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🎭 तेनाली राम

तेनालीरामा और बिल्लियों की भूख — चूहों का आतंक और उबलता हुआ दूध

लोक परंपरा — तेनालीराम5 मिनट का पठन
तेनालीरामा और बिल्लियों की भूख — चूहों का आतंक और उबलता हुआ दूध

एक बार विजयनगर साम्राज्य में चूहों का भारी आतंक फैल गया। चूहे खेतों में अनाज बर्बाद कर रहे थे, घरों में कपड़े कुतर रहे थे और यहाँ तक कि शाही पुस्तकालय के कीमती ग्रंथ भी खा रहे थे। चूहों को पकड़ना मुश्किल हो रहा था।

इस समस्या का समाधान निकालने के लिए महाराजा कृष्णदेवराय ने एक अनोखी योजना बनाई। उन्होंने घोषणा की कि विजयनगर के हर परिवार को शाही खज़ाने से एक बिल्ली और एक गाय दी जाएगी। राजा का विचार था कि लोग गाय का पौष्टिक दूध बिल्ली को पिलाएंगे, जिससे बिल्ली ताकतवर होगी और सारे चूहों को खा जाएगी।

तेनालीरामा को भी एक बिल्ली और एक गाय मिली। लेकिन तेनालीरामा की सोच हमेशा दूसरों से अलग होती थी।

तेनालीरामा का अनोखा प्रयोग: पहले दिन, तेनालीरामा ने गाय का दूध दुहा और उसे चूल्हे पर उबलने के लिए रख दिया। जब दूध खौलने लगा और बिल्कुल गर्म हो गया, तो तेनालीरामा ने वह खौलता हुआ दूध एक कटोरे में डाला और भूखी बिल्ली के सामने रख दिया।

बिल्ली बहुत भूखी थी। उसने बिना सोचे-समझे जैसे ही उस दूध के कटोरे में अपनी जीभ डाली, उसकी जीभ बुरी तरह जल गई! बिल्ली दर्द से म्याऊं-म्याऊं करती हुई वहाँ से भाग गई।

उस दिन के बाद से, उस बिल्ली के मन में 'सफेद दूध' का ऐसा खौफ बैठ गया कि वह दूध की तरफ देखती भी नहीं थी। अब तेनालीरामा रोज़ गाय का ताज़ा दूध खुद पीते और हट्टे-कट्टे होने लगे। उधर, दूध न मिलने के कारण भूखी बिल्ली ने ज़िंदा रहने के लिए घर के सारे चूहे पकड़-पकड़ कर खा लिए!

राजा का निरीक्षण और क्रोध: कुछ महीनों बाद, महाराज ने बिल्लियों का निरीक्षण करने का फैसला किया। सभी लोग अपनी-अपनी बिल्लियां लेकर दरबार में आए।

महाराज ने देखा कि बाकी सभी लोगों की बिल्लियां दूध पी-पीकर बहुत मोटी और आलसी हो गई थीं। वे इतनी भारी हो गई थीं कि उनसे चूहे पकड़े ही नहीं जाते थे। परंतु जब महाराज की नज़र तेनालीरामा की बिल्ली पर पड़ी, तो वह बिल्कुल दुबली-पतली और कमज़ोर लग रही थी।

महाराज को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा: "तेनालीरामा! तुम्हारी बिल्ली इतनी कमज़ोर क्यों है? क्या तुमने इसे गाय का दूध नहीं पिलाया?"

तेनालीरामा ने हाथ जोड़कर मासूमियत से कहा: "महाराज! मैं क्या करूँ? मेरी बिल्ली तो दूध पीती ही नहीं है! उसे दूध से नफरत है।"

सच की परीक्षा और महाराज की समझ: महाराज को इस बात पर बिल्कुल यकीन नहीं हुआ कि कोई बिल्ली दूध पीने से मना कर सकती है। उन्होंने तुरंत एक सेवक को आदेश दिया कि वह एक कटोरे में ठंडा और मीठा दूध लेकर आए।

सेवक ने दूध का कटोरा तेनालीरामा की बिल्ली के सामने रखा। बिल्ली ने जैसे ही उस 'सफेद चीज़' (दूध) को देखा, उसे अपनी जली हुई जीभ याद आ गई। वह दूध पीने के बजाय खौफ से पीछे हटी और दुम दबाकर वहां से भाग खड़ी हुई!

पूरा दरबार यह देखकर सन्न रह गया। तब तेनालीरामा ने मुस्कुराते हुए महाराज से कहा: "महाराज! जो बिल्ली मुफ्त का स्वादिष्ट दूध पीकर मोटी और आलसी हो जाएगी, वह चूहों के पीछे क्यों भागेगी? मेरी बिल्ली ने दूध नहीं पिया, इसीलिए अपनी भूख मिटाने के लिए उसने मेरे घर के सारे चूहे सफाचट कर दिए। असल में, चूहों का इलाज दूध नहीं, बल्कि 'बिल्ली की भूख' है!"

महाराज कृष्णदेवराय तेनालीरामा की इस गहरी और व्यावहारिक सोच पर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। उन्होंने मान लिया कि मुफ्त की सुविधाएं अक्सर इंसान (या जानवर) को आलसी बना देती हैं।

🎉 कहानी समाप्त

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