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🏹 रामायण

भाग 4: महर्षि विश्वामित्र का आगमन, ताड़का वध और यज्ञ रक्षा

महर्षि वाल्मीकि — रामायण7 मिनट का पठन
भाग 4: महर्षि विश्वामित्र का आगमन, ताड़का वध और यज्ञ रक्षा

अयोध्या नरेश दशरथ जब अपने मंत्रियों और गुरुओं के साथ चारों राजकुमारों के विवाह की चर्चा कर रहे थे, तभी राजद्वार पर एक अत्यंत तेजस्वी ऋषि का आगमन हुआ। ये कोई और नहीं, बल्कि अपने उग्र तप और क्रोध के लिए तीनों लोकों में विख्यात, महर्षि विश्वामित्र थे। जो कभी एक महान क्षत्रिय राजा हुआ करते थे, उन्होंने अपने कठोर तप से 'ब्रह्मर्षि' का पद प्राप्त कर लिया था।

उनके आगमन की सूचना पाते ही राजा दशरथ नंगे पैर दौड़ते हुए द्वार पर पहुंचे। उन्होंने साष्टांग प्रणाम कर महर्षि को राजसिंहासन पर बैठाया और उनके चरण धोए। दशरथ ने हाथ जोड़कर कहा, "हे मुनिवर! आपके दर्शन पाकर मेरा जीवन धन्य हो गया। आज्ञा करें, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ? आप जो भी मांगेंगे, मैं सत्य की शपथ लेकर कहता हूँ कि उसे अवश्य पूरा करूँगा।"

महर्षि विश्वामित्र ने गंभीर स्वर में कहा, "राजन! मैं अपने आश्रम में एक महान यज्ञ कर रहा हूँ, परंतु रावण के भेजे हुए दो भयंकर राक्षस—मारीच और सुबाहु—हर बार मेरे यज्ञ में रक्त और मांस फेंककर उसे अपवित्र कर देते हैं। मैं अपने क्रोध से उन्हें भस्म कर सकता हूँ, परंतु यज्ञ के नियमों के अनुसार मैं श्राप नहीं दे सकता। इसलिए, हे दशरथ! अपने सबसे बड़े और पराक्रमी पुत्र राम को मेरे साथ भेज दो। केवल राम ही उन राक्षसों का वध करके मेरे यज्ञ की रक्षा कर सकता है।"

यह सुनते ही दशरथ के हाथ से मानो प्राण ही छूट गए। वे कांपने लगे और मूर्छित होकर गिर पड़े। होश आने पर उन्होंने रोते हुए कहा, "हे मुनिवर! मेरा राम तो अभी मात्र सोलह वर्ष का बालक है। वह उन मायावी राक्षसों से कैसे लड़ेगा? राम के बिना मैं जीवित नहीं रह सकता। आप चाहें तो मेरी पूरी चतुरंगिणी सेना ले जाएँ, मैं स्वयं आपके साथ चलूँगा, परंतु मेरे राम को मत मांगिए।"

दशरथ का यह मोह देखकर विश्वामित्र क्रोधित हो उठे। उनका क्रोध देखकर धरती कांपने लगी। तब कुलगुरु वशिष्ठ ने बीच-बचाव किया। उन्होंने दशरथ को एकांत में समझाया, "राजन! अज्ञानियों की तरह मोह मत करो। विश्वामित्र स्वयं सभी अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता हैं। वे राम को कोई क्षति नहीं पहुँचने देंगे, बल्कि उनके साथ जाने से राम का ही कल्याण होगा। तुम अपने वचन का पालन करो।"

गुरु वशिष्ठ के समझाने पर भारी हृदय से राजा दशरथ ने राम और लक्ष्मण को महर्षि विश्वामित्र को सौंप दिया। माता-पिता के चरण स्पर्श कर, धनुष-बाण धारण किए दोनों किशोर राजकुमार महर्षि के पीछे-पीछे वन की ओर चल पड़े।

मार्ग में सरयू नदी के तट पर विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण को 'बला' और 'अतिबला' नाम की दो गुप्त और दिव्य विद्याएं सिखाईं। इन विद्याओं के प्रभाव से उन्हें कभी भूख-प्यास नहीं लगती थी, मार्ग में थकान नहीं होती थी और सोते समय भी कोई राक्षस उन पर वार नहीं कर सकता था।

चलते-चलते वे एक घने और भयानक वन में पहुँचे। विश्वामित्र ने बताया, "राम! यह ताड़का वन है। यहाँ एक हजार हाथियों के बल वाली भयंकर राक्षसी ताड़का रहती है। उसने इस पूरे क्षेत्र को उजाड़ दिया है। तुम बिना किसी संकोच के इसका वध कर दो।"

राम ने सोचा कि स्त्री पर शस्त्र कैसे उठाऊँ, परंतु गुरु की आज्ञा सर्वोपरि थी। राम ने अपने धनुष की टंकार की। ध्वनि सुनते ही ताड़का धूल की आंधी उड़ाती और पत्थर बरसाती हुई राम की ओर झपटी। राम ने पहले उसके दोनों हाथ काट दिए, और जब वह मायावी रूप धरकर अदृश्य होकर वार करने लगी, तब राम ने एक ही अचूक शब्दभेदी बाण से उसके हृदय को विदीर्ण कर दिया। ताड़का भयंकर चीत्कार करती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। देवताओं ने प्रसन्न होकर राम पर पुष्प वर्षा की।

इस वध से प्रसन्न होकर महर्षि विश्वामित्र ने अगले दिन राम को 'दंडचक्र', 'कालचक्र', 'विष्णुचक्र' और 'पाशुपतास्त्र' सहित अनेक दिव्य और अचूक अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए और उनके प्रयोग तथा उन्हें वापस बुलाने की विधि भी सिखाई।

अंततः वे सिद्धाश्रम पहुँचे। विश्वामित्र ने यज्ञ आरंभ किया। राम और लक्ष्मण लगातार छह दिन और छह रात तक बिना सोए, धनुष पर बाण चढ़ाए यज्ञशाला की पहरेदारी करते रहे। छठे दिन, जब यज्ञ पूर्ण होने वाला था, आकाश में काले बादल छा गए। मारीच और सुबाहु अपनी राक्षसी सेना के साथ रक्त की वर्षा करने के लिए नीचे झपटे।

श्रीराम ने अत्यंत फुर्ती से अपने धनुष पर 'मानवास्त्र' चढ़ाया और मारीच को मारा। उस बाण के वेग से मारीच सौ योजन दूर जाकर समुद्र के किनारे गिरा। राम ने उसे जान से नहीं मारा, क्योंकि नियति में मारीच को आगे चलकर स्वर्ण मृग बनना था। इसके तुरंत बाद राम ने 'आग्नेयास्त्र' का संधान किया और सुबाहु की छाती में मार दिया। सुबाहु वहीं जलकर भस्म हो गया। लक्ष्मण ने अपनी तीक्ष्ण बाणों से राक्षसों की बाकी सेना का भी नाश कर दिया।

बिना किसी विघ्न के महर्षि विश्वामित्र का यज्ञ संपन्न हुआ। महर्षि ने दोनों भाइयों को गले लगा लिया और आशीर्वाद दिया। यज्ञ की सफलता के बाद अगले दिन महर्षि विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण से कहा, "पुत्रों! यहाँ से कुछ दूरी पर विदेह राज जनक की नगरी मिथिला है। वहाँ एक महान धनुष यज्ञ होने जा रहा है, जिसमें भगवान शिव का वह अद्भुत धनुष रखा जाएगा जिसे कोई देवता या दानव आज तक हिला भी नहीं सका है। अब हम उसी शिव धनुष के दर्शन करने मिथिला चलेंगे।"

श्रीराम और लक्ष्मण गुरु की आज्ञा पाकर जनकपुर की ओर प्रस्थान करने के लिए तैयार हो गए, जहाँ नियति में सीता स्वयंवर की प्रतीक्षा हो रही थी।

🎉 कहानी समाप्त

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