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🏹 रामायण

भाग 5: अहिल्या उद्धार, शिव धनुष भंग और सीता स्वयंवर

महर्षि वाल्मीकि — रामायण7 मिनट का पठन
भाग 5: अहिल्या उद्धार, शिव धनुष भंग और सीता स्वयंवर

सिद्धाश्रम में यज्ञ सफलतापूर्वक संपन्न होने के बाद, महर्षि विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण को राजा जनक की नगरी मिथिला चलने का आदेश दिया। गुरु के पीछे-पीछे चलते हुए दोनों भाई एक ऐसे वीरान और निर्जन आश्रम में पहुँचे, जहाँ दूर-दूर तक कोई पशु-पक्षी या मनुष्य दिखाई नहीं दे रहा था।

श्रीराम के पूछने पर विश्वामित्र ने बताया, "राम! यह महर्षि गौतम का पवित्र आश्रम है। उनकी पत्नी अहिल्या अत्यंत रूपवान और पतिव्रता थीं। परंतु देवराज इंद्र के एक छल के कारण, महर्षि गौतम ने क्रोधित होकर अपनी ही पत्नी को श्राप दे दिया था कि वह हजारों वर्षों तक पत्थर की शिला बनकर इसी वन में पड़ी रहेगी। जब अहिल्या ने क्षमा मांगी, तब महर्षि ने कहा था कि त्रेता युग में जब भगवान राम इस वन से गुजरेंगे, तब उनके चरणों की धूलि स्पर्श करने से ही तुम्हारा उद्धार होगा।"

यह सुनकर श्रीराम ने अत्यंत करुणा भाव से आगे बढ़कर उस शिला को अपने चरणों से स्पर्श किया। चरण स्पर्श होते ही वह पाषाण शिला एक अत्यंत सुंदर और दिव्य तेज वाली स्त्री के रूप में परिवर्तित हो गई। देवी अहिल्या ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से श्रीराम की स्तुति की और वे अपने पति महर्षि गौतम के पास स्वर्गलोक चली गईं।

अहिल्या का उद्धार करने के पश्चात वे मिथिला नगरी पहुँचे। राजा जनक ने महर्षि विश्वामित्र का भव्य स्वागत किया और उनके साथ आए दोनों तेजस्वी राजकुमारों को देखकर वे मुग्ध रह गए। जब जनक को पता चला कि ये अयोध्या नरेश दशरथ के पुत्र हैं, तो उनकी प्रसन्नता की कोई सीमा न रही।

अगले दिन सीता स्वयंवर का भव्य आयोजन हुआ। रंगभूमि में देश-देशांतर के बलवान राजा, महाराजा और राजकुमार उपस्थित थे। सभा के ठीक मध्य में भगवान शिव का वह अत्यंत विशाल और भारी धनुष 'पिनाक' रखा हुआ था। राजा जनक ने भरी सभा में घोषणा की, "जो भी वीर इस शिव धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी के साथ मेरी पुत्री सीता का विवाह संपन्न होगा।"

एक-एक करके कई अभिमानी राजा अपनी जगह से उठे, लेकिन धनुष को उठाना तो दूर, वे सब मिलकर उसे तिल भर भी अपनी जगह से खिसका नहीं सके। कुछ राजा तो धनुष के भारीपन से ही लज्जित होकर लौट गए। जब एक भी राजा सफल नहीं हुआ, तो राजा जनक अत्यंत निराश हो गए। वे क्षोभ में भरकर बोले, "क्या यह पृथ्वी अब वीरों से खाली हो गई है? मुझे लगता है मेरी पुत्री के भाग्य में विवाह लिखा ही नहीं है।"

राजा जनक के ये निराशाजनक वचन सुनकर वीर लक्ष्मण क्रोध से लाल हो गए। उन्होंने गरजते हुए कहा, "जिस सभा में रघुकुल का कोई भी वीर उपस्थित हो, वहाँ ऐसे वचन कहना अनुचित है। मेरे भ्राता राम की आज्ञा हो तो मैं इस पूरे ब्रह्मांड को गेंद की तरह उठा लूँ, यह पुराना धनुष तो क्या चीज़ है!" श्रीराम ने मुस्कुराकर अपने छोटे भाई लक्ष्मण को शांत किया और उन्हें बैठने का संकेत दिया।

तभी महर्षि विश्वामित्र ने गंभीर स्वर में कहा, "उठो राम! शिव धनुष को तोड़कर राजा जनक का संताप दूर करो।"

गुरु की आज्ञा पाते ही श्रीराम अत्यंत शांत और सहज भाव से उठे। उन्होंने पहले अपने गुरु को प्रणाम किया और फिर शिव धनुष की प्रदक्षिणा की। बिना किसी प्रयास के, श्रीराम ने खेल-खेल में ही उस विशाल शिव धनुष को बीच से पकड़कर उठा लिया। पूरी सभा आश्चर्य से यह दृश्य देख रही थी। जैसे ही श्रीराम ने प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए उस धनुष को झुकाया, वह भयंकर और पुराना धनुष एक प्रलयकारी गर्जना के साथ बीच से दो टुकड़ों में टूट गया।

धनुष टूटने की गर्जना इतनी भयंकर थी कि धरती कांप उठी और सभा में बैठे कई कमज़ोर राजा मूर्छित होकर गिर पड़े। उसी क्षण, आकाश से देवताओं ने पुष्पों की वर्षा आरंभ कर दी। अत्यंत सुंदर रेशमी वस्त्रों और आभूषणों से सजी हुई राजकुमारी सीता अपने हाथों में जयमाला लेकर आगे आईं और उन्होंने लजाते हुए वह माला श्रीराम के गले में पहना दी। पूरा पंडाल 'जय श्रीराम' और 'जय सियाराम' के जयकारों से गूंज उठा।

परंतु यह आनंद कुछ ही क्षणों का था। शिव धनुष टूटने की वह भयंकर ध्वनि महेंद्र पर्वत पर तपस्या कर रहे भगवान परशुराम के कानों तक पहुँच गई थी। शिव जी का धनुष टूटने से परशुराम का क्रोध भड़क उठा और वे फरसा धारण किए हुए तुरंत मिथिला की सभा में आ धमके।

क्रोध से कांपते हुए परशुराम ने गरज कर पूछा, "मेरे गुरु शिव का धनुष किसने तोड़ा है? वह मेरे सामने आए, अन्यथा यहाँ उपस्थित सभी राजा मारे जाएंगे!"

यह सुनकर लक्ष्मण फिर से आगे आए और उन्होंने व्यंग्य करते हुए परशुराम से तीखा वाद-विवाद किया, जिससे परशुराम का क्रोध और अधिक भड़क गया। स्थिति बिगड़ती देख श्रीराम स्वयं आगे आए। उन्होंने अत्यंत विनम्रता और कोमल वचनों से परशुराम का क्रोध शांत किया।

श्रीराम की अलौकिक शक्ति और शांति को देखकर परशुराम को संदेह हुआ। उन्होंने अपना दिव्य 'वैष्णव धनुष' श्रीराम को दिया और कहा, "यदि तुम सचमुच इतने बलवान हो, तो इस धनुष पर बाण चढ़ाकर दिखाओ।" श्रीराम ने बिना किसी प्रयास के उस धनुष पर भी बाण चढ़ा दिया। तब परशुराम को यह पूर्ण विश्वास हो गया कि श्रीराम कोई और नहीं, बल्कि साक्षात भगवान विष्णु के अवतार हैं। परशुराम ने श्रीराम की स्तुति की और वापस अपनी तपस्या के लिए महेंद्र पर्वत पर लौट गए।

विघ्न टल चुका था। अब राजा जनक ने अत्यंत हर्ष के साथ विवाह का प्रस्ताव लेकर अयोध्या नरेश दशरथ के पास निमंत्रण भेजने की तैयारी आरंभ कर दी।

🎉 कहानी समाप्त

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