भाग 3: श्री राम एवं भाइयों का जन्म, नामकरण और बाल्यकाल

यज्ञ के पूर्ण होने के पश्चात ऋतुएं अपने क्रम से बीतने लगीं। समय अपनी गति से आगे बढ़ा और देखते ही देखते ग्यारह महीने बीत गए। बारहवां महीना, चैत्र का पावन मास आ गया। पूरी प्रकृति जैसे किसी महान आगमन की प्रतीक्षा में सजी हुई थी।
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को एक अद्भुत खगोलीय संयोग बना। उस समय पांच ग्रह अपनी उच्च राशि में थे, कर्क लग्न था और पुनर्वसु नक्षत्र का शुभ प्रभाव था। दोपहर का समय था, सूर्य देव अपने पूरे तेज के साथ मध्य आकाश में चमक रहे थे। न अधिक गर्मी थी, न अधिक ठंड। तभी, महारानी कौशल्या के कक्ष से एक नवजात शिशु की प्रथम रुदन ध्वनि गूंजी। स्वयं भगवान विष्णु ने अपने चतुर्भुज रूप में कौशल्या माता को दर्शन दिए और फिर एक साधारण शिशु का रूप धारण कर लिया। यह साक्षात परमब्रह्म का 'श्री राम' के रूप में अवतार था। उनके जन्म लेते ही आकाश से देवताओं ने पुष्प वर्षा की, गंधर्व मधुर गीत गाने लगे और अप्सराएं नृत्य करने लगीं।
श्री राम के जन्म के अगले ही दिन, पुष्य नक्षत्र और मीन लग्न में, महारानी कैकेयी ने एक अत्यंत ओजस्वी और सुंदर पुत्र को जन्म दिया। उसके कुछ ही समय पश्चात, अश्लेषा नक्षत्र और कर्क लग्न में, महारानी सुमित्रा ने दो अत्यंत तेजस्वी जुड़वां पुत्रों को जन्म दिया।
जब महाराज दशरथ को यह समाचार मिला कि उनके घर एक नहीं, बल्कि चार-चार पुत्रों ने जन्म लिया है, तो वे आनंद से आत्मविभोर हो गए। ऐसा लगा मानो उनका वर्षों का सूखा जीवन अचानक हरियाली से भर गया हो। पूरी अयोध्या नगरी में खुशी की लहर दौड़ गई। घर-घर में बधाइयां गाई जाने लगीं। गलियों को सुगंधित जल से धोया गया, और द्वारों पर बंदनवार बांधे गए। राजा दशरथ ने ब्राह्मणों, गरीबों और याचकों को गायें, स्वर्ण, वस्त्र और आभूषण दान में दिए। अयोध्या में लगातार कई दिनों तक उत्सव चलता रहा।
ग्यारह दिन बीत जाने पर, महर्षि वशिष्ठ को नामकरण संस्कार के लिए आमंत्रित किया गया। महर्षि ने चारों बालकों के लक्षणों और उनके दैवीय स्वरूप को देखकर उनके नाम रखे।
महारानी कौशल्या के सबसे बड़े पुत्र, जिनका स्वरूप नीलकमल के समान श्याम और अत्यंत आकर्षक था, जो संपूर्ण विश्व को आनंदित करने वाले थे, महर्षि ने उनका नाम 'राम' रखा। राम का अर्थ है—जिसमें योगी रमण करते हैं या जो सबको सुख देता है। महारानी कैकेयी के पुत्र, जो अपने असीम धैर्य और गुणों से विश्व का भरण-पोषण करने की क्षमता रखते थे, उनका नाम 'भरत' रखा गया। महारानी सुमित्रा के पहले पुत्र, जो शुभ लक्षणों से युक्त और भगवान राम के प्रति अनंत सेवा भाव रखने वाले थे, उनका नाम 'लक्ष्मण' रखा गया—लक्ष्मण शेषनाग के अवतार माने जाते हैं। और सुमित्रा के दूसरे पुत्र, जो स्वभाव से शांत लेकिन शत्रुओं का नाश करने में अद्वितीय थे, उनका नाम 'शत्रुघ्न' रखा गया।
जैसे-जैसे चारों भाई बड़े होने लगे, उनकी बाल-लीलाओं से पूरा राजमहल गूंजने लगा। राजा दशरथ चारों भाइयों को अपने प्राणों से भी अधिक प्रेम करते थे, लेकिन श्रीराम उन्हें सबसे अधिक प्रिय थे।
बचपन से ही भाइयों के बीच एक विशेष प्रकार का स्नेह देखने को मिलता था। लक्ष्मण हमेशा परछाई की तरह श्रीराम के साथ रहते थे। राम जब तक भोजन नहीं करते, लक्ष्मण भी कुछ ग्रहण नहीं करते थे। जब राम सोते, तो लक्ष्मण उनके पैर दबाते। इसी प्रकार, शत्रुघ्न हमेशा अपने बड़े भाई भरत के साथ रहते थे और उनकी सेवा करते थे।
जब चारों राजकुमार थोड़े बड़े हुए, तो उनका उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार किया गया और उन्हें शिक्षा के लिए गुरु वशिष्ठ के आश्रम में भेजा गया। चारों भाइयों ने अत्यंत कम समय में ही वेद, पुराण, व्याकरण और नीतिशास्त्र का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया। वे न केवल शास्त्रों में निपुण हुए, बल्कि अस्त्र-शस्त्र चलाने, रथ हांकने, हाथी और घोड़े की सवारी करने में भी उन्होंने महारत हासिल कर ली।
श्रीराम तीरंदाजी (धनुर्विद्या) में सर्वश्रेष्ठ थे। उनका निशाना अचूक था। वे अपने माता-पिता और गुरुओं की आज्ञा का पालन करने वाले, सत्यवादी, और प्रजा के हितैषी थे। अयोध्या की प्रजा अपने इन चार राजकुमारों, विशेषकर श्रीराम के अलौकिक रूप और विनम्र स्वभाव को देखकर धन्य महसूस करती थी। श्रीराम जब अपने भाइयों के साथ अयोध्या की सड़कों पर निकलते, तो लोग अपना काम-काज छोड़कर बस उन्हें ही निहारते रह जाते थे।
राजा दशरथ अब अत्यंत संतुष्ट और निश्चिंत थे। उनके पुत्र युवा हो रहे थे और सब प्रकार से योग्य थे। अब राजा के मन में केवल एक ही विचार चल रहा था—इन चारों योग्य पुत्रों का विवाह किसी अच्छे और संस्कारी राजकुल की कन्याओं से कैसे संपन्न हो।
परंतु नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था। विवाह की चर्चाओं के बीच, अयोध्या में एक ऐसे तपस्वी का आगमन होने वाला था, जो श्रीराम के जीवन की दिशा को पूरी तरह से बदलने वाला था।
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