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"बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद"

हिमालय की तलहटी में एक बहुत ही घना जंगल था। उस जंगल के पास वाले गाँव में एक बहुत ही प्रसिद्ध और ज्ञानी 'वैद्यराज' रहते थे। वे जड़ी-बूटियों की बहुत गहरी समझ रखते थे।

एक दिन वैद्यराज जंगल में एक बहुत ही 'दुर्लभ और चमत्कारी जड़ी-बूटी' ढूँढने गए। वह जड़ी-बूटी बिल्कुल 'अदरक' की गाँठ जैसी दिखती थी, लेकिन उसमें ऐसी जादुई ताक़त थी कि वह किसी भी मरते हुए इंसान की जान बचा सकती थी और उसे खाने वाला इंसान कभी बीमार नहीं पड़ता था।

कई दिनों की कड़ी मेहनत के बाद, वैद्यराज को एक पहाड़ी के पास वह बेशकीमती जड़ी-बूटी (अदरक) मिल गई। उन्होंने उसे बहुत ही हिफ़ाज़त से अपने थैले में रखा और वापस गाँव की तरफ चल पड़े।

बंदर की शरारत: वैद्यराज चलते-चलते बहुत थक गए थे। उन्होंने एक बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे अपना थैला रखा और थोड़ी देर आराम करने के लिए लेट गए। ठंडी हवा चल रही थी, इसलिए उनकी आँख लग गई।

उसी बरगद के पेड़ पर 'मक्कू' नाम का एक बहुत ही शरारती और चंचल बंदर बैठा था। मक्कू को हमेशा दूसरों की चीज़ों से छेड़छाड़ करने की आदत थी। जब उसने नीचे एक थैला देखा, तो उसकी उत्सुकता जाग उठी।

मक्कू चुपके से पेड़ से नीचे उतरा। उसने वैद्यराज का थैला खोला और उसके अंदर झाँका। थैले के अंदर उसे वह 'चमत्कारी अदरक' दिखाई दी। मक्कू को लगा कि शायद यह कोई बहुत ही स्वादिष्ट फल या खाने की चीज़ है।

उसने जल्दी से वह अदरक निकाली और छलाँग मारकर वापस पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर जा बैठा।

गुण की नाकद्री: बंदर ने बड़े चाव से उस चमत्कारी अदरक का एक बड़ा टुकड़ा अपने दाँतों से काटा। लेकिन... अदरक का स्वाद बहुत ही 'तीखा, कड़वा और कसैला' था!

बंदर की जीभ जलने लगी और वह खाँसने लगा। उसे उस जड़ी-बूटी के गुणों के बारे में क्या पता था? उसे तो बस मीठी चीज़ें पसंद थीं।

मक्कू बंदर ने गुस्से में थू-थू किया और झल्लाहट में उस बेशकीमती चमत्कारी अदरक को 'नीचे ज़मीन की कीचड़ में फेंक दिया'। फिर उसने पास ही लगे पेड़ से एक मामूली सा पका हुआ 'केला' तोड़ा और मज़े से खाने लगा।

तभी वैद्यराज की नींद खुल गई। उन्होंने देखा कि उनकी हफ़्तों की मेहनत से खोजी गई वह दुर्लभ जड़ी-बूटी कीचड़ में पड़ी खराब हो चुकी है, और ऊपर पेड़ पर बैठा बंदर एक साधारण सा केला खाकर खुश हो रहा है।

वैद्यराज ने गहरा दुख जताते हुए अपना सिर पीट लिया और कहा: "हे भगवान! यह जड़ी-बूटी सोने से भी ज़्यादा कीमती थी, यह हज़ारों लोगों की जान बचा सकती थी। लेकिन इस मूर्ख जानवर ने इसे कीचड़ में फेंक दिया। सच ही कहा गया है कि अज्ञानी को कितनी भी बहुमूल्य चीज़ दे दो, वह उसकी कीमत नहीं समझ सकता... बिल्कुल वैसे ही जैसे— 'बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद!'"

🎉 कहानी समाप्त

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