राजा की पेंटिंग — तस्वीर का दूसरा पहलू और तेनाली की 'अमूर्त' कला

महाराजा कृष्णदेवराय को कला और चित्रकारी का बहुत शौक था। वे अक्सर देश-विदेश के चित्रकारों को अपने दरबार में बुलाते थे और उनकी कलाकृतियों को भारी इनाम देते थे।
एक दिन दरबार में एक बहुत ही प्रसिद्ध चित्रकार आया। उसने महाराज को एक अत्यंत सुंदर 'घोड़े' की पेंटिंग दिखाई। उस पेंटिंग में घोड़ा बिल्कुल असली और सजीव लग रहा था।
महाराज पेंटिंग देखकर मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने खुश होकर कहा: "वाह! क्या बात है। ऐसा लगता है जैसे यह घोड़ा अभी कैनवास से बाहर निकल कर दौड़ने लगेगा। यह एक अद्भुत कलाकृति है!" सभी दरबारियों ने भी राजा की हाँ में हाँ मिलाई और चित्रकार की खूब तारीफ की।
तेनालीरामा का व्यंग्य और चुनौती: परंतु तेनालीरामा अपनी जगह पर शांत बैठे थे। जब महाराज ने उनसे पूछा कि उन्हें पेंटिंग कैसी लगी, तो तेनालीरामा ने उस पेंटिंग को ध्यान से देखा और कहा: "क्षमा करें महाराज, परंतु मुझे तो यह चित्र बिल्कुल अधूरा और अजीब लग रहा है। इस घोड़े का तो केवल एक ही हिस्सा दिख रहा है। इसका दूसरा हिस्सा, इसकी दूसरी आंख और पेट का दूसरा हिस्सा तो इसमें है ही नहीं! यह कैसा घोड़ा है?"
महाराज को तेनालीरामा की यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई। उन्होंने चिढ़कर कहा: "तेनालीरामा! तुम कला के बारे में कुछ नहीं जानते। चित्रकला में हर चीज़ नहीं दिखाई जाती, कुछ चीज़ें देखने वाले को अपनी 'कल्पना' से सोचनी पड़ती हैं।"
तेनालीरामा मुस्कुराए और बोले, "यदि सब कुछ कल्पना ही करनी है, तो फिर इस चित्रकार की क्या ज़रूरत है? ऐसा चित्र तो मैं भी बना सकता हूँ।"
महाराज ने गुस्से में आकर तेनालीरामा को चुनौती दे दी: "ठीक है! मैं तुम्हें एक महीने का समय देता हूँ। इसके साथ ही चित्र बनाने का सारा सामान और एक महीने की छुट्टी भी देता हूँ। एक महीने बाद दरबार में आना और इससे बेहतर चित्र बनाकर दिखाना! अगर तुम हार गए, तो तुम्हें जुर्माना भरना होगा।" तेनालीरामा ने चुनौती स्वीकार कर ली।
एक महीने बाद दरबार में पेशी: महीना बीत गया। तेनालीरामा एक बड़ा सा कैनवास कपड़े से ढककर दरबार में लाए। महाराज और सभी दरबारी बहुत उत्सुक थे कि तेनाली ने क्या बनाया है।
तेनालीरामा ने गर्व से वह कपड़ा हटाया। जैसे ही कपड़ा हटा, पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। उस पूरे बड़े से कैनवास पर कुछ भी नहीं था! वह बिल्कुल खाली था, सिवाय कैनवास के एकदम किनारे पर बनी 'कुछ काले रंग की लकीरों' (जो घोड़े की पूंछ के बालों जैसी लग रही थीं) के।
महाराज ने गुस्से से आंखें तरेरते हुए पूछा: "तेनालीरामा! यह क्या बेवकूफी है? यह तो पूरा कैनवास खाली है। तुमने चित्र कहाँ बनाया है? इसमें घोड़ा कहाँ है?"
तेनाली की हाज़िरजवाबी: तेनालीरामा ने बिल्कुल शांत और गंभीर आवाज़ में कहा: "महाराज! आपने ही तो कहा था कि चित्रकला में सब कुछ नहीं दिखता, बाकी चीज़ें इंसान को अपनी 'कल्पना' से सोचनी पड़ती हैं! तो हुज़ूर, अपनी कल्पना का इस्तेमाल कीजिए।"
तेनाली ने उस खाली कैनवास की ओर इशारा करते हुए आगे कहा: "मैंने एक बहुत ही सुंदर और हट्टा-कट्टा घोड़ा बनाया है, जो अभी-अभी कैनवास के बाहर उस हरी-भरी घास को चरने गया है। कैनवास के किनारे पर जो आप ये काले बाल देख रहे हैं, ये उसी घोड़े की पूंछ हैं, जो अभी कैनवास से बाहर जा रहा है! आप कल्पना कर लीजिए कि घोड़ा बाहर घास खा रहा है।"
महाराज कृष्णदेवराय यह सुनते ही हक्के-बक्के रह गए। तेनालीरामा ने महाराज के ही तर्कों का इस्तेमाल करके उन्हें निरुत्तर कर दिया था। महाराज समझ गए कि तेनालीरामा को शब्दों के जाल में फंसाना असंभव है। उनका गुस्सा शांत हो गया और वे ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। उन्होंने तेनालीरामा की इस हाज़िरजवाबी के लिए उन्हें सोने के सिक्कों की थैली इनाम में दी।
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