भाग 2: पुत्रकामेष्टि यज्ञ, अग्निदेव का प्राकट्य और दिव्य पायस का वितरण

महर्षि वशिष्ठ का आदेश पाकर अयोध्या के प्रधान मंत्री सुमंत्र तत्काल अपने रथ पर सवार हुए और अंग देश की ओर निकल पड़े। उन दिनों अंग देश के राजा रोमपाद थे, जो राजा दशरथ के घनिष्ठ मित्र थे। राजा रोमपाद के राज्य में एक बार भयंकर सूखा पड़ा था, तब महान तपस्वी श्रृंगी ऋषि के वहां चरण रखने मात्र से मूसलाधार वर्षा हुई थी। कृतज्ञ होकर राजा रोमपाद ने अपनी दत्तक पुत्री शान्ता (जो मूल रूप से राजा दशरथ की पुत्री थीं) का विवाह श्रृंगी ऋषि से कर दिया था।
सुमंत्र ने अंग देश पहुंचकर राजा रोमपाद और श्रृंगी ऋषि को अत्यंत सत्कारपूर्वक राजा दशरथ की व्यथा सुनाई और अयोध्या आने का निमंत्रण दिया। श्रृंगी ऋषि अपने ससुर दशरथ की सहायता के लिए सहर्ष सहमत हो गए। जब श्रृंगी ऋषि और देवी शान्ता का रथ अयोध्या की सीमा में प्रविष्ट हुआ, तो स्वयं चक्रवर्ती सम्राट दशरथ, कुलगुरु वशिष्ठ और समस्त मंत्रियों के साथ नंगे पांव उनके स्वागत के लिए नगर द्वार पर खड़े थे। पूरी अयोध्या नगरी को तोरणों और पुष्पों से सजाया गया था।
राजा दशरथ ने श्रृंगी ऋषि के चरण धोए और उन्हें ससम्मान राजमहल ले गए। कुछ समय विश्राम करने के पश्चात, बसंत ऋतु के आगमन पर राजा दशरथ ने हाथ जोड़कर श्रृंगी ऋषि से प्रार्थना की, "हे मुनिवर! कृपा करके मेरे वंश को आगे बढ़ाने और मेरी इस घोर चिंता को दूर करने के लिए यज्ञ का आरंभ करें।"
श्रृंगी ऋषि ने राजा को अश्वमेध और 'पुत्रकामेष्टि यज्ञ' करने का निर्देश दिया। सरयू नदी के उत्तरी तट पर एक अत्यंत भव्य और विशाल यज्ञशाला का निर्माण करवाया गया। देश-देशांतर से बड़े-बड़े विद्वान, तपस्वी, ऋषि-मुनि और राजाओं को आमंत्रित किया गया। मिथिला के राजा जनक, काशी नरेश, कैकेय नरेश और मगध नरेश सहित अनेक महान सम्राट इस महायज्ञ के साक्षी बनने अयोध्या पधारे। यज्ञभूमि में चारों ओर वेदमंत्रों की पवित्र ध्वनि गूंजने लगी। ऐसा प्रतीत होता था मानो साक्षात देवलोक सरयू के तट पर उतर आया हो।
यज्ञ की शुरुआत अश्वमेध यज्ञ से हुई, जो पूरे एक वर्ष तक चला। उसके पश्चात, श्रृंगी ऋषि ने विशेष रूप से पुत्र प्राप्ति के लिए 'पुत्रकामेष्टि यज्ञ' का अनुष्ठान आरंभ किया। यह यज्ञ अत्यंत कठिन और तांत्रिक था, जिसमें प्रत्येक आहुति के साथ विशेष मंत्रों का उच्चारण किया जा रहा था। श्रृंगी ऋषि स्वयं मुख्य आहुतियां दे रहे थे। यज्ञ कुंड से उठती हुई पवित्र अग्नि की लपटें आकाश को छू रही थीं और उसकी सुगंधित धूणी से सम्पूर्ण वायुमंडल पवित्र हो गया था।
जब यज्ञ अपने अंतिम चरण में पहुंचा और अंतिम पूर्ण आहुति दी गई, तब एक अद्भुत और अलौकिक घटना घटी। यज्ञ कुंड की अग्नि सहसा अत्यंत प्रज्वलित हो उठी, लेकिन उसकी आंच सुखद थी, जलाने वाली नहीं। उन दिव्य लपटों के बीच से एक विशालकाय, तेजस्वी 'प्राजापत्य पुरुष' प्रकट हुए। उनके शरीर का रंग लाल था, स्वर सिंह की गर्जना के समान गंभीर था, और उनके शरीर से करोड़ों सूर्यों के समान तेज निकल रहा था। उन्होंने लाल रंग के वस्त्र धारण किए हुए थे।
उस दिव्य पुरुष के दोनों हाथों में शुद्ध स्वर्ण का एक बड़ा सा पात्र था, जिसे चांदी के ढक्कन से ढका गया था। वह पात्र एक अत्यंत सुगंधित और दिव्य खीर (पायस) से भरा हुआ था।
सम्पूर्ण सभा विस्मय और भक्ति से स्तब्ध रह गई। राजा दशरथ ने साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। उस प्राजापत्य पुरुष ने मेघ के समान गंभीर स्वर में कहा, "हे राजन! मैं प्रजापति की ओर से आया हूं। देवगण तुम्हारे इस यज्ञ से अत्यंत प्रसन्न हैं। यह स्वर्ण पात्र लो। इसमें दिव्य 'पायस' है जो देवताओं द्वारा सिद्ध की गई है। यह पायस धन, धान्य, आरोग्य और संतानों को देने वाली है। तुम इसे अपनी योग्य पत्नियों को खिला दो। जिसके लिए तुमने यह कठोर यज्ञ किया है, वह मनोकामना इसी पायस से पूर्ण होगी।"
राजा दशरथ का हृदय आनंद से भर गया। उन्होंने कांपते हाथों से उस दिव्य स्वर्ण कलश को ग्रहण किया। कलश सौंपने के पश्चात वह दिव्य पुरुष अग्नि में ही अंतर्धान हो गए।
राजा दशरथ की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था। ऐसा लग रहा था मानो किसी निर्धन को संसार की सारी संपत्ति मिल गई हो। वे तुरंत यज्ञशाला से उठकर रनिवास की ओर दौड़े। उन्होंने सबसे पहले अपनी पटरानी और सबसे बड़ी रानी कौशल्या को बुलाया।
कलश को खोलते ही उसमें से ऐसी दिव्य सुगंध उठी कि सम्पूर्ण महल महक उठा। पायस के वितरण का क्रम अत्यंत विशिष्ट और अर्थपूर्ण था।
राजा दशरथ ने उस दिव्य पायस का ठीक आधा भाग निकाला और बड़ी महारानी कौशल्या को आदरपूर्वक प्रदान किया। उसके बाद शेष बचे आधे भाग में से आधा (अर्थात कुल पायस का एक चौथाई भाग) उन्होंने रानी सुमित्रा को दिया। अब कलश में जो एक चौथाई भाग बचा था, उसका आधा (अर्थात कुल पायस का एक-आठवां भाग) उन्होंने अपनी सबसे प्रिय रानी कैकेयी को दिया। अंत में जो थोड़ा सा पायस कलश में बच गया था, राजा दशरथ ने कुछ क्षण विचार किया और वह अंतिम भाग भी उन्होंने सुमित्रा को ही दे दिया। यही कारण है कि कौशल्या और कैकेयी को एक-एक पुत्र प्राप्त हुआ, जबकि सुमित्रा ने दो पुत्रों—लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया। और क्योंकि सुमित्रा को कौशल्या और कैकेयी दोनों के बाद बचे हुए अंश मिले थे, इसलिए उनके पुत्रों में राम और भरत के प्रति असीम सेवाभाव उत्पन्न हुआ।
तीनों रानियों ने उस देव-प्रदत्त पायस को अमृत के समान मानकर अत्यंत श्रद्धा और पवित्रता के साथ ग्रहण किया। पायस ग्रहण करने के कुछ ही समय पश्चात, तीनों रानियों के चेहरों पर एक अलौकिक तेज चमकने लगा। वे गर्भवती हो गईं। रानियों के गर्भ में स्वयं साक्षात परब्रह्म परमात्मा ने अपने अंशावतारों के साथ प्रवेश किया था।
जब अयोध्या की प्रजा को यह शुभ समाचार मिला कि इक्ष्वाकु वंश का उत्तराधिकारी जल्द ही जन्म लेने वाला है, तो संपूर्ण नगर में उत्सव का माहौल छा गया। देवलोक में देवता, गंधर्व और अप्सराएं भी प्रसन्न होकर पुष्प वर्षा करने लगे, क्योंकि रावण के विनाश का समय अब समीप आ रहा था। राजा दशरथ का वह अंधकारमय दुख अब आशा के सुनहरे प्रकाश में बदल चुका था।
🏹 रामायण की और कहानियाँ
भाग 1: सरयू तट की अयोध्या और राजा दशरथ की व्यथा
सृष्टि के आरंभ में इक्ष्वाकु वंश की स्थापना हुई और सरयू तट पर अयोध्या नगरी बसी। चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के पास सब कुछ था, किंतु संतानहीनता की पीड़ा उन्हें अंदर से खोखला कर रही थी।
पढ़ें →भाग 3: श्री राम एवं भाइयों का जन्म, नामकरण और बाल्यकाल
चैत्र मास की नवमी तिथि को पांच ग्रहों के शुभ संयोग में महारानी कौशल्या ने श्री राम को जन्म दिया। इसके बाद भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भी जन्म हुआ। महर्षि वशिष्ठ ने चारों बालकों का नामकरण किया।
पढ़ें →भाग 4: महर्षि विश्वामित्र का आगमन, ताड़का वध और यज्ञ रक्षा
महर्षि विश्वामित्र अयोध्या आए और राम-लक्ष्मण को यज्ञ रक्षा के लिए मांगा। दशरथ के मोह के बाद वशिष्ठ ने समझाया। वन में राम ने ताड़का का वध किया और मारीच-सुबाहु को परास्त कर यज्ञ सम्पन्न करवाया।
पढ़ें →भाग 5: अहिल्या उद्धार, शिव धनुष भंग और सीता स्वयंवर
मार्ग में श्रीराम के चरण स्पर्श से अहिल्या का उद्धार हुआ। मिथिला में शिव धनुष भंग कर राम ने सीता स्वयंवर जीता। परशुराम के क्रोध को राम ने अपनी शांति और बल से शांत किया।
पढ़ें →भाग 6: अयोध्या से बारात का प्रस्थान, चारों भाइयों का विवाह और विदाई
राजा दशरथ विशाल बारात लेकर मिथिला पहुँचे। वेदमंत्रों के बीच चारों भाइयों का विवाह संपन्न हुआ — राम-सीता, लक्ष्मण-उर्मिला, भरत-मांडवी और शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति।
पढ़ें →भाग 7: राम के राज्याभिषेक की घोषणा और मंथरा की कुटिल चाल
महाराज दशरथ ने राम के राज्याभिषेक की घोषणा की और पूरी अयोध्या उत्सव में डूब गई। किंतु दासी मंथरा ने कैकेयी के मन में ईर्ष्या का विष भर दिया और उसे कोपभवन भेज दिया।
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