"अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत"

एक गाँव में रामू नाम का एक किसान रहता था। रामू के पास बहुत अच्छी और उपजाऊ ज़मीन थी, लेकिन उसके अंदर एक बहुत बुरी आदत थी— वह बेहद 'आलसी' था। उसे हर काम को कल पर टालने की बीमारी थी।
एक साल रामू ने अपने खेत में गेहूँ बोया। मौसम बहुत अच्छा था और बारिश भी समय पर हुई, इसलिए गेहूँ की फसल बहुत ही शानदार और लहलहाती हुई निकली। रामू अपने खेत को देखकर बहुत खुश होता और सपने देखता कि इस बार फसल बेचकर वह बहुत सारा पैसा कमाएगा।
लेकिन रामू के खेत के चारों तरफ लगी 'बाड़' एक जगह से बहुत बुरी तरह टूटी हुई थी। उस टूटे हुए हिस्से से कोई भी जानवर या पक्षी आसानी से खेत में घुस सकता था।
टालमटोल की आदत: रामू के पड़ोसी, दीनानाथ काका ने उसे कई बार समझाया: "रामू बेटा! तेरी फसल बहुत अच्छी पक रही है, लेकिन यह जो बाड़ टूटी है, इसे आज ही ठीक कर ले। अगर कल को कोई जंगली जानवर या चिड़ियों का झुंड खेत में घुस गया, तो तेरी सारी मेहनत मिट्टी में मिल जाएगी।"
रामू हमेशा जम्हाई लेते हुए जवाब देता: "अरे काका! आप भी बेकार में चिंता करते हो। अभी तो फसल को कटने में समय है। कल लकड़ियाँ लाकर बाड़ ठीक कर दूँगा, अभी मुझे बहुत नींद आ रही है।"
रामू का 'कल' कभी नहीं आया। वह रोज़ बाड़ ठीक करने का सोचता, लेकिन आलस के मारे टाल देता।
विनाश का दिन: कुछ हफ्तों बाद, फसल पूरी तरह पककर सुनहरी हो गई। दाने पूरी तरह भर चुके थे और रामू ने सोचा कि वह कल से फसल की कटाई शुरू करेगा।
उसी दिन दोपहर को रामू अपने घर में आराम से खर्राटे मार कर सो रहा था। तभी आसमान से 'जंगली चिड़ियों' का एक बहुत ही विशाल झुंड उड़ता हुआ आया। उन्होंने देखा कि खेत की बाड़ टूटी हुई है और अंदर शानदार गेहूँ खड़ा है।
चिड़ियों का वह पूरा झुंड बिना किसी रोक-टोक के खेत में उतर गया। उन्होंने चुन-चुन कर गेहूँ के सारे पके हुए दाने खा लिए। जो बचा, उसे उनके साथ आए कुछ जंगली सुअरों ने अपने पैरों तले रौंद कर पूरी तरह बर्बाद कर दिया।
शाम को जब रामू सोकर उठा और अपनी फसल देखने खेत पर पहुँचा, तो वहाँ का नज़ारा देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जहाँ कल तक सुनहरी फसल लहलहा रही थी, वहाँ अब केवल टूटे हुए डंठल और बर्बाद हुई ज़मीन बची थी।
रामू ज़मीन पर बैठ गया और अपना सिर पीट-पीट कर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा: "हाय राम! मैं लुट गया! मेरी सारी मेहनत बर्बाद हो गई। काश! मैंने उसी दिन वह बाड़ ठीक कर ली होती।"
रामू को रोता हुआ देखकर दीनानाथ काका वहाँ आए। उन्होंने रामू के कंधे पर हाथ रखा और बहुत ही गंभीर आवाज़ में कहा: "रामू! मैंने तुम्हें बहुत पहले चेताया था, लेकिन तुमने अपने आलस के कारण मेरी बात नहीं मानी। अब इस तरह रोने और छाती पीटने से तुम्हारी फसल वापस नहीं आ जाएगी। तुम्हारे लिए तो वही कहावत सच साबित हुई है— 'अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत!'"
रामू को अपनी गलती का बहुत भारी पछतावा हुआ, लेकिन अब समय हाथ से निकल चुका था।
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