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"थोथा चना बाजे घना"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"थोथा चना बाजे घना"

एक गाँव में एक 'नीम-हकीम' (झोलाछाप वैद्य) आया। उसका नाम था 'ढोंगीराम'। ढोंगीराम को चिकित्सा का कोई ज्ञान नहीं था। उसने बस कुछ चूर्ण-चटनी बनाना सीख लिया था और दो-चार अंग्रेज़ी दवाओं के नाम रट लिए थे।

लेकिन उसका दिखावा देखने लायक था!

ढोंगीराम गाँव में एक बहुत ही चमकदार कोट पहनकर आया था। उसके गले में एक नकली स्टेथोस्कोप लटक रहा था और उसके हाथ में एक बहुत बड़ा, चमकीला और भारी 'लोहे का बक्सा' था, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था— "विश्व प्रसिद्ध डॉक्टर ढोंगीराम - हर बीमारी का शर्तिया इलाज!"

डिंगें मारना: ढोंगीराम ने गाँव की चौपाल पर अपना डेरा जमाया। वह रोज़ सुबह-शाम गाँव वालों को इकट्ठा करता और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर अपने झूठे ज्ञान का बखान करता: "अरे भाइयो! मैंने बड़े-बड़े नवाबों और राजाओं का इलाज किया है। मेरे पास ऐसी जादुई जड़ी-बूटियाँ हैं कि मरे हुए इंसान में भी जान फूँक दूँ! शहर के बड़े-बड़े डॉक्टर मुझसे सलाह लेने आते हैं।"

गाँव के सीधे-सादे लोग उसकी इन बड़ी-बड़ी बातों (बकवास) से बहुत प्रभावित हो गए। वे अपनी छोटी-मोटी बीमारियों (जैसे पेट दर्द या खाँसी) के लिए ढोंगीराम के पास जाते। ढोंगीराम उन्हें मीठी गोलियाँ दे देता और वे ठीक हो जाते (क्योंकि बीमारियाँ मामूली थीं)। इससे ढोंगीराम का घमंड और उसकी बकवास और भी बढ़ गई।

उसी गाँव के कोने में एक बहुत ही शांत और ज्ञानी 'वैद्य' भी रहते थे। वे कभी किसी के सामने अपने ज्ञान का दिखावा नहीं करते थे, बस चुपचाप जड़ी-बूटियाँ पीसकर लोगों का इलाज करते थे। ढोंगीराम अक्सर उन सच्चे वैद्य जी का मज़ाक उड़ाता था।

असलियत का पर्दाफाश: एक दिन अचानक गाँव के सरपंच जी के गले में खाना खाते समय 'एक बड़ी हड्डी फँस गई'। उनकी साँस रुकने लगी, उनका चेहरा नीला पड़ने लगा और वे तड़प कर ज़मीन पर गिर पड़े।

पूरे गाँव में हाहाकार मच गया। लोग दौड़ते हुए उस "विश्व प्रसिद्ध" ढोंगीराम को बुलाकर लाए।

ढोंगीराम अपना बड़ा सा चमकीला बक्सा लेकर पूरे घमंड से चौपाल पर पहुँचा। लेकिन जैसे ही उसने सरपंच की इतनी गंभीर और डरावनी हालत देखी, उसके 'हाथ-पैर काँपने लगे'। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि गले में फँसी हड्डी को कैसे निकाला जाए। उसका सारा झूठा ज्ञान हवा हो गया। वह पसीने से भीग गया और बक्से में से बेकार की पुड़िया निकालने लगा। सरपंच की जान जा रही थी और ढोंगीराम घबराहट में मूर्तियों की तरह खड़ा था।

तभी किसी ने गाँव के उन 'शांत वैद्य जी' को बुला लिया।

सच्चे वैद्य जी बिना कोई शोर मचाए, बहुत शांति से आए। उन्होंने एक सेकंड में स्थिति समझ ली। उन्होंने सरपंच को एक खास तरीके से पीछे से पकड़ा और उनकी छाती के नीचे एक ज़ोरदार और तकनीकी 'झटका' दिया। झटके के साथ ही वह फँसी हुई हड्डी सरपंच के मुँह से बाहर छिटक कर गिर गई!

सरपंच की साँस लौट आई और उनकी जान बच गई।

जब सरपंच होश में आए, तो उन्हें ढोंगीराम की असलियत पता चल गई। गाँव के एक बुजुर्ग ने ढोंगीराम के उस बड़े और चमकीले बक्से पर डंडा मारते हुए कहा:

"ढोंगीराम! तुमने बातें तो ऐसी की थीं जैसे तुम साक्षात धन्वंतरि (भगवान) हो, लेकिन जब सच में किसी की जान बचाने का वक्त आया, तो तुम्हारी सारी अक्ल घास चरने चली गई! तुम्हारे अंदर ज्ञान तो शून्य है, बस आवाज़ ही आवाज़ है। ठीक ही कहा है— 'थोथा चना बाजे घना!' (जैसे खाली चना भूनने पर बहुत आवाज़ करता है, वैसे ही खाली दिमाग वाला इंसान बहुत डिंगें मारता है)।"

ढोंगीराम अपना वह भारी बक्सा उठाकर गाँव से ऐसा भागा कि फिर कभी उस इलाके में दिखाई नहीं दिया। सच्चे और शांत वैद्य जी को गाँव वालों ने सिर-आँखों पर बिठा लिया।

🎉 कहानी समाप्त

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