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"जिसकी लाठी उसकी भैंस"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"जिसकी लाठी उसकी भैंस"

बिरजू गाँव का एक बहुत ही गरीब और सीधा-सादा किसान था। बिरजू के पास ज़मीन तो नहीं थी, लेकिन उसके पास एक बहुत ही सुंदर और तंदुरुस्त 'भैंस' थी, जिसका नाम उसने 'गौरी' रखा था। गौरी रोज़ बाल्टी भर-भर कर मीठा दूध देती थी। उसी दूध को बेचकर बिरजू अपने परिवार और छोटे बच्चों का पेट पालता था। गौरी बिरजू के लिए उसके परिवार की सदस्य जैसी थी।

उसी गाँव में एक बहुत ही क्रूर और बेईमान 'ज़मींदार' रहता था, जिसका नाम था ज़ालिम सिंह। ज़ालिम सिंह के पास पैसे और ताक़त का बहुत घमंड था। उसके पास दर्जनों लठैत थे जो गाँव वालों को डरा-धमका कर रखते थे।

एक दिन ज़ालिम सिंह की नज़र बिरजू की दुधारू भैंस पर पड़ गई। ज़मींदार को वह भैंस इतनी पसंद आई कि उसने तुरंत अपने मुनीम को बिरजू के पास भेजा।

ज़मींदार का लालच: मुनीम ने बिरजू से कहा: "ज़मींदार साहब को तेरी भैंस पसंद आ गई है। यह ले सौ रुपये और भैंस को हवेली में बाँध आ।"

सौ रुपये उस भैंस की असली कीमत के आधे से भी कम थे, और सबसे बड़ी बात, बिरजू अपनी भैंस बेचना ही नहीं चाहता था।

बिरजू ने हाथ जोड़कर कहा: "मुनीम जी! ज़मींदार साहब से कहना कि मैं अपनी गौरी को नहीं बेच सकता। यह मेरे छोटे बच्चों के लिए दूध का इकलौता सहारा है। अगर मैं इसे दे दूँगा, तो मेरे बच्चे भूखे मर जाएँगे।"

जब यह बात ज़ालिम सिंह को पता चली, तो उसका अहंकार भड़क उठा। "एक दो कौड़ी के किसान की इतनी हिम्मत कि वह मेरी बात टाल दे?" उसने क्रोध में फुंकारते हुए कहा।

उसी रात, ज़ालिम सिंह के चार हट्टे-कट्टे लठैत, जिनके हाथों में तेल पिलाई हुई मोटी-मोटी और लोहे की परत चढ़ी 'लाठियाँ' थीं, बिरजू के घर पहुँच गए।

उन्होंने बिरजू को लाठियों से डराया, उसे ज़मीन पर धक्का दिया और ज़बरदस्ती खूँटे से गौरी (भैंस) की रस्सी खोल ली। बिरजू रोता रहा, गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन उन गुंडों ने एक न सुनी और भैंस को खींचकर ज़मींदार की हवेली में ले गए।

अगली सुबह, बिरजू रोते-रोते गाँव के सरपंच और 'पंचायत' के पास गया। उसने रोते हुए न्याय की गुहार लगाई: "सरपंच जी! ज़मींदार ने मेरी भैंस लूट ली है। मुझे न्याय चाहिए।"

सरपंच ने पंचायत बुलाई। ज़ालिम सिंह भी अपने उन लाठीधारी गुंडों के साथ पूरे ठस्से से पंचायत में आकर बैठ गया।

सरपंच ने डरते-डरते पूछा: "ज़मींदार जी, बिरजू कह रहा है कि आपने ज़बरदस्ती इसकी भैंस ले ली है?"

ज़ालिम सिंह ने अपनी मूँछों पर ताव दिया और अपने लठैतों की तरफ इशारा किया। लठैतों ने ज़मीन पर अपनी भारी लाठियाँ पटकीं— 'ठकाक!'

लाठियों की आवाज़ सुनकर पूरी पंचायत सन्न रह गई। ज़ालिम सिंह ने गुर्राते हुए कहा: "यह भैंस मेरी है! अगर किसी को कोई एतराज है, तो वह मेरी इन लाठियों से बात कर सकता है। कोई है जो मेरे खिलाफ बोलेगा?"

सरपंच और पंच सब ज़मींदार की ताक़त और लाठियों से काँपते थे। किसी ने बिरजू का साथ नहीं दिया। सच्चाई जानने के बावजूद, सरपंच ने अपना सिर झुका लिया और फैसला सुनाया: "चूँकि भैंस ज़मींदार की हवेली में बँधी है, इसलिए यह भैंस ज़मींदार की ही मानी जाएगी।"

बिरजू बेबसी से रोता हुआ अपने घर लौट आया। गाँव के एक बुजुर्ग ने बिरजू को समझाते हुए दुनिया की सबसे कड़वी सच्चाई बयान की: "बेटा बिरजू! इस दुनिया में कमज़ोर की सच्चाई का कोई मोल नहीं है। यहाँ तो वही नियम चलता है— 'जिसकी लाठी, उसकी भैंस'। जिसके पास ताक़त है, न्याय भी उसी का गुलाम हो जाता है।"

🎉 कहानी समाप्त

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