खुशबू की कीमत और आवाज़ का वज़न — लालच का अचूक इलाज

आगरा के मुख्य बाज़ार में एक मिठाई की बहुत बड़ी दुकान थी। उस दुकान का मालिक (हलवाई) जितना अमीर था, उतना ही बड़ा लालची और कंजूस भी था। उसकी दुकान से हमेशा देसी घी और ताज़ी मिठाइयों की महक पूरे बाज़ार में फैलती रहती थी।
एक दिन, एक बहुत ही गरीब मज़दूर दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद उस दुकान के बाहर आकर बैठ गया। उसके पास खाने के लिए केवल सूखी रोटियां थीं। मज़दूर ने सोचा कि दुकान से आ रही मिठाइयों की खुशबू के साथ यदि वह अपनी सूखी रोटी खाएगा, तो उसे रोटी में भी मिठाई का स्वाद आ जाएगा।
वह मज़दूर गहरी सांस लेकर मिठाई की खुशबू सूंघता और अपनी सूखी रोटी का एक टुकड़ा खा लेता। उसने ऐसे ही मजे से अपनी पूरी रोटी खा ली।
लालची हलवाई का अजीब दावा: हलवाई काफी देर से उस मज़दूर को देख रहा था। जैसे ही मज़दूर ने रोटी खत्म की, हलवाई दौड़कर दुकान से बाहर आया और मज़दूर का कॉलर पकड़ कर चिल्लाने लगा: "ऐ भिखारी! निकाल मेरे पैसे! तूने मेरी दुकान की मिठाइयों की खुशबू के साथ अपनी रोटियां खाई हैं। मेरी मिठाइयों की खुशबू के कारण ही तेरा पेट भरा है। तुझे इस 'खुशबू की कीमत' चुकानी होगी!"
मज़दूर घबरा गया। उसने कहा, "सेठ जी! मैंने आपकी कोई मिठाई नहीं खाई है, ना ही छुई है। खुशबू तो हवा में थी। हवा की भी कोई कीमत होती है भला?"
परंतु हलवाई नहीं माना। वह उस गरीब मज़दूर को घसीटता हुआ सीधा शहंशाह अकबर के दरबार में ले गया।
दरबार में अनोखा मुकद्दमा: अकबर ने जब हलवाई की यह अजीबोगरीब मांग सुनी तो वे हैरान रह गए। हलवाई अपनी बात पर अड़ा था कि उसकी मिठाई की खुशबू मुफ्त नहीं है। चूँकि मामला अजीब था, अकबर ने यह मुकद्दमा बीरबल को सौंप दिया।
बीरबल ने पूरी बात सुनी। वे समझ गए कि यह हलवाई अपनी हद से पार जा रहा है और इसे उसी की भाषा में सबक सिखाना होगा।
बीरबल ने अपने एक सैनिक को इशारा किया और उसके कान में कुछ कहा। सैनिक गया और कुछ ही देर में एक छोटी सी थैली लेकर लौटा। उस थैली में 100 सोने के सिक्के (मोहरें) भरे हुए थे।
बीरबल का अचूक न्याय (आवाज़ का वज़न): बीरबल ने वह सिक्कों से भरी थैली अपने हाथ में ली और हलवाई के बिल्कुल पास जाकर खड़े हो गए।
बीरबल ने हलवाई से पूछा: "सेठ जी! यह मज़दूर बहुत गरीब है, इसलिए इसकी तरफ से 'खुशबू की कीमत' मैं चुकाऊँगा। क्या आप तैयार हैं?"
हलवाई सोने के सिक्कों की थैली देखकर लालच से पागल हो गया। उसने खुश होकर कहा, "जी वज़ीर-ए-आज़म! बिल्कुल तैयार हूँ।"
बीरबल ने उस सिक्कों की थैली को हलवाई के कान के बिल्कुल पास ले जाकर ज़ोर-ज़ोर से हिलाना शुरू कर दिया। थैली के अंदर सोने के सिक्के आपस में टकराए और उनमें से 'छन-छन! खन-खन!' की बहुत तेज़ और मीठी आवाज़ आने लगी।
बीरबल ने कुछ देर तक सिक्के खनकाए और फिर थैली वापस अपनी जेब में रख ली।
बीरबल ने हलवाई से कहा: "सेठ जी! क्या आपने मेरे सिक्कों की आवाज़ सुनी? क्या आपको इन सिक्कों का 'वज़न' और खनक महसूस हुई?"
हलवाई ने हैरानी से कहा: "जी हुज़ूर! आवाज़ तो बिल्कुल साफ आई है, परंतु आपने यह थैली मेरी जेब में नहीं डाली।"
बीरबल ने मुस्कुराते हुए और कड़क आवाज़ में कहा: "थैली तुम्हारी जेब में क्यों डालूँ? न्याय तो पूरा हो चुका है! इस मज़दूर ने तुम्हारी मिठाई नहीं खाई थी, केवल उसकी 'खुशबू' ली थी। इसलिए, मैंने भी तुम्हें अपने सोने के सिक्के नहीं दिए, बल्कि उन सिक्कों की 'आवाज़ और खनक' सुना दी है!"
बीरबल ने पूरे दरबार की ओर देखकर कहा: "जहाँपनाह! 'खुशबू' की कीमत हमेशा 'आवाज़' से ही चुकाई जाती है! हिसाब बराबर हो गया।"
हलवाई का मुँह खुला का खुला रह गया। उसका सारा लालच उसी के गले की हड्डी बन गया। पूरा दरबार ठहाकों से गूंज उठा। अकबर ने हलवाई को उसकी इस घटिया नीयत के लिए दरबार से धक्के मारकर बाहर निकलवा दिया।
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