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भाग 7: राम के राज्याभिषेक की घोषणा और मंथरा की कुटिल चाल

महर्षि वाल्मीकि — रामायण7 मिनट का पठन
भाग 7: राम के राज्याभिषेक की घोषणा और मंथरा की कुटिल चाल

विवाह के पश्चात अयोध्या में सर्वत्र आनंद का साम्राज्य था। श्रीराम के सद्गुणों—उनकी धर्मनिष्ठा, क्षमाशीलता, वीरता और प्रजा के प्रति निस्वार्थ प्रेम—ने उन्हें संपूर्ण कोसल राज्य का सबसे प्रिय व्यक्ति बना दिया था। प्रजा उन्हें अपने प्राणों से भी अधिक स्नेह करती थी। भरत और शत्रुघ्न अभी भी अपने मामा के घर कैकेय देश में ही थे।

एक दिन महाराज दशरथ ने दर्पण में अपना चेहरा देखा। उन्होंने पाया कि उनके कानों के पास के बाल सफेद हो रहे हैं। यह बुढ़ापे का संकेत था। राजा दशरथ ने समझ लिया कि अब उनके विश्राम का समय आ गया है और राज्य का भार एक युवा और योग्य कंधों पर सौंप देना चाहिए।

उन्होंने तुरंत एक भव्य राजसभा बुलाई, जिसमें कुलगुरु वशिष्ठ, अनेक राजा, मंत्री और नगर के गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। महाराज दशरथ ने अपना विचार प्रस्तुत करते हुए कहा, "मैंने वर्षों तक इस राज्य की सेवा की है। अब मेरा शरीर थक रहा है। यदि आप सभी की और गुरुजनों की अनुमति हो, तो मैं अपने ज्येष्ठ और सर्वाधिक योग्य पुत्र राम को 'युवराज' घोषित करना चाहता हूँ।"

यह प्रस्ताव सुनते ही पूरी सभा खुशी से झूम उठी। सभी ने एक स्वर में इसका समर्थन किया। प्रजा के प्रतिनिधियों ने कहा कि श्रीराम के राजा बनने से अयोध्या सचमुच स्वर्ग बन जाएगी।

शुभ मुहूर्त निकाला गया। गुरु वशिष्ठ ने बताया कि कल ही 'पुष्य नक्षत्र' है, जो राज्याभिषेक के लिए अत्यंत शुभ है। इसलिए कल प्रातः ही श्रीराम का राज्याभिषेक संपन्न होगा। समय बहुत कम था, अतः पूरी अयोध्या में रातों-रात तैयारियां शुरू कर दी गईं। नगर को वंदनवारों, दीपकों, और ध्वजाओं से सजाया जाने लगा। राजमहल से लेकर साधारण कुटियों तक, हर जगह बस एक ही चर्चा थी—कल हमारे राम राजा बनेंगे।

जब श्रीराम को यह समाचार मिला, तो वे अत्यंत विनम्रता से गुरु और पिता का आशीर्वाद लेने गए। श्रीराम के मन में न तो राजा बनने का कोई अहंकार था और न ही कोई विशेष उत्साह; वे इसे केवल अपने धर्म और कर्तव्य के रूप में देख रहे थे। माता कौशल्या की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था, उन्होंने ब्राह्मणों को अपार दान दिया।

परंतु, नियति को कुछ और ही मंजूर था। देवलोक में हाहाकार मच गया। देवताओं को चिंता हुई कि यदि राम अयोध्या के राजा बन गए, तो वे हमेशा वहीं रह जाएंगे और रावण का वध कभी नहीं हो पाएगा, जिसके लिए ही उन्होंने अवतार लिया है। देवताओं ने माता सरस्वती से प्रार्थना की कि वे अयोध्या जाकर किसी की बुद्धि फेर दें। माता सरस्वती ने इस कार्य के लिए रानी कैकेयी की अत्यंत विश्वासपात्र दासी 'मंथरा' को चुना।

मंथरा एक दासी थी, जो कैकेयी के मायके से ही उसके साथ आई थी। जब मंथरा ने महल की छत से देखा कि पूरी अयोध्या दीपों से जगमगा रही है और उत्सव मन रहा है, तो उसने एक दासी से इसका कारण पूछा। दासी ने खुशी-खुशी बताया कि कल प्रातः श्रीराम का राज्याभिषेक होने वाला है।

यह सुनते ही मंथरा के भीतर ईर्ष्या की आग भड़क उठी। वह दौड़ती हुई रानी कैकेयी के कक्ष में गई। कैकेयी उस समय सो रही थी। मंथरा ने उसे जगाते हुए कहा, "अरी मूर्ख रानी! तू यहाँ सो रही है और तेरे ऊपर विपत्तियों का पहाड़ टूटने वाला है! कल राम राजा बनने वाला है।"

कैकेयी श्रीराम से भरत से भी अधिक प्रेम करती थी। राम के राज्याभिषेक की बात सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न हुई और उसने अपना एक बहुमूल्य रत्नों का हार उतारकर मंथरा को इनाम में दे दिया।

परंतु मंथरा ने वह हार फेंक दिया और रोने का नाटक करते हुए बोली, "तुम्हारी बुद्धि मारी गई है! राम के राजा बनते ही कौशल्या राजमाता बन जाएगी और तुम उसकी दासी। यह राजा दशरथ की एक गहरी चाल है, इसीलिए उन्होंने भरत को ननिहाल भेज दिया है और पीछे से राम को राजा बना रहे हैं।"

मंथरा के बार-बार समझाने और मनोवैज्ञानिक प्रहार करने पर, अंततः कैकेयी की निर्मल बुद्धि भ्रष्ट हो गई। उसके मन में कौशल्या के प्रति ईर्ष्या और अपने पुत्र भरत के लिए अंधा मोह जाग उठा। उसने मंथरा से पूछा, "अब मुझे क्या करना चाहिए? राम का राज्याभिषेक कैसे रुकेगा?"

मंथरा ने एक अत्यंत कुटिल चाल चली। उसने याद दिलाया, "क्या तुम्हें याद है, देवासुर संग्राम में तुमने महाराज दशरथ की जान बचाई थी और उन्होंने तुम्हें दो वरदान मांगने को कहा था? तुमने वे वरदान भविष्य के लिए सुरक्षित रख लिए थे। आज वही समय है। महाराज से पहले वरदान में 'भरत का राज्याभिषेक' मांगो और दूसरे वरदान में 'राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास' मांगो। चौदह वर्ष में राम का प्रभाव अयोध्या से खत्म हो जाएगा और भरत की जड़ें मजबूत हो जाएंगी।"

यह विनाशकारी मंत्र सुनकर कैकेयी ने अपने सारे कीमती आभूषण उतार फेंके, मैले कपड़े पहन लिए और राजमहल के 'कोपभवन' में जाकर जमीन पर लेट गई।

कुछ ही देर बाद, महाराज दशरथ अत्यंत प्रसन्नता के साथ अपनी प्रिय रानी कैकेयी को यह शुभ समाचार देने के लिए उसके कक्ष की ओर बढ़ रहे थे, इस बात से पूरी तरह अनजान कि वहाँ उनके जीवन का सबसे बड़ा दुख उनका इंतजार कर रहा है।

🎉 कहानी समाप्त

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