आभूषण या ज़मीन? तुम जो मांगोगे, तुम्हें मिलेगा।"
तेनालीरामा ने हाथ जोड़कर और अत्यंत विनम्रता से कहा: "महाराज! यदि आप सचमुच मेरी कला से प्रसन्न हैं, तो मुझे किसी धन-दौलत की आवश्यकता नहीं है। मेरी बस एक छोटी सी इच्छा है कि मुझे इनाम में मेरी नंगी पीठ पर 100 कोड़े मारे जाएं!"
महाराज की हैरानी और दरबान की सज़ा: यह अजीबोगरीब मांग सुनकर पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। महाराज ने हैरानी से पूछा, "क्या तुम पागल हो गए हो? कोई इनाम में कोड़े क्यों खाना चाहेगा?" परंतु तेनालीरामा अपनी ज़िद पर अड़े रहे। हार मानकर महाराज ने जल्लाद को बुलाया और 100 कोड़े मारने का हुक्म दिया।
जल्लाद ने जैसे ही पहला कोड़ा मारने के लिए हाथ उठाया, तेनालीरामा ने तुरंत कहा: "रुकिए महाराज! यह इनाम मैं अकेले नहीं ले सकता। बाहर द्वार पर खड़े आपके मुख्य दरबान ने मुझसे वादा लिया था कि मुझे मिलने वाले इनाम का 'आधा हिस्सा' मैं उसे दूँगा। चूँकि मैं वादे का पक्का हूँ, इसलिए कृपया उसे बुलाइए और मेरे इनाम के 50 कोड़े पहले उसे लगाइए!"
यह सुनते ही महाराज को सारी बात समझ में आ गई। उनका क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया कि उनका दरबान महल के दरवाज़े पर आने वाले गुणी लोगों से घूस मांगता है।
उन्होंने तुरंत उस लालची दरबान को अंदर बुलवाया। जब दरबान ने सुना कि इनाम में 'कोड़े' मिले हैं और उसे 50 कोड़े खाने पड़ेंगे, तो वह रोते हुए महाराज के पैरों में गिर पड़ा।
महाराज ने दरबान को पूरे 100 कोड़े लगवाए और उसे नौकरी से निकाल दिया। तेनालीरामा की इस अद्भुत सूझबूझ और अन्याय के खिलाफ उनकी आवाज़ से महाराज इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तेनाली को भारी धन देकर अपने राजदरबार के 'अष्टदिग्गजों' (आठ विशेष विद्वानों) में शामिल कर लिया।
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