मातृभाषा की पहचान — महाविद्वान की हार और इंसानी फितरत

विजयनगर साम्राज्य की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी, और इसी कारण दुनिया भर के विद्वान वहाँ अपनी विद्या का प्रदर्शन करने आते थे। एक दिन महाराज कृष्णदेवराय के दरबार में एक बहुत ही प्रसिद्ध और घमंडी विद्वान आया।
उस विद्वान की खासियत यह थी कि वह भारत की लगभग सभी भाषाएं (संस्कृत, हिंदी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, ओड़िया, आदि) बिल्कुल स्पष्ट और बिना किसी उच्चारण दोष के बोल सकता था। जब वह तमिल बोलता, तो लगता कि वह तमिलनाडु का रहने वाला है, और जब संस्कृत बोलता तो किसी महान ऋषि जैसा प्रतीत होता।
विद्वान की चुनौती: विद्वान ने दरबार में एक-एक करके कई भाषाओं में धाराप्रवाह भाषण दिया। सभी दरबारी उसकी विद्या देखकर दंग रह गए।
भाषण समाप्त होने के बाद, विद्वान ने सीना तानकर एक चुनौती रखी: "महाराज! मैंने सुना है कि आपके अष्टदिग्गज बहुत चतुर हैं। मेरी चुनौती यह है कि आपके दरबारी मेरी बातचीत और मेरे उच्चारण को सुनकर यह बताएँ कि मेरी 'मातृभाषा' कौन सी है? यदि कोई न बता सका, तो विजयनगर साम्राज्य को मेरी श्रेष्ठता स्वीकार करनी होगी।"
महाराज ने अपने सभी दरबारियों को इशारा किया। एक-एक करके सभी विद्वान आगे आए और उस बहुभाषी विद्वान से बात करने लगे। परंतु वह इतना चतुर था कि जिस भाषा में उससे सवाल पूछा जाता, वह उसी भाषा में इतनी सहजता से जवाब देता कि उसकी असली मातृभाषा का कोई सुराग ही नहीं मिलता। हार मानकर सभी दरबारियों ने सिर झुका लिया।
विद्वान अहंकार से मुस्कुराने लगा। तब महाराज ने अपनी आखिरी उम्मीद, तेनालीरामा की ओर देखा। तेनालीरामा ने उठकर कहा, "विद्वान महोदय! मुझे बस आज रात तक का समय चाहिए। कल सुबह मैं दरबार में आपकी मातृभाषा का नाम बता दूँगा।"
आधी रात का हमला: उस रात विद्वान को शाही अतिथि गृह में ठहराया गया। जब आधी रात हो गई और विद्वान गहरी नींद में खर्राटे ले रहा था, तब तेनालीरामा एक कंबल ओढ़कर चुपके से उसके कमरे में घुसे।
तेनालीरामा के हाथ में एक सूखा हुआ कांटा था। उन्होंने वह कांटा गहरी नींद में सो रहे उस विद्वान के पैर में ज़ोर से चुभा दिया!
अचानक हुए इस दर्द से विद्वान झटके से नींद से जागा। वह दर्द से बिलबिला उठा और घबराहट में उसके मुँह से ज़ोर से निकला: "अम्मा! एवरु अक्कड़ा?" (तेलुगु भाषा में: "माँ! कौन है वहाँ?")
अंधेरे का फायदा उठाकर तेनालीरामा चुपचाप वहाँ से खिसक गए।
दरबार में रहस्य का पर्दाफाश: अगली सुबह दरबार लगा। विद्वान पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़ा था।
तेनालीरामा अपनी जगह से उठे और उन्होंने महाराज से कहा: "महाराज! इस महाविद्वान की असली मातृभाषा 'तेलुगु' है!"
यह सुनते ही विद्वान का चेहरा पीला पड़ गया। उसका सारा अहंकार टूट गया। उसने हैरान होकर पूछा, "परंतु... तुम्हें यह कैसे पता चला? मैंने तो तुम्हारे सामने तेलुगु में कोई बात ही नहीं की थी।"
तेनालीरामा ने मुस्कुराते हुए बीती रात की घटना दरबार को सुनाई और एक बहुत ही गहरा मनोवैज्ञानिक सच सबके सामने रखा: "महाराज! इंसान चाहे दुनिया की कितनी भी भाषाएं सीख ले, वह उनमें कितनी भी महारत हासिल कर ले... परंतु जब वह किसी अचानक आए दर्द, गहरे खौफ, या भयंकर संकट में होता है, तो उसके दिमाग से सारी सीखी हुई विद्या गायब हो जाती है। उस बेबसी के पल में इंसान के मुँह से केवल वही भाषा निकलती है, जो उसने अपनी माँ की गोद में सीखी होती है—उसकी मातृभाषा!"
यह अचूक तर्क सुनकर पूरा दरबार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। विद्वान ने अपनी हार स्वीकार की और तेनालीरामा की बुद्धिमत्ता के आगे नतमस्तक होकर वहाँ से चला गया।
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