भाग 1: सरयू तट की अयोध्या और राजा दशरथ की व्यथा

सृष्टि के आरंभ में, जब ब्रह्मा जी ने इस ब्रह्मांड की रचना की, तब उनके मानस पुत्र मरीचि का जन्म हुआ। मरीचि से कश्यप हुए, और कश्यप से विवस्वान (सूर्य) का जन्म हुआ। इन्हीं सूर्य देव के प्रतापी पुत्र वैवस्वत मनु ने मानव जाति की नींव रखी और इक्ष्वाकु वंश (सूर्यवंश) की स्थापना की। इसी महान और पवित्र सूर्यवंश में आगे चलकर सगर, भगीरथ, दिलीप और रघु जैसे महान चक्रवर्ती सम्राट हुए। राजा रघु का प्रताप इतना विशाल था कि इस वंश को 'रघुवंश' के नाम से भी जाना जाने लगा। इसी परम पवित्र और वीर प्रसूता रघुवंश की राजधानी थी—महानगरी अयोध्या।
सरयू नदी के पावन तट पर बसी अयोध्या नगरी की स्थापना स्वयं वैवस्वत मनु ने की थी। यह नगरी बारह योजन (लगभग 144 मील) लंबी और तीन योजन चौड़ी थी। अयोध्या का अर्थ ही है—जिसे युद्ध में जीता न जा सके। महर्षि वाल्मीकि के अनुसार, यह नगरी देवराज इंद्र की अमरावती के समान भव्य और समृद्ध थी। नगर के चारों ओर एक विशाल और अभेद्य परकोटा (किले की दीवार) था, और उसके बाहर एक गहरी खाई थी जिसमें मगरमच्छ और भयंकर जलजीव रहते थे, जो किसी भी शत्रु के लिए नगरी में प्रवेश करना असंभव बना देते थे।
अयोध्या की सड़कें चौड़ी और सुंदर थीं, जिन्हें नित्य जल से सींचा जाता था और जिन पर सुगंधित पुष्प बिखेरे जाते थे। नगर में ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं (महल) थीं, जिन पर स्वर्ण कलश चमकते थे। नगर के चौराहे विशाल थे और बाजार विश्व भर की बहुमूल्य वस्तुओं, मणियों, रत्नों, रेशमी वस्त्रों और सुगंधित द्रव्यों से भरे रहते थे। इस नगरी में कोई भी दरिद्र, भूखा, या दुखी नहीं था। हर नागरिक धर्म का पालन करने वाला, सत्यवादी, अपने परिवार के प्रति समर्पित और विद्यावान था। हर घर में वेद मंत्रों की ध्वनि गूंजती थी। वहां के लोग लोभ, मोह और ईर्ष्या से मुक्त थे।
इस अलौकिक नगरी पर राज करते थे चक्रवर्ती सम्राट दशरथ। राजा दशरथ, राजा अज के पुत्र थे और साक्षात धर्म के अवतार माने जाते थे। वे एक अजेय योद्धा थे; उनका रथ दसों दिशाओं (आठ दिशाएं, आकाश और पाताल) में बिना किसी बाधा के जा सकता था, इसीलिए उनका नाम 'दशरथ' पड़ा था। देवराज इंद्र भी असुरों के विरुद्ध युद्ध में राजा दशरथ की सहायता मांगते थे। राजा दशरथ के शासन में प्रजा अपने पिता के समान उनका आदर करती थी। उनके दरबार में आठ अत्यंत ज्ञानी और निष्ठावान मंत्री थे—धृष्टि, जयंत, विजय, सुरास्त्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमंत्र। सुमंत्र उनके प्रधान मंत्री और सबसे विश्वासपात्र सखा भी थे।
इन मंत्रियों के अतिरिक्त, राजकाज और धर्म के मार्ग पर राजा का मार्गदर्शन करने के लिए महर्षि वशिष्ठ और वामदेव जैसे ब्रह्मज्ञानी कुलगुरु हमेशा उनके साथ रहते थे। राजा दशरथ का जीवन पूर्ण रूप से व्यवस्थित था। उनके खजाने धन-धान्य से भरे थे, उनकी सेना में लाखों वीर सैनिक, हाथी, घोड़े और रथ थे। उनकी तीन मुख्य रानियां थीं—कौशल्या (जो अत्यंत शांत और धर्मपरायण थीं), सुमित्रा (जो अत्यंत बुद्धिमती और विवेकशील थीं), और कैकेयी (जो अद्वितीय सुंदरी और रणकौशल में निपुण थीं)।
किंतु, इतने विशाल साम्राज्य, अतुलनीय वैभव, देवलोक तक ख्याति और तीन-तीन रानियों के होने के बावजूद, राजा दशरथ के हृदय में एक गहरा और अंधकारमय दुख बसा हुआ था। वह दुख था—संतानहीनता।
राजा दशरथ की आयु ढल रही थी। उनका यौवन बीत चुका था और वृद्धावस्था ने दस्तक दे दी थी, लेकिन इक्ष्वाकु वंश का उत्तराधिकारी अभी तक जन्म नहीं ले सका था। जब राजा अपने राजमहल के झरोखे से बाहर देखते और प्रजा के बच्चों को खेलते, किलकारियां मारते देखते, तो उनका हृदय छलनी हो जाता। उन्हें चिंता सताने लगी थी कि उनके बाद इस महान सूर्यवंश का क्या होगा? क्या यह पवित्र वंशावली उनके साथ ही समाप्त हो जाएगी? कौन इस अयोध्या की रक्षा करेगा? कौन प्रजा का पालन करेगा?
यह पीड़ा केवल राजा की नहीं थी; महारानी कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी भी दिन-रात इसी दुख में घुलती रहती थीं। महलों में सोने के पालने सूने पड़े थे। रानियों के कक्ष में उदासी छाई रहती थी। संपूर्ण अयोध्या राजा की इस व्यथा को जानती थी और प्रजा भी अपने प्रिय राजा के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती थी।
एक दिन, जब राजा दशरथ का मन अत्यधिक उदास था, वे अपने सिंहासन से उठे और भारी कदमों से चलते हुए कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पहुंचे। महर्षि वशिष्ठ त्रिकालदर्शी थे। राजा दशरथ ने महर्षि के चरणों में प्रणाम किया और अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपनी व्यथा प्रकट की।
उन्होंने कहा, "हे गुरुदेव! आपके आशीर्वाद से मेरे पास सब कुछ है। धन, बल, यश, और निष्ठावान प्रजा, किसी भी वस्तु का अभाव नहीं है। परंतु एक पुत्र के बिना यह सारा वैभव मुझे भस्म के समान प्रतीत होता है। मेरे पितृगण जल और पिंडदान के लिए तरस रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि मेरे बाद उन्हें तर्पण कौन देगा। हे ब्रह्मर्षि! कृपा करके मुझे कोई ऐसा मार्ग दिखाइए, कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरे आंगन में भी पुत्र की किलकारियां गूंज सकें और इक्ष्वाकु वंश का दीपक बुझने से बच जाए।"
राजा दशरथ की यह करुण पुकार सुनकर महर्षि वशिष्ठ कुछ क्षणों के लिए ध्यानमग्न हो गए। उन्होंने अपने तपोबल से भविष्य के गर्भ में झांका। उनके मुख पर एक दिव्य मुस्कान उभर आई, क्योंकि वे जान गए थे कि अब वह समय आ गया है जब पृथ्वी का भार कम करने के लिए स्वयं नारायण अवतार लेने वाले हैं।
ध्यान से बाहर आकर महर्षि वशिष्ठ ने राजा दशरथ को ढांढस बंधाते हुए कहा, "हे राजन! शोक त्याग दें। आपका वंश नष्ट नहीं होगा। आपके भाग्य में एक नहीं, बल्कि चार अत्यंत प्रतापी और विश्व-वंदनीय पुत्रों का योग है। परंतु इसके लिए आपको एक महान अनुष्ठान करना होगा। आपको 'पुत्रकामेष्टि यज्ञ' करना होगा। यह कोई साधारण यज्ञ नहीं है, इसलिए इसके ब्रह्मा कोई साधारण ब्राह्मण नहीं हो सकते।"
वशिष्ठ जी ने आगे बताया, "अंग देश के राजा रोमपाद के दामाद, महर्षि विभांडक के पुत्र, महान तपस्वी 'श्रृंगी ऋषि' को इस यज्ञ का आचार्य बनाना होगा। उनके तप और पवित्रता से ही यह यज्ञ सफल होगा और अग्निदेव प्रसन्न होकर आपको पुत्र प्राप्ति का वरदान देंगे।"
यह सुनकर राजा दशरथ के बुझे हुए हृदय में आशा की एक नई किरण फूट पड़ी। उनके नेत्रों में चमक आ गई और उन्होंने तुरंत अपने परम मित्र और प्रधान मंत्री सुमंत्र को आदेश दिया कि वे ससम्मान श्रृंगी ऋषि को अयोध्या आमंत्रित करने का प्रबंध करें।
🏹 रामायण की और कहानियाँ
भाग 2: पुत्रकामेष्टि यज्ञ, अग्निदेव का प्राकट्य और दिव्य पायस का वितरण
श्रृंगी ऋषि के नेतृत्व में पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न हुआ। यज्ञ कुंड से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए और स्वर्ण पात्र में पायस लेकर आए। राजा दशरथ ने वह दिव्य खीर तीनों रानियों में बांटी।
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