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"काला अक्षर भैंस बराबर"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"काला अक्षर भैंस बराबर"

रामपुर गाँव में एक बहुत ही अमीर साहूकार रहता था, जिसका नाम था 'सेठ करोड़ीमल'। सेठ जी के पास खूब पैसा था, वे रेशमी कुर्ते पहनते थे और अपनी बड़ी-बड़ी मूँछों पर ताव देते हुए गाँव में घूमते थे। लेकिन सेठ जी के अंदर एक बहुत बड़ी कमी थी— वे बिल्कुल 'अनपढ़' थे। उन्हें 'क ख ग' भी पढ़ना नहीं आता था।

हालाँकि, सेठ करोड़ीमल को अपनी इस अनपढ़ता पर बहुत शर्म आती थी। इसलिए अपना रुतबा बनाए रखने के लिए, उन्होंने पूरे गाँव में यह झूठ फैला रखा था कि वे बहुत पढ़े-लिखे हैं। वे हमेशा अपनी जेब में एक-दो कागज़ और कलम फँसा कर रखते थे ताकि लोग उन्हें ज्ञानी समझें।

उसी गाँव में 'सुखिया' नाम का एक बहुत ही चतुर और थोड़ा चालाक किसान रहता था। सुखिया को सेठ जी की असलियत पता चल चुकी थी और वह उन्हें सबक सिखाना चाहता था।

चालाकी का कागज़: सुखिया ने कुछ महीने पहले सेठ जी से 500 रुपये उधार लिए थे और गिरवी के तौर पर अपनी पत्नी के चाँदी के कंगन सेठ के पास रखवाए थे।

एक दिन सुखिया ने एक सादे कागज़ पर कुछ आड़ी-टेढ़ी लकीरें खींचीं, जो बिल्कुल किसी 'चिट्ठी या रसीद' जैसी दिख रही थीं (लेकिन असल में वह केवल कूड़ा-कचरा लिखावट थी)। वह उस कागज़ को लेकर सेठ करोड़ीमल की हवेली पर पहुँच गया।

सुखिया ने हाथ जोड़कर कहा: "सेठ जी! यह देखिए, शहर से बड़े मुनीम जी ने यह रसीद भेजी है। इसमें लिखा है कि मैंने आपके 500 रुपये ब्याज समेत चुका दिए हैं। आप इस कागज़ को पढ़ लीजिए और मेरे कंगन मुझे वापस दे दीजिए।"

झूठे ज्ञान का पर्दाफाश: अब सेठ करोड़ीमल बुरी तरह फँस गए। अगर वे कहते कि उन्हें पढ़ना नहीं आता, तो उनकी सारी इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाती। और अगर वे मुनीम को बुलाते, तो मुनीम बता देता कि यह कागज़ तो जाली है।

सेठ जी ने अपना नकली चश्मा आँखों पर चढ़ाया। अपना रुतबा दिखाने के लिए उन्होंने सुखिया के हाथ से वह कागज़ झपटा। लेकिन घबराहट में सेठ जी ने उस कागज़ को 'उल्टा' पकड़ लिया!

सेठ जी उस उल्टे कागज़ को बहुत ही गंभीरता से घूरने लगे, जैसे वे हर एक शब्द को बहुत गहराई से पढ़ रहे हों। वे कागज़ को देखकर बीच-बीच में सिर हिलाते और कहते, "हम्म... अच्छा... मुनीम जी ने मोहर भी लगाई है... बिल्कुल ठीक लिखा है।"

सुखिया अपनी हँसी रोकते हुए बोला: "तो सेठ जी, सब ठीक लिखा है न?" सेठ जी ने अपना कॉलर झटकते हुए कहा: "हाँ-हाँ! मैं तो एक नज़र में ही पढ़ लेता हूँ। इसमें साफ-साफ लिखा है कि तेरा सारा कर्ज़ा माफ हो गया है।" यह कहकर सेठ जी ने अपनी तिजोरी खोली और सुखिया के चाँदी के कंगन उसे वापस कर दिए।

जब सुखिया कंगन लेकर जाने लगा, तो वह ज़ोर से हँस पड़ा। उसने पीछे मुड़कर हवेली के प्रांगण में खड़े बाकी गाँव वालों से कहा: "अरे गाँव वालो! ज़रा सेठ जी की विद्वता तो देखो! कागज़ पूरा उल्टा पकड़ा हुआ है और कह रहे हैं कि सब पढ़ लिया। अरे सेठ जी, जो कागज़ पर लिखा ही नहीं है, वो आपने पढ़ कैसे लिया? आपके लिए तो यह लिखावट और 'काला अक्षर भैंस बराबर' है!"

सेठ करोड़ीमल ने जब देखा कि कागज़ सच में उल्टा है, तो वे शर्म से लाल हो गए। अपने झूठे दिखावे और अनपढ़ होने के कारण सेठ जी ने अपने ही हाथों अपना भारी नुकसान करवा लिया था।

🎉 कहानी समाप्त

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