आधी रज़ा और आधी सज़ा — मौत की सज़ा पाए मुजरिम की आखिरी इच्छा

मुग़ल दरबार में एक मुजरिम को पेश किया गया। उसने राज्य के खज़ाने से कुछ कीमती सामान चुराया था और राजद्रोह का भी दोषी पाया गया था। सारे सबूत उसके खिलाफ थे।
शहंशाह अकबर ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अपना फैसला सुनाया: "इस मुजरिम का अपराध बहुत बड़ा है। इसे सीधे मौत की सज़ा दी जाती है!"
सज़ा सुनकर मुजरिम रोने लगा, परंतु अब कुछ नहीं हो सकता था।
बादशाह की पेशकश (आखिरी इच्छा): उस दिन शहंशाह अकबर का मिजाज़ कुछ नरम था। जब जल्लाद उस मुजरिम को फांसी घर की ओर ले जाने लगा, तो अकबर ने उसे रोकते हुए कहा: "ठहरो! मुग़ल सल्तनत का एक नियम है कि मौत की सज़ा पाए इंसान की एक आखिरी इच्छा पूरी की जाती है। मुजरिम! तुम अपनी सज़ा-ए-मौत को टाल नहीं सकते, परंतु मैं तुम्हें एक छूट देता हूँ।"
अकबर ने कहा: "तुम अपनी 'मौत का तरीका' खुद चुन सकते हो। तुम जैसे चाहोगे, तुम्हें वैसे ही मौत दी जाएगी (चाहे फांसी से, तलवार से, या ज़हर से)। बताओ, तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या है?"
मुजरिम डर के मारे कांप रहा था, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या मांगे। वह बेबसी से इधर-उधर देखने लगा।
बीरबल की गुप्त सलाह: बीरबल मुजरिम के बिल्कुल पास ही खड़े थे। उन्हें हमेशा से यह लगता था कि राजद्रोह के इस मामले में मुजरिम को किसी और ने फंसाया है, और वह इतना बुरा इंसान नहीं है कि उसे सीधे मौत दी जाए। परंतु बादशाह का हुक्म हो चुका था।
बीरबल ने मुजरिम की ओर देखा और अत्यंत धीमी आवाज़ में (फुसफुसाते हुए) उसके कान में एक जादुई तरकीब बता दी।
मुजरिम की चतुर मांग: बीरबल की बात सुनते ही मुजरिम के चेहरे की हवाइयां उड़नी बंद हो गईं। उसके चेहरे पर एक अजीब सी चमक और आत्मविश्वास आ गया।
उसने शहंशाह अकबर के सामने सिर झुकाया और कहा: "जहाँपनाह! आप बहुत महान हैं जो आपने मुझे अपनी मौत का तरीका खुद चुनने का मौका दिया। मेरी आखिरी इच्छा यह है कि मुग़ल सल्तनत मुझे 'बुढ़ापे से मरने की सज़ा' दे!"
मुजरिम ने आगे कहा: "हुज़ूर! मैं चाहता हूँ कि मैं किसी बीमारी या हथियार से न मरूँ, बल्कि जब मैं 90 साल का बूढ़ा हो जाऊँ, तब मेरी मौत 'प्राकृतिक रूप' से हो। यही मेरे मरने का चुना हुआ तरीका है!"
दरबार का सन्नाटा और बादशाह का अट्टहास: यह इच्छा सुनते ही जल्लाद के हाथ से रस्सी छूट गई। पूरे दरबार में एकदम खामोशी छा गई। मुजरिम ने शहंशाह के दिए गए 'रज़ा' (मौके) का ऐसा इस्तेमाल किया था कि उसकी 'सज़ा' अपने आप खत्म हो गई थी!
यदि शहंशाह अपनी बात पर कायम रहते हैं, तो उन्हें उस मुजरिम को तब तक ज़िंदा रखना होगा जब तक वह बूढ़ा होकर खुद न मर जाए।
अकबर कुछ पलों के लिए एकदम सुन्न रह गए। फिर अचानक, वे अपने सिंहासन पर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। वे समझ गए कि इतनी चतुर और अचूक बात किसी मुजरिम के दिमाग की उपज नहीं हो सकती।
अकबर ने बीरबल की ओर उंगली उठाते हुए हंसकर कहा: "बीरबल! मैं शर्त लगा सकता हूँ कि यह तुम्हारे ही दिमाग की खुराफात है। एक मौत की सज़ा पाए मुजरिम को तुमने एक ही पल में जीवनदान दे दिया!"
शहंशाह अकबर अपनी बात के पक्के थे। उन्होंने मुजरिम की अक्ल (और बीरबल की तरकीब) से खुश होकर उसकी सज़ा-ए-मौत को रद्द कर दिया और उसे केवल कुछ वर्षों की मामूली कैद की सज़ा देकर छोड़ दिया।
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