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🎭 तेनाली राम

सोने के आम — पंडितों का लालच और तेनाली का अचूक इलाज

लोक परंपरा — तेनालीराम5 मिनट का पठन
सोने के आम — पंडितों का लालच और तेनाली का अचूक इलाज

विजयनगर के महाराजा कृष्णदेवराय अपनी माता से बहुत प्रेम करते थे। एक बार उनकी माता बहुत बीमार पड़ गईं। जब उनका अंतिम समय निकट आया, तो उन्होंने महाराज से एक इच्छा ज़ाहिर की— "पुत्र, मेरी इच्छा है कि मैं एक बार मीठे और रसीले आम खाऊँ।"

महाराज ने तुरंत सेवकों को आम लाने दौड़ाया, परंतु जब तक आम लाए गए, राजमाता का देहांत हो चुका था। अपनी माँ की अंतिम इच्छा पूरी न कर पाने के कारण महाराज गहरे शोक और अपराधबोध में डूब गए।

शांति पाने के लिए महाराज ने राज्य के बड़े-बड़े पंडितों और पुजारियों को बुलाया और उनसे सलाह मांगी।

लालची पंडितों ने महाराज की भावुकता का फायदा उठाते हुए कहा: "महाराज! जब तक राजमाता की अंतिम इच्छा पूरी नहीं होती, उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। इसका एक ही उपाय है— आप राजमाता की पुण्यतिथि पर 108 पंडितों को बुलाकर उन्हें 'शुद्ध सोने के बने 108 आम' दान में दें। इससे उनकी आत्मा तृप्त हो जाएगी।"

महाराज ने तुरंत राजकोष से सोने के आम बनवाने का आदेश दे दिया।

तेनालीरामा की योजना: जब यह बात तेनालीरामा को पता चली, तो वह समझ गए कि यह पंडितों का सरासर लालच है और वे महाराज की भावनाओं से खेल रहे हैं। तेनालीरामा ने पंडितों को सबक सिखाने की ठान ली।

सोने के आम दान करने के कुछ दिन बाद, तेनालीरामा ने उन्हीं 108 पंडितों को अपने घर अपनी माता की पुण्यतिथि के भोज पर आमंत्रित किया।

पंडित बहुत खुश हुए। उन्होंने सोचा कि महाराज की तरह तेनालीरामा भी कोई कीमती दान देगा। सभी पंडित खुशी-खुशी तेनालीरामा के घर पहुँच गए।

गरम लोहे का दान: जब भोज समाप्त हो गया, तो तेनालीरामा ने अपने सेवकों को आवाज़ दी। सेवक कोई दान-दक्षिणा या मोहरें लाने के बजाय, आग में दहकती हुई गर्म लोहे की सलाखें लेकर आ गए!

पंडित घबरा गए। उन्होंने पूछा, "तेनालीरामा! तुम इन गर्म सलाखों से क्या करने वाले हो? हमारा दान कहाँ है?"

तेनालीरामा ने अत्यंत भावुक होने का नाटक करते हुए और हाथ जोड़कर विनम्रता से कहा: "पंडित जी! मेरी माता जी को जीवन के अंतिम दिनों में जोड़ों का भयंकर दर्द (गठिया) था। उनकी अंतिम इच्छा थी कि कोई उनके घुटनों को गर्म लोहे की सलाख से सेंक दे, ताकि उनका दर्द कम हो। परंतु इससे पहले कि मैं सलाख गर्म कर पाता, उनका देहांत हो गया।"

तेनालीरामा ने सलाखें उठाते हुए आगे कहा: "आप लोगों ने ही तो महाराज को बताया था कि माता की अंतिम इच्छा पूरी न हो, तो आत्मा भटकती है। मेरी माता की आत्मा भी भटक रही है। इसलिए, मैं आप सभी 108 पंडितों के घुटनों पर यह गर्म लोहे की सलाख दागना चाहता हूँ, ताकि मेरी माता की अंतिम इच्छा पूरी हो सके और उन्हें शांति मिले। कृपया आप आगे आएं!"

पंडितों का भागना और सच का सामना: यह सुनते ही पंडितों के होश उड़ गए। सबसे मुख्य पंडित ने डरते हुए कहा, "अरे तेनाली! क्या तुम पागल हो गए हो? हमारे घुटने दागने से तुम्हारी माता की इच्छा कैसे पूरी होगी?"

तेनालीरामा ने तुरंत गंभीर होकर जवाब दिया: "पंडित जी, जब आपके सोने के आम खाने से स्वर्ग में बैठी राजमाता को आम का स्वाद मिल सकता है, तो फिर आपके घुटने दागने से मेरी माता के घुटनों का दर्द भी ज़रूर दूर हो जाएगा! दोनों नियम तो एक ही हैं।"

पंडितों का लालच उनके ही गले पड़ गया था। वे समझ गए कि तेनाली ने उनकी पोल खोल दी है। उन्होंने तुरंत महाराज के दान किए हुए सारे सोने के आम वापस लौटा दिए और तेनालीरामा से माफ़ी मांग कर वहां से भाग खड़े हुए।

🎉 कहानी समाप्त

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