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"अंधों में काना राजा"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"अंधों में काना राजा"

बहुत समय पहले एक ऐसा गाँव था, जिसका नाम था 'गंवारपुर'। उस गाँव की खासियत यह थी कि वहाँ का एक भी इंसान, चाहे वह बच्चा हो या बूढ़ा, पढ़ा-लिखा नहीं था। पूरे गाँव में किसी को 'काला अक्षर' तक पढ़ना नहीं आता था। गाँव वाले बहुत ही सीधे-सादे और मूर्ख किस्म के थे। अगर किसी को कोई चिट्ठी पढ़वानी होती, तो उसे कोसों दूर दूसरे गाँव जाना पड़ता था।

एक दिन उस गाँव में 'चतुरराम' नाम का एक ठग आया। चतुरराम कोई बहुत बड़ा विद्वान नहीं था। वह केवल पहली या दूसरी कक्षा तक पढ़ा था; उसे बस अपना नाम लिखना आता था और वह अक्षरों को थोड़ा-बहुत जोड़कर पढ़ लेता था। इसके अलावा उसे कुछ नहीं आता था।

जब चतुरराम को पता चला कि इस गाँव में कोई भी पढ़ा-लिखा नहीं है, तो उसके शातिर दिमाग में एक विचार आया कि इन अनपढ़ लोगों को बेवकूफ़ बनाकर मजे लूटे जाएँ।

ज्ञान का दिखावा: चतुरराम ने चश्मा पहन लिया, हाथ में एक मोटी सी (लेकिन उल्टी) किताब पकड़ ली और गाँव के चौपाल पर जाकर बैठ गया। उसने गाँव वालों से कहा कि वह एक बहुत बड़ा 'विद्वान पंडित' है और शहर से आया है।

गाँव वालों ने जब उसे किताब पकड़े देखा, तो वे उसके चरणों में गिर पड़े।

एक दिन गाँव के सरपंच के नाम शहर से एक 'सरकारी चिट्ठी' आई। सरपंच दौड़ता हुआ चतुरराम के पास गया और बोला: "विद्वान जी! कृपया यह चिट्ठी पढ़कर बताइए कि सरकार ने क्या लिखा है।"

चतुरराम ने चिट्ठी को बहुत ही 'गंभीर' चेहरे के साथ पकड़ा। असल में, चिट्ठी में बस यह लिखा था कि "गाँव का लगान माफ़ कर दिया गया है।"

ठग की चालाकी: चूँकि चतुरराम ठीक से पढ़ नहीं सकता था, उसने अक्षरों को देखकर थोड़ा बहुत अंदाज़ा लगाया और फिर अपना झूठा ज्ञान बघारना शुरू किया।

उसने बहुत ही गंभीर आवाज़ में कहा: "अरे सरपंच जी! मामला बहुत गंभीर है। सरकार ने लिखा है कि अगर इस गाँव ने तुरंत एक 'विद्वान आदमी' को अपना मुखिया नहीं बनाया, तो पूरे गाँव पर बहुत भारी जुर्माना लगेगा और सबकी ज़मीन छीन ली जाएगी!"

गाँव वाले यह सुनकर बुरी तरह डर गए। वे सब हाथ जोड़कर चतुरराम के पास गए और बोले: "महाराज! आप ही इस गाँव के सबसे पढ़े-लिखे इंसान हैं। हमें बचाइए और आज से आप ही हमारे गाँव के 'मुखिया' बन जाइए!"

चतुरराम ने नाटक करते हुए कहा: "ठीक है, अगर तुम लोग इतनी ज़िद कर रहे हो, तो मैं मान जाता हूँ।"

उस दिन के बाद चतुरराम गाँव का राजा बन गया। गाँव वाले उसे मुफ्त का खाना खिलाते, उसके पैर दबाते और वह जो भी अंट-शंट बातें बोलता, वे उसे 'ब्रह्मवाक्य' मान लेते। चतुरराम की ऐश हो गई थी, क्योंकि वह जानता था कि इन अनपढ़ों के सामने उसका थोड़ा सा ज्ञान भी बहुत बड़ा है।

तभी गाँव में शहर से एक असली 'पढ़ा-लिखा मास्टर' आया। जब उसने चतुरराम की असलियत देखी कि उसे तो ठीक से 'क ख ग' भी नहीं आता, तो मास्टर ने हँसते हुए सरपंच से कहा:

"सरपंच जी! यह आदमी कोई विद्वान नहीं है, यह तो बस एक ठग है जिसे थोड़ा सा अक्षर ज्ञान है। आप सभी अज्ञानियों के बीच यह ऐसे राज कर रहा है जैसे 'अंधों में काना राजा'!" (यानी जहाँ सब अंधे हों, वहाँ एक आँख वाला इंसान ही खुद को सबसे श्रेष्ठ मान लेता है)।

सरपंच और गाँव वालों को असलियत समझ में आ गई और उन्होंने डंडे मार-मारकर उस चतुरराम को गाँव से बाहर निकाल दिया।

🎉 कहानी समाप्त

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